होली : बरसों नहीं, कई जन्मों के लिए यादगार

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“चल, इस बार यहाँ है तो साथ मनाते हैं होली! बरसों हो गए न? पुरानी यादें ताज़ा हो उठेंगी. मज़ा आ जाएगा!”

कई वर्ष हो गए होली मनाए, रंग खेले. मुझे याद आया, पिछले सात वर्षों से होली नहीं मनाई थी मैंने. नौकरी के चलते हमेशा बाहर रहता.

इसके अतिरिक्त भी एक कारण था और यह मुख्य कारण था मेरे होली न मनाने, रंग न खेलने का! बाहर रहने से मेरे लिए सरल हो गया था इस त्योहार को टालना. हाँ, होली खेलना टाला करता मैं!

मैंने कहा, “यार, अब कई साल हो गए… मुझे अरूचि सी हो गई है इस उत्सव से. समझ न! तुझे तो पता है कारण… अकारण होली बिगड़ न जाय तुम लोगों की.”

“अबे, हम पच्चीस-तीस लोग होंगे साथ. तुम दोनों को पता भी नहीं चलेगा एक-दूजे का…. मत करना बात!”

“भाई, क्यों धर्मसंकट में डाल रहा है? अपने इमोशन्स काबू न कर पाने की मेरी निर्बलता से भली-भांति परिचित है तू. उसकी व्यायसायिक कठोरता भी निर्बल कर देगी मुझे!”

मैंने भरसक प्रयत्न किया टालने का, पर वह था कि जिद पर अड़ा था. सात-आठ वर्षों पूर्व की होली पर, एक अत्यंत छोटी सी मिस-अंडरस्टैंडिंग के चलते, हम दोनों लड़ पडे थे. मैं और जयंत (काल्पनिक नाम है)!

मैंने ढेरों प्रयत्न किये थे उसे मनाने के, पर सब विफल रहे. हम दोनों के परस्पर विपरीत स्वभाव के चलते, असंभव सा प्रतीत होने लगा था उसको मना लेना.

फिर मैंने स्वयं को अलग कर लिया. नौकरी-स्थानांतरण के कारण आसानी हुई इसमें. अब मैं अपने शहर ही में पोस्टेड था तो वही हुआ, जिससे डर रहा था मैं….

शहर के बाहर, एक फार्म-हाउस पर होली मनाने की सारी तैयारियां की गई थीं. विविध प्रकार के सूखे-प्राकृतिक रंग, चिल्ड बीयर की बोतलों के क्रैट, उन्हें ठंडा रखने हेतु बर्फ, सब कुछ!

रंग देखे और पुरानी स्मृतियां एक-एक कर जीवंत होने लग गयीं. डीजे पर होली के मस्ती भरे गीत बज रहे थे. सारे मित्र भरपूर आनंद उठाने में व्यस्त! वह मित्र सच कह रहा था, तीस लोगों की भीड़ में सब कुछ सामान्य प्रतीत हो रहा था.

पर क्या सब कुछ सामान्य था? नहीं! मैं जानता था सब कुछ सामान्य नहीं है…. कम से कम मेरे लिए तो न था.

जयंत, हाथ में थामी बीयर की बोतल से घूंट लेते हुए, नृत्य में मस्त था. मेरे मन में पुरानी यादें नृत्य कर रही थीं. बीयर और नृत्य ही के साथ हल्का-फुल्का नाश्ता और रंगों की बौछार जारी थी.

करीब एक बजे हम लोग बैठ गए. किसी ने फ़िल्मी अंताक्षरी शुरू कर दी. दो ग्रुप में बंटे मित्रों ने दो घंटे अंताक्षरी का मज़ा लिया. वह बंद हुई तो लतीफ़ों-किस्सों का दौर शुरू हो गया.

मैं पूरे समय, चुप बैठा रहा. अत्यंत आवश्यक होने पर हाँ-हूँ कर देता! देखा जाए तो, जयंत के सामान्य व्यवहार से मुझे भी सामान्य हो जाना चाहिए था, पर नहीं हो पाया मैं. यह मैन्यूफैक्चरिंग डिफेक्ट तो है मुझमें.

तभी किसी को बोलते देख चौकन्ना हो गया मैं.

“अबे, हमारे बीच चार लोग हैं अच्छे गाने वाले… इनके गाने कब सुनेंगे हम? मैंने karaoke गीतों की सीडी लाई है साथ! क्या कहते हो?”

कहना तो सबने ‘हाँ’ ही था. फटाफट कॉर्डलेस माइक और सारी व्यवस्था कर दी गई.

