हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास-7 : ‘लगता तो नहीं, पर इतने लोग कर रहे हैं तो हो सकता है’ का दबाव

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सिन्ताश्‍ता और आन्द्रोनोवो संस्कृतियों के लक्षण कुछ बाद में अपनी चरित्रगत विशिष्टताओं और वैविध्यों के साथ प्रकट हुए परन्तु एक बात पर कोई विमति नहीं दिखाई देती कि उस क्षेत्र में बहुत पहले से तीन भाषाभाषी समुदायों के लोग उपस्थित थे. ये तीन भाषाएं आज की शब्दावली में आर्य, द्रविड़ और मुंडा है! भारत में इन समुदायों की पृथक उपस्थिति है, इनके मेल से बनी भाषाएं भी मिलती हैं और इनके विभेद भी मिलते हैं. यह अलग विषय है और इस पर यहां चर्चा नहीं हो सकती.

मध्येशिया के विषय में हमारी जानकारी बहुत सीमित है और उस क्षेत्र की भाषाओं में, यहां तक  कि मंगोल आदि में भी इनके कुछ तत्वों को तलाशा जा सकता है और आस्ट्रिया, उक्रेन और फिनलैंड आदि में मुंडारी तत्वों के प्रभाव अधिक गोचर हैं जिनके कारण इनको फिनोउग्रियन की संज्ञा दी गई है.

हम उस पांडित्य से बच कर अपनी बात रखना चाहते हैं जिसकी हर इबारत बार बार और कई तरीकों से दुहराए जाने के कारण सही, और जांचने के बाद गलत सिद्ध होती है. मुझे यदि अपनी समझ पर इतना भरोसा होता कि मैं मान पाता कि मैं यूरोप के असाधारण प्रतिभा और ज्ञानसंपन्न विद्वानों से अधिक प्रखर, अधिक ज्ञानी हूं, तो मुझे उनकी नीयत पर शक करने का कारण नहीं मिलता. मैं यह जानता हूं कि मैं उस ज्ञान और क्षमता का व्यक्ति हूं जिसे मीडियोकर या मध्यम समझ का व्यक्ति कहा जाता है इसलिए मुझे यह शिकायत करनी होती है कि जो बात मुझ जैसे मन्दबुद्धि की भी समझ में आती है वह उनकी समझ में क्यों न आई और यदि आई तो वे इसे छिपा क्यों ले गए!

परन्तु हम अपने प्रख्यात विद्वानों के विषय में क्या कहें. कहने को कुछ बचता है तो प्रचार शक्ति जिनके पास हो वे ऐसे असंभव काम भी कर सकते हैं जो तलवार भांजने वालों से संभव नहीं!

वे अपनी योजना के तहत बताते रहे कि उस क्षेत्र में (काला सागर के उत्‍तर दद्यनीपर और नीस्‍तर नदियों के अश्‍वबहुल क्षेत्र) जिसे अमेरिकी पुरातत्वविद मारिजा जिंबुतास ने कुर्गान संस्कृति कहा था, उसमें आर्यभाषा भाषियों की सबसे पुरातन उपस्थिति दिखाई देती है और इसके प्रमाण उन्होंने अपने ढंग से दिए थे और यह बताया था कि ये उस क्षेत्र के अभिजात जन थे! अश्‍व पालन और अश्‍व प्रशिक्षण इन्होंने आरंभ किया. अश्‍वपालन करने वाले भी उनके सहायक थे और संभवत: उनके द्वारा संरक्षित भी. व्‍यापार पर स्‍वामित्‍व उनका था.

मैं जिंबुतास की ईमानदारी पर सन्देह नहीं करता, पर वह उस बहु प्रचारित मान्यता के प्रभाव में आ गई थीं कि आर्यजन पशुपालक थे और अश्‍वपालन का काम भी उन्होने ही आरंभ किया. यह सच है कि पशुपालन का आरंभ भारत में हुआ. परन्तु हमें यह भी समझना होगा कि पशुपालन है क्या.

जब आप पशुओं को घेर कर, उनका शिकार करते है, तात्कालिक उपयोग से अधिक पड़ने वालों को बाद के लिए रोक कर रखते हो और उनका बाद में मांसाहार करते हैं तो यह रेवड़बन्दी है और जब आप उनको किसी अन्य स्रोत के लिए प्रयोग में लाते हों और उसमें अनुपयोगी को आहार के लिए प्रयोग में लाते हों तो यह पशुपालन है!

इसमें बकरी, भेड़, गाय और कुछ बाद में भैंस और ऊँट का पालन किया गया! इस अन्य उपयोग में उनकी भारवहन क्षमता, गति आदि अनेक घटक आते हैं. जिनका कोई अन्य उपयोग नहीं हो सकता उनका मांसाहार किया जाता रहा है, जैसे हिरन, और दूध देने वाले जानवरों के नर. दूसरा कोई उपाय न था. इसलिए अन्य उपयोग में न आने वाले नर पशुओं और पक्षियों का वध होता रहा है, क्‍योंकि इसके बिना उनको जिला कर रखने का आर्थिक भार इतना अधिक होता कि इसका निर्वाह नहीं किया जा सकता था.

जिस चरण से आगे किसी प्राणी के नर का भी इतर उपयोग करने की सूझ पैदा हुई उस चरण से आगे उसको बचाने की चिन्ता भी आरंभ हुई और अशिक्षित समाजों में इसे व्यवहार्य बनाने के लिए इसे वर्जना का रूप दिया गया. फतवा उसी का रूप है और यह इस बात की आशंका पैदा करता है कि क्या प्रचार और शिक्षा के साधनों के विकास के बाद वर्जना का सहारा लेने वाला समाज आधुनिक है या आधुनिक चुनौतियों का सामना करने में सक्षम है!

