आधा अंग परेशान हो तो पूरा शरीर रोगी होता है

बचपन में इस बात का अंदाज़ा नहीं होता था कि बड़े हो कर ऐसे घुटन भरे माहौल में जीना पड़ेगा.

सुनते थे झाँसी की रानी, सरोजिनी, इंदिरा और बछेंद्री पाल आदि के बारे में लेकिन सोचा नहीं था कि हर रोज़ दुष्कृत्य की खबरों से सराबोर अखबार पढना पड़ेगा.

छोटी-छोटी बच्चियां, माताएं, किसी की बहनें, किसी की बेटियां, दामिनी, निर्भया और न जाने क्या-क्या.

सोचा न था कि ऐसे समाज से दो-चार होना पड़ेगा जहाँ किसी लड़की को देखना या बात करना भी गुनाह समझा जाएगा.

घूरने वाली नज़रों से ज्यादा घृणा आज उन निगाहों में होती है जो पलट कर किसी मर्द को देखती हैं.

एक लड़की, एक महिला से उसके सजने-संवरने का अधिकार छीन लिया गया और मर्द से उसके रक्षक होने का.

मज़े की बात ये है कि तथाकथित ‘नारी दिवस’ (Women’s Day) क्या है, ये आधी आबादी में जीने वाली आधी से ज्यादा महिलायें जानती ही नहीं.

मुझे एक और बात समझ में नहीं आती. बराबरी का दर्जा देना है तो किसी को वरीयता कैसे दी जा सकती है?

यदि मैं 27 का हूँ और एक लड़की भी 27 की है तो मेट्रो में वो मुझे उठा कर खुद कैसे बैठ सकती है? दोनों की शारीरिक क्षमता लगभग समान है. अब इस चर्चा में प्रसव पीड़ा को मत घुसेड़ दीजियेगा. फेमिनात्जियों का ये धारदार हथियार है.

भेदभाव तो तभी हो जाता है जब वर्गीकरण कर दिया जाता है. माँ होने का सुख मर्द को नहीं मिलता. मर्द को भी दर्द होता है साहब. अलग तरीके का होता है. घुटन होती है. समाज हो या शरीर, आधा अंग परेशान हो तो पूरा शरीर रोगी होता है.

समाज कभी पुरुष प्रधान रहा ही नहीं. समाज सांस्कृतिक व्यभिचार का शिकार हुआ जिसके कारण विसंगतियां पनपीं.

मनोदशा को दुरुस्त करें. उत्कृष्ट साहित्य पढ़ें. दुर्गा सप्तशती का अनुवाद पढ़ें. अच्छा सिनेमा देखें. इन्हीं सब चीजों से मनोवैज्ञानिक असर पड़ता है. मन्टो पढ़ोगे तो वही सब न दिमाग में घूमेगा!

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY