लाल सलाम का भयावह सच और इसे छिपाए ले जाने की मक्कारी

कार्ल मार्क्स अपने ‘सह-क्रांतिकारियों’ के बारे में लिखते हैं, “हम बहुत क्रूर हैं, और जब हमारा समय आयेगा तो हम अपने आतंकवाद को छुपाएंगे नहीं.”

इसमें कोई शक नहीं कि हिंसा और आतंक, मार्क्सवादी विचारधारा का एक अटूट हिस्सा है और वामपंथियों का अफ़ज़ल प्रेम उसी हिंसक विचारधारा से निदेशित है.

एक दो बार नहीं, कई बार मार्क्स हिंसा और आतंक के इस्तेमाल की वकालत करते नज़र आते हैं :-

जर्मनी में ‘प्लान ऑफ़ एक्शन’ पर्चे में मार्क्स ‘मॉब वायलेंस’ के लिए प्रेरित करते हुए अपने समर्थकों को लिखते हैं, “विरोधियों पर हो रहे ऐसे ‘मॉब वायलेंस’ करने वाली भीड़ का हमें हाथ बटाना है.”

एम्पेरर विल्हेम की ह्त्या की कोशिश में विफल हो जाने पर उस आतंकी को मार्क्स अपने साथी क्रांतिकारी कवालेव्सकी के सामने गुस्से में कोसने लगते हैं.

विएना में क्रान्ति के विफल हो जाने पर मार्क्स एक लेख में लिखते हैं, “…नए समाज के जन्म में होने वाले कष्टों को संक्षिप्त करने का एक ही रास्ता है, और वो है क्रांतिकारियों द्वारा आतंक.”

एक बार मार्क्स ये भी लिखते हैं, “…इस पीढी को मरना होगा ताकि उन लोगों के लिए जगह बन सके जो नए समाज में रहने के लिए ‘फिट’ हैं.”

मार्क्स के मित्र फ्र्देरिक एंगेल तक ये कहते हैं, : “मार्क्स की सम्पादकीय-टीम केवल मार्क्स की तानाशाही थी.”

छात्र जीवन में हिंसा और पिस्तौल रखने के लिए गिरफ्तार किये गए मार्क्स के बारे में साथी क्रांतिकारी हिन्जेन का कहना था कि मार्क्स अक्सर जान से मार देने की धमकी देते थे.

समकालीन क्रांतिकारी माइकेल बौक्निन के शब्दों में, “मार्क्स को मानव-जाति के लिए कोई सहानुभूति नहीं थी… मार्क्सवादी अगर सत्ता हासिल कर लेते हैं तो उनकी तानाशाही बहुत खतरनाक होगी.”

आज देश में अपनी खोयी हुई ज़मीन हासिल करने को बदहवास लेफ्ट, लिबरल, या वामपंथी इसी हिंसा-अभिप्रवाहित मार्क्सवादी आइडियोलॉजी के अफीमी नशे में आतंकवादियों को समर्थन दे रहे हैं. पर कब तक?

सन्दर्भ :
(1) An essay by Karl Marx, “Class Struggles in France”,
(2) An essay by Karl Marx, “The victory of counter –revolution in Vienna”,
(3) Marx-Engels’s collected works “Gesamt-Ausgabe vol vi and vii”,
(4) Most famous biographer of Marx, Robert Payne’s “Marx”,
(5) Robert Payne’s quoting Heinzen’ account published in Boston,
(6) Jim Powell quoting Bonn University’s archives about Marx’ student life,
(7) Michael Bauknin’s “Selected Writings” edited by A Lehning

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