JNU में 35-40 साल की उम्र के छात्र… क्यों और कैसे?

दो सवाल हैं… मुझे लगता कि सभी के मन में ये आते ही होंगे…

1. JNU में ये छात्रों की उम्र 35-40 साल कैसे है ?

2. मोदी सरकार JNU में पढ़ते इन देशद्रोही छात्रों से निबटने के लिए क्या कर रही है?

2014 में मोदी सरकार के आने के बाद से JNU उबाल पर है. वहां लगातार विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं. दलित और अल्पसंख्यकों की दुश्मन फासीवादी मोदी सरकार के खिलाफ JNU लगातार आंदोलनरत है.

पिछले साल फरवरी को JNU के इन छात्रों ने देश को तोड़ने के नारे लगाए. इस साल रामजस कालेज में इन्होंने वही काम दोहराया, नारे लगाने का, आज़ादी का.

इसके अलावा नजीब की गुमशुदगी को लेकर कई महीनो से जंतर मंतर पर प्रदर्शन हुए, इंडिया गेट पर हुए. JNU में लगातार VC साहब का घेराव चला. नारे, ढपली और क्या क्या.

पिछले एक-डेढ़ महीने से एक और आंदोलन चल रहा है आक्युपाई एडमिनिस्ट्रेटिव बिल्डिंग. इसके पहले करीब डेढ़ साल पहले आक्युपाई यूजीसी चला था.

JNU के इन छात्रों और उनके प्रोफेसरों का इन दोनों आंदोलनों में ये आरोप है कि मोदी सरकार उच्च शिक्षा के खिलाफ है. वो उच्च शिक्षा का बजट कम कर रही है. संघ के एजेंडे को लागू कर रही है. दलित और माइनारिटी छात्रों का उच्च शिक्षा में प्रवेश बंद करना चाहती है.

JNU में आक्युपाई एडमिनिस्ट्रेटिव बिल्डिंग आंदोलन इसी आधार पर चल रहा है कि मोदी सरकार दलित और मुस्लिम छात्रों के खिलाफ है, और यूजीसी के एक नियम को लागू करके दलितों और मुस्लिम छात्रों के विश्वविद्यालयों में प्रवेश पर अंकुश लगा रही है.

आह, मोदी सरकार… दलितों और मुस्लिमों की दुश्मन सरकार…

यूजीसी का एक नियम है कि एक प्रोफ़ेसर जो अपने तहत छात्रों को पीएचडी करा रहे हैं एक समय में 8 छात्रों को ही PHD के लिए गाइड कर सकते हैं.

PHD का अर्थ रिसर्च होता है. यूजीसी ने कहा कि रिसर्च में दोतरफा कम्युनिकेशन होता है. पीएचडी गाइड और स्टूडेंट दोनों आपसी बातचीत करते हैं जबकि एक क्लास में एक प्रोफ़ेसर 30, 50, 100 कितने भी स्टूडेंट को एक साथ पढ़ा सकता है. लेकिन रिसर्च में एक गाइड अनेक स्टूडेंट को एक साथ बैठा कर नहीं पढ़ा सकता.

ये नियम JNU में इस साल VC साहब ने लागू कर दिया. ये कथित जनवादी प्रोफेसर्स जिनके तहत कन्हैया, उमर खालिद जैसे स्टूडेंट पीएचडी कर रहे हैं, उनके पास 20 से ज्यादा पीएचडी स्टूडेंट हैं.

आमतौर पर एक पीएचडी स्टूडेंट 3 से पांच साल में पीएचडी कर लेता है. JNU में लोग अधिकतम समय 7 साल लेते हैं और अक्सर दुबारा एडमिशन ले लेते हैं. इसीलिए आपको 35-40 साल के छात्र JNU में दिख जाते हैं.

पीएचडी के बहाने होस्टल मिल जाता है, स्कॉलरशिप मिल जाती है. सस्ता खाना, किताबें हैं ही. क्रांति चलती रहती है, बहुतों को विदेशी मदद मिल जाती है.

पिछले साल इसीलिए मोदी सरकार ने स्कॉलरशिप मिलने के नियम बदले थे. जिसके खिलाफ भी बड़ा विरोध प्रदर्शन हुआ था.

कल हैदराबाद की उस्मानिया यूनिवर्सिटी में यूजीसी के इन्ही नियमों के खिलाफ उग्र प्रदर्शन हुआ. मोदी सरकार अल्पसंख्यकों की दुश्मन सरकार है. बता दें कि इसी उस्मानिया यूनिवर्सिटी में दो साल पहले बीफ फेस्टिवल ऑर्गेनाइज हुआ था.

दरअसल केंद्र सरकार संविधान और कानून के दायरे में रह कर ही काम करेगी और वो दिखेगा नहीं. क्योंकि उसका प्रचार नहीं होता. लेकिन इन देशद्रोहियों की छटपटाहट देख कर पता चल जाता है कि चोट कैसे पहुँच रही है.

ये देशद्रोही इस चोट को दलितों और मुस्लिमों के प्रति मोदी सरकार का दमन बताते हैं, संघ का एजेंडा बताते हैं. दुष्प्रचार करते हैं, लोगों को बेवकूफ बनाते हैं.

हकीकत पहचानना सीखना पड़ेगा.

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