लाल आतंक और चेहरे का नक़ाब

राजनीति में अपराध मिला कर आर्थिक सत्ता की बिरियानी पकाने का काम, कांग्रेसियों के सहयोग से, 80 के दशक में पूरे जोरों पर चला था. जून 1980 का दौर इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि इसी समय माओवादियों ने बस्तर में घुसना शुरू किया था.

ये वो समय था जब सी.पी.आई. (एम.एल) जिसे पीपल्स वॉर भी कहते हैं, का गठन नया-नया ही हुआ था. बाद में अन्य माओवादी आतंकियों के साथ मिलकर इन्होंने सी.पी.आई. (माओवादी) बना लिया.

आंध्रप्रदेश के दुर्दांत आतंकी कोंडापल्ली सीतारम्मैया ने इसी समय सात अलग-अलग दस्ते बनाए थे. इनका काम था, एक ऐसी जगह बनाना जहाँ आतंकी वारदात के बाद छुपकर आराम कर सकें.

ये वो दौर था जब कानू सान्याल जैसों का इस आपराधिक और आयातित विचारधारा से करीब-करीब पूरा मोहभंग हो चुका था. कॉमरेडों ने अपनी छुआछूत की परंपरा को निभाते हुए उन्हें और अन्य शुरूआती सशस्त्र कम्युनिस्टों को “अनपर्सन” (unperson) भी कर दिया था.

गुरिल्ला युद्ध के लिए सुरक्षित ठिकानों की तलाश में जहाँ इन आतंकियों ने कैंप बनाए वो थे तेलंगाना, खम्मम, करीमनगर, वारंगल और आदिलाबाद. पुराने जमाने में जिलों की सीमाएं अभी जैसी नहीं थी. उस जमाने में दंतेवाड़ा भी बस्तर का ही हिस्सा होता था.

सात में से बचे हुए तीन आतंकी कम्युनिस्टों के दस्ते गोदावरी पार कर के ठिकाने ढूँढने गए थे. एक गढ़चिरोली (महाराष्ट्र) पहुंचा और दो दस्तों ने बस्तर के जंगलों में ही अपना ठिकाना बनाया.

हाल में जो ढोलकलिया गणेश की प्रतिमा को पहाड़ से खाई में धकेला गया था उसमें ऐसे ही दस्तों का काम रहा होगा. इनका हमेशा से ये इरादा रहा है कि आदिवासी अपनी स्थानीय पूजा पद्धतियां, अपनी परम्पराएँ छोड़ कर उनके जैसे नास्तिक हो जाएँ. माओवादी हमेशा से ऐसा करते आये हैं.

चीन में जहाँ आज वो प्रतिबंधित हैं, वहां भी शुरुआत में इनका इस्तेमाल तिब्बत के बौद्ध धार्मिक ठिकानों को नेस्तनाबूद करने में ही होता था. आज जो तिब्बत की प्राचीन बौद्ध मठ, विश्वविद्यालय और पुस्तकालय जलाए-टूटे दिखते हैं, उनमें से 95% के पीछे माओवादी कॉमरेड ही रहे हैं.

बस्तर के हिन्दुओं में गणेश को लेकर स्थानीय आस्था परंपरागत कारणों से है. ये इलाका किसी दौर में हाथियों के लिए जाना जाता था. राजाओं की सेना और जंगलों में काम के लिए हाथी अक्सर इसी इलाके से ले जाए जाते थे.

हाथियों को बौद्ध धर्म में भी पवित्र माना जाता है. मान्यता है कि बुद्ध के जन्म से पहले सपने में उनकी माता को अपने गर्भ में हाथी प्रविष्ट होता दिखा था. ख्याति प्राप्त पुरातत्वविद अरुण कुमार शर्मा (जिन्होंने ढोलकलिया गणेश की प्रतिमा को फिर से जोड़ा) ने पहले इसी इलाके में बौद्ध अवशेषों पर भी काम किया था.

आज जिस इलाके को बस्तर-दंतेवाड़ा कहते हैं, वहीँ शिरपुर होता था. ये इलाका हाथियों के लिए प्रसिद्ध था. यहाँ जिस प्राचीन बौद्ध विहार के अवशेष मिले हैं वो नालंदा से करीब चार गुना बड़ा है.

हाथियों से जुड़े और विशालकाय बौद्ध विहार के अवशेष की महत्ता का बौद्धों के लिए क्या होगी, इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि बिहार के गया के बौद्ध मठों से लगभग हर बौद्ध या तो वहां जा चुका है, या जाने की तमन्ना पाले बैठा है. खुद दलाई लामा वहां दो बार गए हैं.

आयातित आतंकी विचारधारा के लिए इस इलाके को नष्ट करना बहुत ही जरूरी हो जाता था. इन गिरे हुए कम्युनिस्टों की मंशा पर तब घड़ों पानी पड़ गया होगा जब अरुण कुमार शर्मा और उनके सहयोगियों ने मिलकर गणेश विग्रह के 57 टुकड़ों को फिर से जोड़ दिया.

ये हिंसक जीव सभ्य समाज में शराफत का नकाब पहन कर कैसे विचरते हैं, इसका अंदाजा भी आपको तब हो गया होगा जब हाल में ही दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बने बैठे एक ऐसे ही धूर्त को सजा हुई.

ये अपाहिज आदमी सशस्त्र क्रांति में भाग लेकर हत्याएं नहीं कर सकता था. इसलिए बड़ी चतुराई से इसने साईंबाबा जैसा नाम धारण किया और प्रोफेसर बना बैठा हिंसा को पोषण देता था.

इसका एक और मक्कार कॉमरेड जे.एन.यू. में छात्र का रूप धारण किये बैठा था. अभी चुनावों और उन पर “बौद्धिक विमर्श” का दौर है तो ये और आसानी से दिखेंगे. जिन पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, उनमें एक सीट तक लोकतान्त्रिक तरीके से जीत पाने का इनका सामर्थ्य नहीं है. लेकिन अगर टीवी और अखबारों में विचार पढेंगे तो इनके अलावा किसी का कहा ना सुनाई देगा, ना किसी का लिखा पढ़ पायेंगे.

जब पूछा जाता है कि पढ़ने-सीखने की जरूरत क्यों है तो उसका जवाब है कि पढ़ने पर आपको ऐसे प्रोफेसर का रूप धरे कपटी कॉमरेड बरगला नहीं पायेंगे. आपके घरों में टीवी डिबेट के माध्यम से घुस आये ये हमलावर आपके बच्चों को नहीं बहका पायेंगे, इसलिए पढ़कर खुद सीखिए.

बाकी रहा जमीन पर या सड़कों पे, तो तरस खाइए हुज़ूर,  वहां गांधीवाद मत लेकर आइये. वो हिंसक जीव हैं, उन पर अहिंसा नहीं चलेगी.

तेरह साल की बच्ची विस्मया, जब केरल में अपने पिता की हत्या के बाद हाथों में तख्ती लिए इन्साफ मांगती है तो कोई गुरमेहर कौर जैसा हंगामा नहीं होता. गुमनाम मौत का हमें शौक नहीं साहेब, हम आत्मरक्षा का संवैधानिक अधिकार इस्तेमाल करेंगे.

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