करसन भाई ‘निरमा’ : बेबस समझ कर रौंदी गई मिट्टी ही एक दिन मीनार बनती है

साठ के दशक में गुजरात सरकार के भू विज्ञान विभाग की लैब में एक 24 साल का युवक काम करता था… पारिवारिक पृष्ठभूमि बेहद साधारण… लेकिन उसे सरकारी नौकरी कभी रास नहीं आई…. वो एक लैब असिस्टेंट था…. लेकिन उसका दिमाग हमेशा कुछ अलग करने को बेताब रहता था.

उन दिनों भारतीय उद्योग जगत के FMCG क्षेत्र में एकमात्र कम्पनी का साम्राज्य हुआ करता था और वो थी “हिन्दुस्तान लीवर”….. हिन्दुस्तान लीवर के सैकड़ों प्रोडक्ट उन दिनों उच्च मध्यम वर्ग और मध्यम वर्ग की पसंद हुआ करते थे….

उन्हीं दिनों HLL (हिन्दुस्तान लीवर लिमिटेड) ने कपड़े धोने के लिए अपना एक डिटर्जेंट पाउडर लांच किया था… जिसे नाम दिया गया ”सर्फ” (SURF)… .जिसकी कीमत 60 के दशक में 15 रुपये थी…. यानी ये उत्पाद आम मध्यम वर्गीय परिवार की पहुंच से दूर था.

तब 15 रुपये की कीमत हुआ करती थी…. ये देख कर उस युवक के दिमाग में एक विचार कौंधा… उसने विचार किया कि महिलाओं के लिए कपड़े धोना बड़ी मेहनत का घरेलू काम है…

निम्न वर्ग में उस समय तक डिटर्जेंट पाउडर की पहुंच नहीं हो पायी थी… तब लोग टिकिया से काम चलाते थे… जिसे पहले पीसना पड़ता था… इसके बाद उसे कूट कर बारीक पाउडर बनाया जाता था… तब जाकर उससे कपड़े साफ़ किये जाते थे.

युवक ने सोचा कि अगर इन निर्धन परिवारों को भी डिटर्जेंट पाउडर मुहैया कराया जाए तो इन्हें कपड़े धोने में आसानी होगी…लेकिन उन दिनों साबुन की तुलना में कपड़े धोने का वाशिंग पाउडर करीब तीन गुना महंगा होता था….

युवक ने सोचा कि अगर सस्ता और अच्छी क्वालिटी का पाउडर बनाया जाय तो गरीब जनता उसे हाथों हाथ लेगी…. इसके बाद युवक तन मन से अपने इस काम में जुट गया.

लैब में काम करने और रसायनों को समझने का अनुभव उसके काम आया और साल भर की कड़ी मेहनत के बाद उसने एक पीला पाउडर बनाने में सफलता प्राप्त ली… इससे कपड़े धोने से झाग निकलता था.

युवक ने इसे बनाने में ऐसी रणनीति बनायी थी कि वो इस पाउडर को कम मूल्य में बनाकर भी थोड़ा बहुत मुनाफा कमा लें… शुरू शुरू में युवक ने फैसला किया कि वो इस पाउडर को नो प्रॉफिट नो लॉस पे बेचेगा.

इसके लिए युवक ने फैसला किया कि वो खुद ही इस प्रोडक्ट को बेचेगा… ना कोई सेल्स मैन रखेगा और ना ही कोई फर्म बनाएगा…. उसने घर में हाथों से बिना मशीन के अपने हाथों से मिक्स करके पीला डिटर्जेंट पाउडर बनाना शुरू किया और हर रविवार को साइकल से गाँव-गाँव घूम-घूम कर इसकी मार्केटिंग शुरू की.

वो गाँव के गरीब तबकों में जाता… लोगों को बताता कि उसका बनाया ये पाउडर किसी भी तरह से किसी अन्य महंगे डिटर्जेंट पाउडर से कम नहीं है… वो लोगों से विनती करता कि एक बार इस पीले पाउडर को जरुर आजमायें… और अगर अच्छा ना लगे तो तुरंत रिजेक्ट कर दें.

