पुरोहितजी कहिन : कहानी जगत वेंडे की

हमारे यहां “वेंडे ” का मतलब होता है पागल, बेवकूफ, मंदबुद्धि. तो भाई ऐसा ही एक वेंडा था एक गांव में, अपनी हरकतों की वजह से बहुत जल्दी उसकी पहचान बन गई कि वह एक घोषित वेन्डा है. सभी उसको वेन्डा वेन्डा कहते थे लेकिन वह स्वयं को वेन्डा मानने को तैयार नहीं था. उसको अक्सर यह लगता है कि ये लोग समझते नहीं है और यूँ ही मुझे बदनाम कर दिया है गाँव भर में जबकि मैं वेन्डा नहीं हूँ.

एक दिन उसके दिमाग में विचार आया कि मैं बेवजह यहाँ बदनाम हो गया हूं क्यों न किसी दूसरे गांव चला जाऊं. वहां देखता हूं कि लोग कैसे मुझे वेन्डा कहते हैं.

तो साहब जगत वेंडा दूसरे गांव को गया, वहां पहुंचते पहुंचते उसे तेज प्यास लगने लगी तो वह गांव के बीच एक कुँए की तरफ गया. वहां कुछ युवतियां कुएं से पानी निकाल रही थी और अपने घर को पानी लेकर जा रही थी.

ऐसे ही एक स्त्री ने जब कुँए से पानी की गगरी खींची तो वेन्डे ने जा कर उनसे जल पिलाने का आग्रह किया. जैसा कि गावों में होता है कुँए पर पानी पिलाने के लिए आपको अपनी हथेली अपने मुंह के पास रखकर ओख मांडणी पड़ती है. तो वेंडे ने भी अपनी हथेली मुंह पर रखकर ओख मांडी और उस स्त्री ने उसकी ओख में पानी डालना शुरु किया और वेन्डा पानी पीने लगा.

जब वेन्डा पानी पी चुका था तो जैसा कि करना चाहिए मतलब सिर हिलाकर यह संकेत नहीं कर सका कि भाई मेरी प्यास तृप्त हो गई अब पानी डालना बंद कीजिए. तो उसके सर नहीं हिलाने की वजह से स्त्री पानी डालती गई और वह पानी पीता भी नहीं बस मुंह लगाकर खड़ा ही रहा और पानी लगातार नीचे गिरने लग गया.

ऐसे में वहां खड़ी एक स्त्री ने उससे कहा ,” ऐ रे वेंडे चल हट जा यहां से.”

आश्चर्यचकित वेंडा उस स्त्री की तरफ देखने लगा और सारी स्त्रियां हंसने लग गई. वेंडे ने उस स्त्री से पूछा कि आपको कैसे पता कि मैं वेंड़ा हूं जो आप भी मुझे वेंडा कह रही हैं.

तो स्त्री ने कहा कि बेटा वेंडे सब जगह वेंडे ही होते हैं. तेरी हरकतें बताती है कि तू वेंडा है किसी प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है.

वैसे अब तक तो आप समझ गए होंगे कि मैं किस राष्ट्रीय वेंडे की बात कर रहा हूं, जो कभी आलू उगाता है फैक्ट्रियों में, कभी मेड इन यूपी आम बेचता है अमेरिका में और कभी नारियल का जूस निकालता है लंदन में.”

हरि ओम.हरि ओम.हरि ओम.
ईश्वर सबको सद्बुद्धि दें.

स्कूल के समय एक श्लोक पढ़ते थे –

” येषां न विद्या तपो न दानम,
ज्ञानम न शीलम गुणो न धर्मम् ,
ते मृत्युलोके भुवि भार भूता ,
मनुष्य रूपेण मृगाश्चरंति..

तो मेरे यूपी वाले प्रिय भाइयो/बहनो कल इस ” जगत वेंडे ” और उसके नकटेड अर्धवेंडे साझीदार को सबक सिखाना मत भूलना.

(कृपया व्यंग्य को व्यंग्य की तरह ही पढ़ें)

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