चिल्लाराय : अफ़गान सेना को खदेड़ कामाख्या मंदिर का पुनर्निर्माण कराया, पर नहीं मिली इतिहास की किताबों में जगह

आइये आज आपको इतिहास की किताबों से गायब एक और महान सेनानी – योद्धा से मिलवाते हैं.

पंद्रहवीं – सोलहवीं शताब्दी के समय पूर्वोत्तर के अहोम राज (आज असम) में ही था आज का कूच बिहार. कूच बिहार के राजा का नाम था नर नारायण और उनके छोटे भाई का नाम था शुक्लध्वज जिनको चिल्लाराय भी बोला जाता था.

चिल्लाराय राजा अहोम राजा बिस्वा सिंघा के तीसरे पुत्र थे. राजा बिस्वा सिंघा के बाद राजा बने नर नारायण परंतु देश के सुरक्षा और विस्तार का काम था चिल्लाराय का.

चिल्लाराय ने ही कूच वंश (साम्राज्य) नींव रखी थी. चिल्लाराय के रण कौशल के दम पर कूच वंश का राज पूरे अहोम से त्रिपुरा, नागालैंड और उत्तरी बंगाल तक फैला था.

चिल्लाराय की सेना को नारायणी सेना कहा जाता था. चिल्लाराय के नेतृत्व में सम्पूर्ण पूर्वोत्तर पर राजा नर नारायण का ही शासन था.

चिल्लाराय ने कभी भी किसी निहत्थे पर अत्याचार नहीं किया और न ही चिल्लाराय ने अनावश्यक युद्ध करके दूसरे राज्य के राजाओं को मारा.

चिल्लाराय ने भूतिया, कछारी और अहोम राज्यों का विलय करवा के एक अखण्ड पूर्वोत्तर राज्य बनाया था. जिससे हर समय अहोम और कूचों के बीच चल रही लड़ाइयां समाप्त हो गईं.

जब भारत पर सुल्तान सुलैमान कर्रानी के नेतृत्व में अफगानों ने आक्रमण किया तब सभी को हराते हुए सुलैमान कर्रानी की सेना पूर्वोत्तर कूच बिहार तक आ पहुंची.

अफगान युद्ध शैली से अनजान अहोम हार गए और अफगान उनको गौहाटी के आगे तक धकेल ले गए.

एक समय अफगानों ने राजा नर नारायण और चिल्लाराय को घेर लिया था और लगभग बंदी बना चुके थे परंतु चिल्लाराय अपने राजा के साथ निकल गए.

अहोम में अंगार तक जाने के बाद चिल्लाराय ने सेना को फिर से एकत्रित किया… यहाँ सबको मालूम है कि छापामार युद्ध की शैली महान मराठा राजा छत्रपति शिवाजी की थी…

परंतु भारत में पहला छापमार युद्ध चिल्लाराय ने शुरू किया था… चिल्लाराय ने अफगानों को हराने के लिए एक अद्भुत युद्ध शैली का अविष्कार किया और अहोम के जंगलों में कई महीनों तक छापामार और सीधे युद्ध का अभ्यास किया गया.

उनको मालूम था कि अफगानों को अहोम-कूच राज्य से दूर खदेड़ना होगा. इसलिए छापामार युद्ध के साथ अफगानों को सीधे युद्ध में कैसे हराया जाए, उसकी रणनीति भी तैयार की.

फिर अफगानों से युद्ध शुरू हुआ और चिल्लाराय खोए हुए सम्पूर्ण अहोम भूभाग को जीतते चले गए… अफगानों को चिल्लाराय की सेना ने पूर्णिया तक खदेड़ दिया… अफगान सेना बुरी तरह टूट चुकी थी और आगे युद्ध जारी रखने की जगह वापस भाग गयी.

सुल्तान सुलैमान कर्रानी की अफगान सेना ने गौहाटी स्थित कामाख्या मंदिर को तोड़ दिया था… आज जिस कामाख्या मंदिर में लोग दर्शन के लिए जाते हैं उसका पुनर्निर्माण चिल्लाराय ने ही कराया था.

चिल्लाराय ने संत श्रीमंत शंकरदेव को शरण भी दी थी जिन्होंने वैष्णव मत का प्रसार किया था.

महान वीर योद्धा चिल्लाराय का देहांत 1577 में गंगा किनारे (आज के मालदा टाउन) चेचक की बीमारी होने से हुआ.

महान योद्धा चिल्लाराय को सोलहवीं शताब्दी का सम्पूर्ण भारत का सबसे बड़ा युद्ध योजनाकर्ता, रणनीतिज्ञ और क्रियान्यवन करने वाला माना गया था.

अफगानों से हारने के बाद जहाँ पूरा उत्तरी भारत चुपचाप दासता स्वीकार कर चुका था वहीं चिल्लाराय ने न सिर्फ अपना राज्य वापस जीता बल्कि पूर्णिया तक का राज अफगानों से छीनकर विस्तार भी किया.

उन्होंने कामाख्या मंदिर की भव्यता को वापस सहेज कर हिन्दू धर्म की रक्षा की और वैष्णव समाज को भी आसरा दिया.

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