देशी-विदेशी छोड़ क्यों न प्रदेशी को ज़रा आगे बढ़ाया जाए भला?

मेरी जन्मभूमि (बिहार) में शराबबंदी हो गयी, अब कर्मभूमि (छत्तीसगढ़) में भी तैयारी है.

ख़ैर ये मामले राजनैतिक ज्यादा होते हैं, लेकिन मुझे तो यह लगता है कि समूची ताक़त से देश में सबसे पहले कार्बोनेटेड ड्रिंक (कोला-पेप्सी आदि) पर प्रतिबंध लगाना चाहिए. हर लिहाज़ से यह ज्यादा ख़तरनाक है.

देश/ प्रदेश को अगर नशा मुक्त करना ही हो तो वैध नशे में सिगरेट से ज्यादा ख़तरनाक कुछ भी नहीं, तो पहले दृढ़ता से उस पर प्रतिबंध हो.

तमाम तरह के गुटका जिस तरह देह को खोखला करते हैं, उसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते. शराब से ज़्यादा ख़तरनाक हैं ये. उसे सख़्ती से बंद किया जाय.

विदेशी/ देसी को छोड़कर ‘प्रदेशी शराब’ को क्यूं न ज़रा आगे बढ़ाया जाय भला?

अपने आदिवासी बन्धुओं की संस्कृति में रचे-बसे एक से एक तरीक़े हैं सोमरस बनाने के, उन्हें एक्स्प्लोर किया जाना चाहिए. बाहर उसे भेजा जाय ऐसा इंतज़ाम होना चाहिए.

प्रदेश के तेंदू पत्ता ने पता नहीं किस-किस को कितना सम्पन्न किया, लेकिन आदिवासी फटी बिवाई लिए पैर के साथ ही रह गए.

पहले भी लिखा है कि विशुद्ध कस्बाई स्तर पर स्व-सहायता समूह द्वारा तेंदू पत्ता का अंतिम उत्पाद भी आदिवासियों द्वारा ही तैयार हो, थोड़ा नवाचार अपनाते हुए उसे सिगरेट की तरह का बनाया जाय तो सिगरेट से दस गुणा सस्ता होने पर भी लोग इसे पीने लगेंगे अगर सिगरेट बंद कर दिया जाय तो.

प्रदेशी बीड़ी, प्रदेशी गृह निर्मित दारू अगर अच्छी पैकेजिंग के साथ हो तो देश (दुनिया में भी) स्थान बना सकती है.

और मेरा सबसे पसंदीदा विषय…

अगर नैतिक भी सरकार ही बनाएगी समाज को, तो सबसे पहले तो मांसबंदी होना चाहिए. महज़ जीभ के स्वाद के लिए प्राणियों का क़त्ल किया जाना, इससे बड़ा संकट मानवता पर कुछ भी नहीं.

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