‘हमें चाहिये आज़ादी’ के नारों के बीच हमारा निकम्मापन और बेबसी

देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में किन्नरों की तरह ताली बजा-बजाकर ‘हमें चाहिये आज़ादी’, ‘लेके रहेंगे आज़ादी’ जैसे नारे गुंजाने वालों की ये मानसिकता मई, 2014 के बाद कोई थोड़े बनी है. ये तो तबसे है जबसे वामपंथ वजूद में आया.

भारत के कम्युनिस्ट पार्टी की अपने शैशवकाल से ही ये मान्यता रही है कि भारत एक नहीं वरन कम से कम 24 राष्ट्रों का समूह है जिसे जबरन एक राज्य के नीचे रखने की कृत्रिम कोशिश की जाती है.

अपने अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित करते हुए उन्होंने कहा था कि –

‘भारतीय जनता के हर वर्ग जिसके पास होमलैंड के तौर पर एक क्षेत्र, सामूहिक ऐतिहासिक परंपरा, सामूहिक भाषा, संस्कृति, एक मनोवैज्ञानिक संरचना और सामूहिक आर्थिक जीवन है, उन्हें एक अलग राष्ट्रीयता माना जाएगा. उन्हें भारतीय संघ या महासंघ में एक स्वायत्त राज्य के रूप में अस्तित्व में रहने और अगर उनकी इच्छा हो तो अलग होने का अधिकार होगा.’

इस प्रस्ताव में पठान, पश्चिमी पंजाबी, सिक्ख, सिंधी, हिंदुस्तानी, राजस्थानी, गुजराती, बंगाली, असमी, बिहारी, उडिय़ा, आंध्र, तमिल, कर्नाटकी, महाराष्ट्रीयन और मलयाली का अलग राष्ट्रीयताओं के तौर पर जिक्र किया गया था.

अपनी इस सोच को अमली जामा पहनाने के लिये उन्होंने हमेशा एक मौका खोजा और जब भी कोई मौका मिला पूरे दम-खम से उसे हवा देने में लग गये.

रहमत अली तथा अल्लामा इकबाल ने पाकिस्तान की कल्पना की और मुस्लिम लीग ने उसे माँगा पर उनके पास न तो इसके लिये कोई तर्क था न ही कोई आधार पर उनकी मांग यहाँ के कम्युनिस्टों को बड़ी रास आई.

उन्होंने फ़ौरन ये ऐलान कर दिया कि हाल-फिलहाल तो भारत में दो तरह की समानांतर राष्ट्रीयता है एक हिन्दू और दूसरा मुसलमान इसलिये इनको आत्मनिर्णय का अधिकार हो पर चूँकि मुसलमान मज्लूम है, बहुसंख्यक हिन्दुओं का सताया हुआ है इसलिये उन्हें एक अलग देश मिले.

कॉमरेड सैयद सज्जाद जहीर ने 34 पन्नों में आत्मनिर्णय के इस अधिकार की व्याख्या करते हुये कहा कि चूँकि मुसलमान एक अलग कौम है इसलिये आत्मनिर्णय के अधिकार के तहत देश से अलग होकर उन्हें एक अलग देश मिलना चाहिये.

अपने मांगों के लिये तर्कविहीन मुस्लिम लीग, सज्जाद जहीर के इस आलेख के बाद बल्लियों उछलने लगी. कम्युनिस्ट पार्टी के सारे चिंतक एक-एक कर इस देशतोड़क सिद्धांत को अपना तर्क देने आगे आने लगे.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के एक वरिष्ठ नेता गंगाधर अधिकारी ‘पाकिस्तान और राष्ट्रीय एकता’ की अपनी थीसिस लेकर आए. फिर 19 सितंबर 1942 को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की बैठक में एक प्रस्ताव पारित किया गया कि पाकिस्तान के हक़ में आन्दोलन चलाई जाये.

ये प्रस्ताव बाद में ‘ऑन पाकिस्तान एंड नेशनल यूनिटी’ नाम से प्रकाशित किया गया और इसके आधार पर देश भर में कम्युनिस्ट पार्टी के कारिंदे मुस्लिम लीग के साथ बाहों में बाहें डाल कर घूमने लगे. फिर मई, 1943 में हुए अपने मुंबई अधिवेशन में इन्होंने ये साफ़ कर दिया कि हर उत्पीड़ित को अब भारत से अलग होना ही होगा.

1944 में गांधी-जिन्ना वार्ता इसलिये टूटी थी क्योंकि गांधी को जिन्ना की पाकिस्तान की मांग मंजूर नहीं थी. उस समय भाकपा के महासचिव पीसी जोशी ने इस के विफल होने का दोषी गांधी को ठहराते हुए कहा था कि ‘गांधी, जिन्ना की मांग के पीछे खड़ी आज़ादी को देख नहीं पा रहे हैं’. आज़ादी आई पर पाकिस्तान के जन्म के साथ.

अब पाकिस्तान तो बनवा दिया पर भारत के और टुकड़े कैसे हों, ये चिंता कम्युनिस्ट नेताओं को सोने नहीं देती थी. इसलिये हरकिशन सिंह सुरजीत ने उस सिद्धांत को आगे बढ़ाकर भारत के अंदर से सिख और कई अन्य राष्ट्रों को भी अलग करने का विचार दिया. सिखों के लिये अलग राष्ट्र की मांग उठाई और इस मांग का दंश भारत ने लंबे समय तक झेला.

फिर बाद में एक और कम्युनिस्ट अशोक मित्र ने कश्मीर के बारे में कहा कि वहां तो भारतीय सेना ऑकुपेशन आर्मी है जिसने जबरन उस पर कब्ज़ा किया हुआ है. कश्मीर और बस्तर की आज़ादी तक जंग रहेगी, जंग रहेगी जैसे नारों की पैदाइश भी इसी दूषित गर्भ की है.

“भारत तेरे टुकड़े होंगे” की पिपासा अभी पूर्ण नहीं हुई है इसलिये कश्मीर से लेकर बस्तर की आज़ादी की मांग बेरोकटोक जारी है और आगे भी रहेगी इस बात की पूरी गारंटी है और इधर हम, उन लोगों से भारत के टुकड़े होने से बचाने की आस लगाये बैठें हैं जो साल भर बाद भी गली के लौंडे कन्हैया कुमार और उमर खालिद जैसों को भी नहीं नाथ पाये हैं.

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