Godhra : राम मंदिर का सपना लिए वो स्वाहा हुए अग्निकुण्ड में

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गोबिंद शंकर, रामलखन एक दिन बर्बाद होने पर नाराज थे, फिर से विलंब!

सुशीला देवी और प्रतिभा देवी भी बच्चो को संभालते संभालते इस विलंब के कारण थक चुकीं थी.

सहसा ट्रेन फिर रुक गई.

“उफ्फ, फिर नहीं” प्रिया (5) बोली..

“लगता है हम रात में ही पहुँचेगे” प्रतिभा (7) चुलबुलाई, शैलेंद्र उठकर देखने गए कि माजरा क्या है कि अचानक एक पत्थर उनपर आ टकराया. रामकृपाल, विट्ठल भाई परेशान होकर खिड़की से झांक कर देख रहे थे कि क्या कुछ बच्चे तो शरारत नहीं कर रहे थे.

पर बाहर का दृश्य भयावह था, दरींदे मनुष्यों का एक सैलाब लगातार पत्थर बरसा रहा था, गुस्से से खूंखार  लोग तलवार और भाले लिए ट्रेन की ओर बढ़े आ रहे थे. माँए अपने बच्चों को ढँक रहीं थी और पुरूष स्त्रीयों को. वह उन दुष्टो को डकैत समझ रहे थे.

बच्चे एक अवर्णनीय निस्तब्धता से कुछ जानी पहचानी सी गंध महसूस कर रहे थे. प्रीती(3) और रोहित  (21/2) लगातार रो रहे थे. हर तरफ कोलाहल था, वही पुरुष जो अपने गहने और पैसों को छिपा रहे थे, वे सबकुछ देने के के लिए तैयार थे. जो स्त्रियाँ अपनी इज्जत ढँक रही थीं, वे अब सिर्फ बाहर निकलना चाहती थीं.

पुरूषों ने बाहर निकलने के कुछ अथक अंतिम प्रयास किए, कई औरतें रोईं , गिड़गिड़ाईं…..

प्रिया, प्रतीभा, ऋषभ ने अपने मां-बाप – जो कि उनके जीवन के सबसे बड़े नायक थे, उन्हें बिखरते हुए देखा. वे खुद बहादुरी दिखाकर अपने मां-बाप की बहादुरी संजोए रखना चाहते थे, पर सहसा आग की लपटों ने उन्हे घेर लिया. पिता अपने बच्चो को अपने अंदर समेटे हुए, दरवाजे को तोड़कर निकल भागना चाहते थे  पर तलवारों और भालों से गोद गोद कर उन्हें फिर अंदर ढकेल दिया गया.

बाहर खड़े पुरुष कोई डकैत या हत्यारे नहीं थे, वे तो ऐसे दरींदे थे जिन्हें बच्चों और औरतों की चीखों को सुनकर आनंद आ रहा था. आग की लपटें लोगों को अपने अंदर घेर रही थी, उसी क्षण प्रतीभाबेन और छायाबेन ने एक दूसरे को अंतिम बार देखा और फिर वे झुलस गईं. अढाइ साल के रोहित की कोमल और पतली चमड़ी चंद चीखों के साथ जल्द ही खाक हो गई जिसे देख वे भेड़िए उन्मादित हो रहे थे.

वे जैसै आग से अभिभूत हो रहे थे… वे भयमुक्त हो गए,  सिर्फ एक आशा उनके मन मे थी कि वे जिस मिशन से लौट रहे थे वो सम्पन्न हो. कुछ शूरवीरों ने “जय श्री राम” के उद्घोष से अपनी आहूति दी, उनकी स्त्रियों ने, कुरेदते, झुलसते छालों को अपनी आँखें मूंद कर आहूत दे दी.

चारों ओर रुदन और चीखों  की गूंज थी – पर वे मानो उस नरभक्षी के पैशाचिक उल्लास में खो गया.  और इस ज्वलंत मानवीय नरसंहार को देख ‘अल्लाह ओ अकबर’ का नारा बुलंद हुआ….

इस खूंखार,  पाशविक, वहशी कांड को जिस जगह अंजाम दिया गया वह जगह है – – गोधरा.
दिनांक ….27 फरवरी 2002
समय …..7: 43 प्रातः

( ये घटनाक्रम काल्पनिक है किन्तु सभी पात्र और उनकी उम्र यथार्थ हैं)

अमर बलिदानी कार सेवकों को शत-शत नमन…

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