क्या एक ब्रा और बुर्के से बढ़कर कुछ नहीं तुम?

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पुरानी फिल्मों में लव सीन के दौरान हीरो और हिरोइन के चेहरे के आगे दो फूल को मिलते हुए दिखाया जाता था… या दो चिड़ियाओं को आपस में चोंच लड़ाते हुए दिखाया जाता था….

फिर एक समय ऐसा आया जब हिरोइन के गालों को चूमना स्वीकार्य हो गया… उसके पल्लू का गिरना स्वाभाविक हो गया…

और आज कल की फिल्मों में लिप-लॉक भी ऐसे सामान्य कृत्य की तरह लिया जाता है जैसे बड़ी आम बात हो… और जब बिकनी में ही सीन दिए जा रहे हों तो हिरोइन को पल्लू गिराने की अदाओं से भी मुक्ति मिल गयी है…

ये उदाहरण है उन्मुक्तता के रूप में स्वतंत्रता की…

दूसरा उदाहरण है व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अनुशासन का …. कि एक नार्मल न्यूज़ वेब साइट्स पर आपको कंडोम का विज्ञापन करती हुई तस्वीरें दिखाई देती है.. इसका मतलब ये तो नहीं कि जो खबरें देखने आया है वो खबरें छोड़कर कंडोम का विज्ञापन देखने में लीन हो जाएगा… और जो सच में केवल कंडोम का विज्ञापन देखने आया है उसके सामने देश की कितनी भी गंभीर समस्याओं वाली खबरें परोस दो उसकी नज़रें तो उस अर्धनग्न जोड़े पर ही अटक जाएगी…

तो हे नारी! जिसे देखना होगा वो आपको ब्रा तो क्या बुर्के में ढंका हुआ भी पूरा पूरा देख लेगा, जिसे नहीं देखना होगा वो आपके नग्न होने पर भी नहीं देखेगा…

हमारी संस्कृति ने तो खजुराहो जैसी कला की छाप भी छोड़ी है, जहां लोग शिल्पकार का हुनर भी देखने जाते है तो काम की कलात्मकता भी…

हमारी संस्कृति में कुछ भी वर्जित नहीं… यहाँ शिव और शक्ति के बिम्बों पर ब्रह्माण्ड टिका है तो रति और कामदेव भौतिकता लिए हुए भी देवता रूप में पूजे जाते हैं…

और इसी समाज में तुम्हें बिकनी में बॉलीवुड की अदाकारा भी दिखाई दे जाएगी… तो बुर्के में ढंकी हुई औरतें भी… एक ब्रा के पीछे इतना हंगामा  करने के बजाय उस समुदाय विशेष की औरतों को बुर्के से मुक्त करने का प्रयास करती तो हम सनातनियों की नज़रों में भी तुम “नारियों” का विशेष सम्मान होता…

लेकिन हम जानते हैं हंगामा खड़ा करना ही आपका मकसद है, आपकी कोशिश यह बिलकुल नहीं कि देश में व्याप्त कुप्रथाओं की सूरत बदलनी चाहिए…

सच कहूं तो मुझे शर्म आती है जब देखती हूँ… दुर्गा, काली, सीता, झांसी की रानी, रानी पद्मिनी, रानी चेनम्मा, रानी अवंतीबाई लोधी, रानी दुर्गावती की पुण्य भूमि पर नारीवाद को लेकर झंडा उठाया जाता है… अरे ओ देवियों, ये भारत भूमि है जहां भारत को भी माता के रूप में पूजा जाता है, यही नहीं पृथ्वी और प्रकृति को भी एक स्त्री के रूप में  देखा जाता है… कब तक सिर्फ कपड़ों में अटकी रहोगी… क्या एक ब्रा और बुर्के से बढ़कर कुछ नहीं तुम?

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