धीरे धीरे उस युवक ने फैब्रिक वॉश मार्किट में क्रान्ति ला दी…. गरीबों के लिए साबुन और अमीरों के लिए डिटर्जेंट पाउडर वाली आम धारणा को उसने ध्वास्त कर दिया… और साठ के अंतिम दशक में यानी 1969 में उसने अपने वाशिंग पाउडर को ब्रांड नेम दिया.

ये नाम उसने अपनी बेटी के नाम पर दिया था जिसकी मृत्यु कुछ साल पहले ही हुई थी… नाम था निरमा…. महज़ छोटी सी पूंजी लेकर धंधा शुरू करने वाले इस इंसान को आज लोग करसन भाई पटेल के नाम से जानते हैं. उद्योग जगत आज इन्हें डिटर्जेंट किंग के नाम से जानता है.

निरमा ने 70 के दशक में बाजार में सफलता के झंडे गाड दिए… सभी वर्ग में अपनी सरल और सुलभ पहुंच के लिए निरमा ने अपना स्लोगन रखा “सबकी पसंद निरमा “…

आज निरमा के देश भर में कई स्थानों पर कारखाने चलते हैं… अहमदाबाद, मेहसाणा, वडोदरा, भाव नगर, छ्त्राल, पोरबंदर… निरमा ने 2008 में अमेरिकी कम्पनी सेल्स वैली कारपोरेशन का अधिग्रहण किया है जिसके बाद वो दुनिया की सातवीं सबसे बड़ी सोडा एश उत्पादक कंपनी बन चुकी है.

आज करसन भाई पटेल की वजह से अहमदाबाद को लोग डिटर्जेंट सिटी के नाम से जानते हैं… निरमा 25 फीसदी मार्केट शेयर के साथ आज भारत में डिटर्जेंट किंग है… भारत के 8 हज़ार करोड़ के डिटर्जेंट कारोबार में उसकी हिस्सेदारी कुल 35% है…

और यही नहीं…. कभी साइकल से घूम कर पाउडर बेचने वाले करसन भाई पटेल की निरमा ने करीब 15 हज़ार लोगों को रोज़गार दिया है जिससे उनकी रोज़ी रोटी चलती है… निरमा ने ये साबित कर दिया कि अगर जज़्बा और हिम्मत हो तो आप हिन्दुस्तान लीवर जैसी शक्तिशाली बहुराष्ट्रीय कम्पनी को भी धूल चटा सकते हैं.

90 के दशक में निरमा ने कपड़े धोने वाले साबुन के बाद नहाने के साबुन बनाना शुरू किया… उन दिनों भारतीय मार्किट में सबसे बड़ा ब्रांड सिंथोल माना जाता था जो कि गोदरेज का प्रोडक्ट था… निरमा ने सिंथोल जैसे प्रोडक्ट को परास्त किया.

करसन भाई पटेल के चर्चे अब हार्वर्ड विश्वविद्यालय में केस स्टडी का विषय बन गए… कि आखिर बिना किसी प्रतिष्ठित कालेज से MBA किये एक आम गुजराती कैसे हिन्दुतान लीवर जैसी दिग्गज कम्पनी को धूल चटा सकता है.

निरमा ने ना सिर्फ उद्योग जगत में नयी ऊंचाइयों को छुआ बल्कि उसने निरमा एजुकेशन एंड रिसर्च फाउंडेशन जैसा शिक्षण संस्थान भी खोला है ताकि नयी प्रतिभाओं को व्यापार के गुर सिखाये जाएँ…

कभी साइकल से चलने वाले करसन भाई पटेल आज 2 बिलियन डॉलर वाली निरमा समूह के मालिक है… करसन भाई पटेल जैसे लोग हमें सिखाते हैं कि सपने छोटे मत देखो…. बड़े सपने देखो… भले ही उसे पूरा करने का प्रयास छोटा हो….

कहीं पढ़ा था –

एक टहनी एक दिन पतवार बनती है, एक चिंगारी दहक अंगार बनती है
जो सदा रौंदी गयी बेबस समझ कर, मिट्टी वही एक दिन मीनार बनती है.

इसलिए आगे बढ़ते रहिये…

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