पुरुष का तो काम ही होता है पुरुषार्थ करना

एक बात बताओ कि मोदी को क्यों नहीं रहना चाहिए बनारस में?

अच्छा सेनापति कौन होता है? जो फ्रन्ट पे जा कर खुद लड़े.

क्या अपने घर के किसी उत्सव में घर के मुखिया-बुजुर्ग आदि को नहीं होना चाहिए? जबकि ये तो लोकतंत्र का महापर्व है. और पर्व भी कैसा… चुनाव का!

जब घर में बच्चों की शिक्षा से लेकर शादी-व्यापार का चुनाव करना होता है तो घर के बड़ों का रोल होना चाहिए या नहीं? और यहां तो पांच साल के राजनैतिक नेतृत्व को चुनना है.

ऐसे में क्या अपने क्षेत्र को मझधार में छोड़ देना चाहिए? वो भी तब, जब जाने कैसे-कैसे लोग घर पर आँख लगाए बैठे हों? नहीं…

और फिर क्या वो पहली बार बनारस आये हैं? क्या सिर्फ चुनाव में आते हैं? नहीं, बार-बार आते रहते हैं. इसका मतलब ही है कि वो इसे अपना मानते हैं.

असल में जो उनके बनारस में आने पर सवाल खड़े कर रहे हैं वो किसी ना किसी तरह अपनी जीत दर्ज करना चाहते थे जो अब मुश्किल हो चली है.

इस पूरे घटनाक्रम का एक पहलू और है. इसके पहले किसी प्रधानमंत्री को यूं खुले में घमूते देखा है? नहीं! तो क्या यह उपलब्धि नहीं कि देश-समाज में भय का वातावरण ख़त्म हुआ है।

दशकों बाद देश का प्रधानमंत्री आज जनता के बीच है। जाने-अनजाने यह संदेश गया है कि देश का मुखिया अपने ही देश में खुले में घूम सकता है और घूम रहा है.

और जो यह कहते हैं कि ये चुनाव आसान नहीं… तो सच ही तो कहते हैं कि ये लड़ाई बेहद कठिन है, जहां पूरी राजनीति भ्रष्ट है जिसमें राजनीतिक पार्टियां-मीडिया बिक चुके हैं और नेता पत्रकार सत्ता के दलाल बन गए हैं.

जहां पर एकाधिकार वाली पारिवारिक मगर तानाशाही पार्टियां अपना उल्लू सीधा करने के लिए क्या क्या षड्यंत्र नहीं कर रहीं. जहां राजनीति में एक से बढकर एक बाहुबली हैं.

जब लड़ाई बेहद खतरनाक ढंग से खतरनाक लोग लड़ रहे हों और दूसरी तरफ जनता, मासूम, कमजोर, भयग्रस्त, गरीब और सदियों से उपेक्षित और बटीं हुई हैं तब तो अपनी पूरी ताकत झोंकना उचित और आवश्यक हो जाता है.

और जो ज़मीन पर उतर कर कर्म करते हैं वही कर्मयोगी कहलाते हैं, जो फ्रंट पर लड़ते हैं वही योद्धा कहलाते हैं, पुरुष का तो काम ही होता है पुरुषार्थ करना.

इतनी उम्र में, इतनी मेहनत, इतनी रैलियां, इतनी भागदौड़, इतना काम! बल्कि यह ये बतलाता है कि एक व्यक्ति के रूप में अपने लोगों के प्रति मोदी कितने जवाबदेह हैं, सतर्क हैं, प्रयत्नशील हैं, प्रयासरत हैं.

पूर्वांचल वालों, जो गलती दिल्ली और बिहार करके पछता रहा है वो आप मत करना. आज बनारस और पूर्वांचल देश की राजनीति का केंद्र है तो इस पर आपको अभिमान होना चाहिए. लेकिन समझना भी होगा कि हर बार आप ही लोग क्यों छले जाते हो.

और एक बात और ध्यान रहे, कोई कसर नहीं छोड़ना, वर्ना महाराष्ट्र और मुम्बई में क्या हुआ याद है ना, थोड़ी सी सीटों की कमी के कारण एक हफ्ता वसूल गिरोह किस तरह से ब्लैकमेल कर रहा है, हम सब देख रहे हैं.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY