वामपंथ : Schizophrenia OF The beautiful mind

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वामपंथ को आप कितना समझते हैं?
क्या आप कभी चवन्नी अठन्नी पाई धेला भर वामपंथी रहे हैं? वामपंथियों को सबसे अच्छा वे समझते हैं जो कभी वामपंथी रहे हैं… मैं भी कभी धेला पाई भर वामपंथी रहा हूँ…

श्चिज़ोफ्रेनिया (Schizophrenia) का नाम सुना है? यह एक मनोरोग है, सायकोसिस कहते हैं इसे… सायकोसिस, यानि एक ऐसी मानसिक अवस्था जिसमे रोगी की रियलिटी, उसकी दुनिया आपकी हमारी दुनिया से अलग होती है. उनकी अपनी एक अलग ही रियलिटी होती है…

एक फिल्म है “The beautiful mind” …एक गणितज्ञ जॉन नैश के जीवन पर. आधी फिल्म तक फिल्म में यही दिखाता रहा कि कैसे जॉन नैश का केजीबी वाले पीछा कर रहे हैं, उसे आदेश दे रहे हैं, वह भाग रहा है… एक कमरे में बंद होकर वह एक टॉप सीक्रेट मिलिट्री मिशन के लिए काम कर रहा है… और आधी फिल्म के बाद पता चलता है कि यह सब सायकोसिस था, उसकी बीमारी का भाग था.

जॉन नैश को श्चिज़ोफ्रेनिया था, पर उसके लिए यही रियलिटी थी… और जबतक आपको पता नहीं चल जाता कि यह सायकोसिस है, आप उसके नैरेटिव को सब्सक्राइब करते हैं और वह आपको भी वास्तविक ही लगता रहता है…

वामपंथ एक तरह का sociopsychosis है. उनकी सोशल रियलिटी कुछ और है. उसमें वर्ग संघर्ष है, क्रांति है, समानता है… तरह तरह की बकवास है जो आपको तबतक दिखाई नहीं देगा जब तक आप उनके नैरेटिव को सब्सक्राइब नहीं करेंगे, या आप खुद उनके सायकोसिस से ग्रस्त हो जायेंगे.

जो भी वामपंथ समर्थक हैं, सभी वामपंथी नहीं हैं. उसमे से अनेक लोग हैं जो सिर्फ सिनेमा के दर्शक हैं. वे उनका नैरेटिव सब्सक्राइब करते हैं, क्योंकि आज तक नैरेटिव बिल्डिंग का, कथ्य-निर्माण (क्योंकि तथ्य और सत्य का निर्माण नहीं हो सकता, कथ्य का निर्माण हो सकता है) का धंधा उनके ही हाथ में रहा है. पाठ्यपुस्तकों, इतिहास लेखन, कला-साहित्य-सिनेमा पर उनकी पकड़ ने दर्शकों को कब्जे में रखा है… उन्हें अपना नैरेटिव परोसते आये हैं.

पर “The Beautiful mind” फिल्म की तरह जैसे ही दर्शकों को बताया जाता है kiकी जो कुछ भी आप अभी तक देखते आये हैं, वह जॉन नैश का सायकोटिक एक्सपीरियंस था.. कि कहानी स्पष्ट हो जाती है. एकाएक आपको वह स्किजोफ्रेनिआ का मरीज, एक मनोरोगी नज़र आने लगता है.

वामपंथ बहुत ही खराब सामाजिक मनोरोग है… आपको एक उदहारण दूंगा…

जब मैं अपने आपको धेला भर वामपंथी समझता था, तो बिलकुल कार्ल मार्क्स का नाती समझता था. 70 के दशक का मोमेंटम 80 के दशक में भी था जिसमे मेरी किशोरावस्था गुजरी है. पढ़ने के नाम पर सबसे सुलभ और सस्ती प्रगति प्रकाशन की रूसी किताबें ही थीं, जिसमें चेखोव और दोस्तोयेव्स्की के साथ साथ तीसरे दर्जे का वामपंथी साहित्य भी खपा दिया जाता था… तब की अपनी सोच बताता हूँ…

11वीं क्लास में कॉलेज में एक टर्मिनल एग्जाम हुआ था, उसमें अंग्रेजी में patriotism पर एक लेख लिखने आया था… मुझे याद है, तब मैंने लिखा था…patriotism दुनिया के सभी मानवीय सेंटीमेंट्स में सबसे खराब और हानिकारक सेंटीमेंट है… दुनिया में सभी लड़ाइयों की, खून खराबे और संघर्ष की जड़ है… व्यक्ति को बाँध कर रखने का, उनके मानसिक आध्यात्मिक विकास को अवरुद्ध रखने का साधन है… एक गुलामी है जो आदमी अपनी मर्जी से चुनता है…

तब मैंने कहा था… व्यक्ति के आत्म निर्णय का अधिकार सबसे प्रमुख है… अगर कश्मीर के लोग अलग होना चाहते हैं तो हो जाएं… उन्हें बांध कर रखने से हम क्या अचीव कर रहे हैं?

बाद में समझ में नहीं आया था कि मेरे इतने धाँसू लेख के बावजूद मेरे नंबर इतने कम क्यों आये. वह पटना यूनिवर्सिटी था, कोई जे एन यू नहीं… इसके बारे में अपने भैया से बात की तो उन्होंने सरल शब्दों में इतना ही कहा था …patriotism का मतलब किसी देश से लड़ाई लड़ना नहीं है… सड़क के किनारे नहीं मूतना, स्टेशन पर नहीं थूकना, सड़क पर बाएं से चलना, कूड़ा कूड़ेदान में डालना सब patriotism ही है…

खैर, मैं सिर्फ एक नैरेटिव का सब्सक्राइबर था… दर्शक था… जल्दी ही निकल आया. बहुत से लोग जो इन वामपंथियों से सहानुभूति रखते हैं, वे सिर्फ दर्शक ही हैं…. अगर हम उन्हें एक काउंटर-नैरेटिव देते रहेंगे, वामपंथ की सच्चाई बताते रहेंगे उन्हें सच दिखाई देता रहेगा…जो सचमुच के वामपंथी हैं… जिनके खून में यह वामपंथ घुलमिल गया है… उनका यह सायकोसिस नहीं जाने वाला…
या शायद चला जाये बिजली के झटकों से… उसका भी इंतज़ाम करना पड़ेगा शायद…

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