वर्जना के बहुत सारे रूप हैं जिनमें प्राण जाय पर प्राणी न जाये की स्थिति आ जाती है, परन्तु है यह आधुनिक चुनौतियों के प्रतिकूल है और जिस समाज में यह बना रहता है उसे पीछे ले जाने की योजना का अंग है.

हम निवेदन यह कर रहे थे कि प्रचारतन्त्र के बल पर आर्यों को, यदि इस शब्द का प्रयोग वैदिक समाज के लिए या उसके व्यापारियों के लिए करते हुए उन्हें गंवार, पशुचारी, उपद्रवी आदि सिद्ध किया गया, तो उसका कहीं कोई साहित्यिक या पुरातात्विक प्रमाण न था. जिस बात के प्रमाण थे परन्तु उसको नकारा जा रहा था. और इसके दबाव में हमारे ऐसे विद्वान भी जिनको आत्मगौरव से शून्य नहीं माना जा सकता, वे भी ‘लगता तो नहीं है पर जब इतने लोग कर रहे हैं तो हो सकता है ऐसा ही हो’ के दबाव में आ कर उसका प्रतिरोध नहीं कर सके.

जहां जहां आर्यभाषाभाषियों की उपस्थिति के क्षीणतम प्रमाण पाए गए थे, उनमें कहीं भी उनको पशुपालक नहीं पाया गया! कुर्गान संस्कृति हो या मध्येशिया के वे स्थल – डैश्‍ली, सपल्ली, बख्‍तर मर्गियान संकुल – या इससे बहुत पहले उस संस्कृति जिसे कुर्गान संस्कृति का नाम दिया गया था, या लघु एशिया और ईरान में, सभी में उनके पुरातात्विक अवशेष यह प्रमाणित करते है कि वे अपने परिवेश के नागर संस्करों वाले, अपनी अलग-थलग प्राचीरवेष्ठित बस्ती बसा कर रहने वाले सर्वाधिक सभ्य जन थे, परन्तु इस पुरातत्व से उनकी काल्पनिक मान्यता की पुष्टि नहीं हो रही थी, इसलिए यह घोषित कर दिया कि आर्यों का पुरातत्व है ही नहीं! आर्य शब्‍द का अर्थ भी सभी मानते हैं सभ्‍य और सुसंस्‍क़त है. वे अपने को स्‍वयं अग्रणी मानते थे – तिस्र: प्रजा आर्या ज्‍योतिरग्रा.

ऐसे स्थल या केन्द्र जो विदेशों में बसे थे, वे अधिक नहीं थे. उनका सही हिसाब किसी के पास न था. इनको स्वर्ग कहा जाता था, हम इसमें सुधार करते हुए इन्हें स्वर्गोपम कह सकते हैं, जैसे सुमेरी दिलमुन को या बहरीन में बने अड्डे को मानते थे या अरब भारत को जन्नतनिशां कहते थे या हम कश्‍मीर को कहने के आदी रहे हैं.

जहां सम्पन्नता, सौन्दर्य और वैभव हो वह स्वर्ग है इसलिए पुराने ग्रंथों में स्वर्ग की विविध दूरियां बताते हुए उनकी संख्या सात, नौ आदि बताई जाती थी.

हम यहां केवल यह प्रश्‍न करना चाहते हैं कि यदि ये अपने को दूसरों से इतना ऊपर समझते थे तो इनका स्थानीय जनों के प्रति व्यवहार क्या रहा होगा. इनकी अग्रता से चमत्कृत स्थानीय जन उन जैसा बनने का प्रयत्न करते हुए भी उनसे कितना अपमानित अनुभव करते रहे होंगे और इनसे कितनी घृणा पालते रहे होंगे? प्रेम तो नहीं कर सकते थे, उनके अनुचर या सहायक बनने को बाध्य थे, यह दूसरी बात थी.

इसका दूसरा पक्ष यह कि व्यापार आदि कारणों से देशान्तर में जाने वाले और वहीं लंबे समय तक बस जाने वालों को भी भारतीय मूल भूमि से चिपके रहने वाले या केवल सार्थवाह का अंग बने रहने वाले, क्या सम्मान की दृष्टि से देखते रह सकते थे! वे इनके लिए व्रात्य या व्रतच्युत और पुनः संस्कार और प्रायश्चित के बाद ही समाज में प्रतिष्ठा पाने का अधिकारी मानते थे.

स्वयं अपने ही जनों में इसकी भिन्न प्रतिक्रियाएं होती रही होंगी परन्तु आर्यो के अपने श्रेष्ठताबोध और दूसरों के प्रति अवज्ञा भाव, म्लेच्छ, मृध्रवाज, वध्रिवाच आदि कह कर उनका अपमान, उनके मन में आर्यों के प्रति सम्मान का भाव जगाता रहा होगा या भयमिश्रित अनुपालन की ओर क्षतिपूर्ति के रूप में जुगुप्सा और घृणा का?

हम इसका अनुमान ही कर सकते हैं क्योंकि इसके लिखित प्रमाण विरल हैं परन्तु उनको न सही परिप्रेक्ष्य में रखा गया न ही समझने का प्रयत्न किया गया. इन प्रमाणों की जितनी जानकारी है उस पर कल विचार करेंगे.

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