मैं विद्वानों के घर से बाहर निकल आया हूँ और अपने पीछे ज़ोर से दरवाज़ा बंद कर दिया है

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मैं विद्वानों के घर से बाहर निकल आया हूँ और अपने पीछे ज़ोर से दरवाज़ा बंद कर दिया है.

मेरी आत्मा उनकी भोजन-मेज पर बहुत काल तक भूखी बैठी रही; मैं उस तरह शिक्षित नहीं हुआ हूँ, जैसे वे हुए हैं, ज्ञान फोड़ने के लिए जैसे कोई काष्ठफल (nut) फोड़ता है.

मैं स्वतंत्रता को और ताज़ी मिट्टी की हवाओं को प्रेम करता हूँ; उनकी प्रतिष्ठाओं और सम्माननीयताओं पर सोने के बजाय मैं वृषचर्मों पर सोऊंगा.

मैं अपने ही विचार से बहुत ज़्यादा उतप्त हूँ और झुलस गया हूँ : वह बहुधा मुझे नि:श्वास कर देने के करीब होता है. तब मुझे खुली हवा में और सब धूल-धंवास भरे कमरों से दूर निकल जाना होता है.

लेकिन वे ठंडी छांव में ठंडे (भावशून्य) होकर बैठते हैं : वे हर चीज़ में मात्र दर्शक रहना चाहते हैं और वे ख्याल रखते हैं, वहाँ न बैठने का जहां सीढ़ियों पर सूरज तपता है……

जब वे स्वयं को ‘बुद्धिमान’ के रूप में उपलब्ध कराते हैं, उनके क्षुद्र कथन और सत्य मुझे कंपा देते हैं : उनकी बुद्धिमत्ता प्राय: ऐसी गंध देती है जैसे वह गंदे दलदलों से आयी हो….

हम एक दूसरे के लिए अजनबी हैं, और उनके सदगुण मेरी रूचि के और भी विपरीत हैं, बजाय उनके असत्यों और छली पांसों के.
और जब मैं उनके बीच जिया, मैं उनके ऊपर जिया. उसके लिए वे मुझसे क्रुद्ध हुए.

वे नहीं जानना चाहते थे कि कोई व्यक्ति उनके सिरों के ऊपर चल रहा था; और इसलिए उन्होंने अपने सिरों और मेरे बीच लकड़ी, धूल और कूड़ा-कचरा भर लिया……

इस प्रकार उन्होंने मेरे कदमों की आवाज़ को दबा दिया : और तबसे लेकर सर्वाधिक विद्वतापूर्ण, मुझे सर्वाधिक कम सुन पाया है…..

लेकिन उसके बावजूद मैं अपने विचारों सहित उनके सिरों के ऊपर से चलता हूँ; और यदि मुझे अपनी गलतियों पर भी चलना पड़े, तो भी मैं उनके और उनके सिरों के ऊपर ही होऊँगा…..

क्योंकि मनुष्य समान नहीं है, ऐसा न्याय कहता है. और मैं जिसकी अभिलाषा करता हूँ, हो सकता है वे उसकी अभिलाषा न करें!
….. ऐसा जरथुस्त्र ने कहा.

(ओशो की प्रवचन माला- ‘ज़रथुस्त्र: नाचता-गाता मसीहा’ का अंश)

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