“The best amongst us will sing first… उसको दे बे माइक!”, मेरी ओर इशारा करते हुए कहा गया.

मेरी हालत न थी गाने की, मैं बोला; “यारों, आजकल गा नहीं पाता हूँ मैं. रो पड़ने का डर लगता है. आवाज भी क्रैक करने लगी है… माफ़ कर दो मुझे! हाँ, आप सबके गा चुकने के पश्चात एक कविता अवश्य सुनाऊँगा, पक्का!”

सबने खूब मज़ाक उड़ाया, पर लगभग सारे ही मेरी दुर्बलता से परिचित थे. किसी ने फोर्स नहीं किया गाने को.

मैं निश्चिंत हो गया. घंटा-डेढ़ घंटा तो गाना चलेगा ही इनका, फिर वापिस लौटने की हड़बड़ी में किसे याद रहता है?

दो घंटे गानों का दौर चला. गीतों को सुनते हुए ही कुछ मित्रों ने, जिनमें मैं भी शामिल था, सामान समेट कर गाड़ियों में भरा…

“भाई लोगों, आओ सब! बरसों याद रहेगी, यह होली! अभी घंटा भर और है अपने पास…..पान खाएंगे! सारों के दो-दो पान बंधवा लाया था मैं….”, पानों की थैली निकाल कर अचानक मेरी ओर मुख कर कहने लगा, “हाँ भाई, आज की होली का समापन पान खाते और तुम्हारी रचना सुनते हुए होगा… क्यों?”

अचानक हुए हमले से बौखला गया मैं…. समझ नहीं आ रहा था क्या सुनाऊँ….कुछ याद भी तो हो! सबको पान बांटे जा रहे थे. सुनाना तो पड़ने ही वाला था.

अपने WhatsApp मैसेंजर पर किसी को भेजी गई बच्चन जी की कुछ रचनाओं का ध्यान हो आया. सोचा, उन्हीं में से सुना देता हूँ कोई! आनन-फानन में जो सामने आई उसे पढने लगा मैं….

हरिवंशराय ‘बच्चन’ की लगभग हर रचना, कई-कई बार पढ़ी है मैंने. पहली पंक्ति पढ़ते ही दूसरी याद आ जाती है. पहली पंक्ति के साथ ही रचना का भाव, जैसे मेरा मनोभाव हो गया था. एक-एक पंक्ति को, दो-दो बार, सस्वर पढ़ने लगा मैं.

गीत की पहली कड़ी खत्म होते-होते, आंखों ने बहना शुरू कर दिया. मेरे तल्लीन होकर पढने और आंखों से निकलते आंसुओं ने, सारे मित्रों को एकाग्रता से सुनने पर बाध्य कर दिया था.

बच्चन जी के शब्दों व मेरे मन में बसे भाव, स्वर की लहरों पर तैरते हुए, सुनने वाले मित्रों तक पहुँच रहे थे, अपने मूल रूप में!

“व्याकुल आज तन-मन-प्राण!

तन बदन का स्पर्श भूला,
पुलक भूला, हर्ष भूला,
आज अधरों से अपरिचित हो गई मुस्कान!
व्याकुल आज तन-मन-प्राण!

मन नहीं मिलता किसी से,
मन नहीं खिलता किसी से,
आज उर-उल्लास का भी हो गया अवसान!
व्याकुल आज तन-मन-प्राण!

आज गाने का न दिन है,
बात करना भी कठिन है,
कंठ-पथ में क्षीण श्वासें हो रहीं लयमान!
व्याकुल आज तन-मन-प्राण!”

तीन कड़ियों की छोटी सी रचना, आधे घंटे में समाप्त हुई. सारे मित्र भाव-विभोर थे कि तभी, सामने बैठे मित्रों में से एक उठकर, लगभग सुबकते हुए मुझसे लिपट गया.

आंखों के आंसुओं से मेरी दृष्टि धुंधला गई थी, उस पर रंगों से सराबोर चेहरा! पहचानने में समय लगा…

यह जयंत था!

मन की दमित भावनाओं, कुछ नशे की खुमारी और बच्चन के भावशिल्प का असर हुआ. सारा मनभेद, सारा विषाद और सारा अहंकार, अश्रुओं के संग बह निकला!

बाकी साथी भी इस अनुपम दृश्य को देख विभोर हो गए! जिसके आग्रह ने आज की होली दिखाई थी, वह मित्र कहने लगा;

“बरसों नहीं, कई जन्मों के लिए यादगार बना दी तुम दोनों ने यह होली!!!”

(कुछ वास्तव है तो कुछ कल्पना….. बताना छूट गया सो…)

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