पर कभी-कभी चुरा लेता हूँ… कभी-कभी…

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पिछले महीने हिन्दी उपन्यासकार वेदप्रकाश शर्मा का निधन हो गया. यह मेरे लिए महज़ एक सूचना थी. जीते थे तब कोई प्रेम न था और देहांत हो गया तो कोई दु:ख न हुआ.

उन पर लिखने जैसा कुछ भी नहीं है मेरे पास सिवाय एक वाक्य के कि 24-25 साल पहले घर आए एक परिचित लौटते वक्त स्व. शर्मा का एक उपन्यास भूल गए और उसके कुछ pages मैंने पढ़ डाले… पूरा नहीं कर सका, क्योंकि इस genre में श्री सुरेंद्र मोहन पाठक को पहले से पढ़ता चला आ रहा था और पाठकजी को पैमाना माने तो स्व. शर्मा was a total failure.

किताबों के इश्क में कब पड़ा ये मुझे याद नहीं… पर सबसे पुरानी याद अगर खोदूं तो उसमें भी मैं खुद को किताब लिए बैठे ही पाता हूँ… चंपक… उम्र… यही कोई 6 साल…

पापा बिज़नस टूर पर जाते तो बिना कहे उन्हें मेरी फरमाइश पता होती… लौटते वक़्त उनके साथ होतीं चंपक, पराग, नंदन और हाँ… चंदा मामा

स्व. माताजी हिंद पॉकेट बुक्स की सदस्या थीं… हर महीने तीन किताबें VPP से आती थीं, डाकिए को पैसे देकर पार्सल लिया जाता था… 12 रूपए मूल्य की 3 किताबें दस रूपए में मिलती थीं, डाक खर्च फ्री… यानी एक पॉकेट बुक की कीमत 4 रूपए…

हसरत भरी निगाहों से उन किताबों को ताकते-ताकते मैं 8 साल का हुआ तो साहस कर अम्मा से पढ़ने के लिए मांगीं… शुरुआती ना-नुकुर के बाद उन्होंने एक पुस्तक पकड़ाई… मुल्कराज आनंद की शहीद… 8 साल के बच्चे के लिहाज़ से अबूझ और इसलिए बोझिल थी…

उसे वापस कर दूसरी माँगी तो डांट पड़ गई और आगे किताबें पाने का रास्ता भी बंद हो गया..

एक साल बाद यानी नौ साल की उम्र… ज़िंदगी का पहला रोमांटिक नॉवेल पढ़ा… चोरी-चोरी…. हुआ यूं कि अम्मा वो पढ़ रही थीं… तभी नीचे की मंजिल से मकान मालकिन ने उनसे स्वेटर की डिजाइन समझने के लिए नीचे बुलाया… अम्मा उपन्यास वहीं छोड़कर नीचे गईं और अपन ने लपक लिया…

करीब 50 मिनट में पूरा पढ़ मारा… दुनिया में बहुत रोमांटिक नॉवेल्स… देशी-विदेशी लेखकों के होंगे…. पर जो मैंने पढ़े उनमें से ये सर्वश्रेष्ठ था और है… पढ़ते-पढ़ते ही मैं आशिक हो गया था… आशय मिजाज़ में बदलाव से है… ये जो कहा जाता है न कि -‘मिजाज़ लड़कपन से ही आशिकाना है’… इसका पूरा श्रेय इस उपन्यास को है…

नाम था – मैं फिर आऊंगी, लेखक – ए हमीद… पाकिस्तान चले गए थे या शायद पाकिस्तान में ही जन्में थे.

दस साल का होने तक वर्तमान निवास में आ गया था… बच्चों के जासूसी उपन्यासकार एस सी बेदी (राजन-इकबाल सीरीज़) से परिचय हुआ… एक – डेढ़ रूपए में आने वाले ये बाल-उपन्यास इतने पतले होते कि मैं 15-20 मिनट में ही चाट डालता… पुस्तक विक्रेता के यहाँ जा कर किताबें तलाशने के नाम पर एक-दो वहीं पढ़ डालता और बाद में कोई दूसरी एक-दो खरीद लाता.

11 साल की उम्र में दिल्ली… ठिकाना दरियागंज… चारों तरफ किताबों की दुकानें… पुस्तकों के लिहाज़ से बेहद कामयाब रही ये रही यात्रा…

पढ़ने का सिलसिला जारी रहा… केबल टीवी तो क्या दूरदर्शन तक न था उस ज़माने में… सूचना के माध्यम रेडियो और अखबार… उस ज़माने में मैं एक साथ चार किताबें पढ़ता… एक रात को सोते वक्त बिस्तर पर, एक खाना खाते वक़्त, एक टॉयलेट में. चौथी इन तीनों मौकों के अलावा मिली फुर्सत में…

पुस्तकों का खासा संग्रह हो चला था. सबसे पहले तो ए हमीद को ढूंढा… नई किताबें उनकी आती ही न थीं, रद्दी वालों से, पुरानी किताब बेचने वालों के यहां से एक-आध और मिली… मुझे बहुत भाई -पीला उदास चाँद… पता नहीं किस मेहरबान ने माँगी और आज तक वापस न मिली… आज भी तड़पता हूँ उसकी याद में…

ओशो और गुरुदत्त जी की पुस्तकों से परिचय हुआ…. विश्वसाहित्य के बड़े नामों से परिचय हुआ… बचपन से ‘सोवियत भूमि’ पत्रिका पढ़ते रहने के कारण कम्युनिस्ट साहित्य के चक्कर में भी आया हालांकि बाद में दास कैपिटल सहित समूचा वाम-साहित्य एक कॉलेज की लायब्रेरी को दे दिया.

एक दिन अपने एक गुण का पता चला… एक अहिन्दी भाषी मित्र जिन्हें हिन्दी पढ़ने में दिक्कत होती थी, ने मुझसे पढ़कर सुनाने का आग्रह किया… सुनाई… उनको भी मज़ा आया और मुझे भी… फिर तो वे हर नई किताब मुझसे सुनते… यहाँ तक कि हम लोग काठमांडू तक हो आए और वे सारे रास्ते मुझसे किताबें सुनते रहे…

ये सिलसिला इनके मेरे जीवन में प्रवेश तक चलता रहा…. गर्भकाल में बड़े सुपुत्र ज्योतिर्मय ने भी सुनी… खासतौर पर गुरुदत्त की पुस्तकें…

फिर….

फिर एक चक्र पूरा हुआ… अब भी एक दिन में चार ही पढ़ता हूँ…. बस रूप बदल गया है… वे चार हैं…. ये, ज्योतिर्मय, गीत और मेकिंग इंडिया.

बाक़ी किताबों को पढ़ने का अवकाश सहज उपलब्ध नहीं… पर कभी-कभी चुरा लेता हूँ समय…. कभी-कभी….

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