BRA, जकड़न नहीं, तुम्हारी अपनी इजाद की हुई कुण्ठा है

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कुछ महिलाओं के लिए अपने अंत:वस्त्र जकड़न लगते हैं, जैसे उनकी देह नहीं उनकी आत्मा को बाँध दिया हो. ये सच हो सकता है कुछ लोगों के लिए लेकिन ये एक सार्वभौमिक सत्य नहीं लगता मुझे… मेरे हिसाब से ब्रा जकड़न नहीं है…. ये सभ्यता की देन है… बिलकुल अन्य कपड़ों की तरह…. हम औरतों की ही इजाद रही होगी ये शेप में बने रहने के लिए…..

जब हम आदिम रहे होंगे किसी जन्म में तब अपने स्तनों को ढांकना हमें रोमांचक और प्रयोगात्मक लगता होगा बिलकुल वैसे ही जैसे किन्हीं को इस युग में इन्हें उघाड़ना रोमांचक और प्रयोगात्मक मालूम होता है….

शर्म और लिहाज़ अपनी अपनी सोच की बात है… हम इसे जितना सोचते जाते हैं या जितना विरोध दर्ज करते जाते हैं… ये उतना ही शर्मनाक लगने लगता है…. बिलकुल वैसे ही जैसे हॉलीवुड में आज की तारीख में न्यूड फोटो सेशन बिलकुल सहज बात है लेकिन बॉलीवुड अभी उस स्तर पर नहीं आ पाया है… क्योंकि किसी अंग को छुपा छुपाकर प्रदर्शित करने में जो कामुकता है, उसका क्या आकर्षण है ये हमारे देश से बेहतर कोई नहीं समझ पाया… इसलिए वो उसे उघाड़ते हुए भी पूरी तरह ढांक कर रखता है या यूं कहें कि छुपाते हुए भी पूरी तरह उघाड़ देता है…

क्या पहनना क्या नहीं पहनना, कितना पहनना, कितना नहीं पहनना बहुत व्यक्तिगत मामला है जबरदस्ती वाली कोई बात ही नहीं है….
कैटरीना कितना भी एक्स्पोज़ कर लें, मुझे वो कभी कामुक नहीं लगी… लेकिन मधुबाला के चेहरे की मुस्कान आज भी हज़ारों मर्दों के दिलों में हिलोर पैदा कर जाती होगी….

मैंने जब पहली संतान को जन्म दिया था, तब कई मौके ऐसे आए जब मुझे उसे सार्वजनिक रूप से स्तनपान करवाना पड़ा… मुझे बिलकुल ख़याल ही नहीं रहता था अपने कपड़ों का… 23-24 साल की लड़की जो पहली पहली बार माँ बनी है, उसके लिए बच्चे की भूख ही केंद्र में होती है…

उसी तरह एक महिला के लिए अपने स्तनों के ढांकना, न ढांकना उसकी अपनी स्वतंत्रता है… कोई भी महिला बिना ब्रा के घूम ले, जिसे तुम स्वतंत्रता कहती हो, उसे अनुभव कर ले… कोई एक बार देखेगा… दो बार देखेगा…. फिर जब उसे पता चल जाएगा कि नहीं, ब्रा पहनना औरतों के लिए अनिवार्य नहीं रह गया है तो उसके लिए वो एक आम बात हो जाएगी…

ठीक उसी तरह जैसे मर्दों के छाती के बाल किसी ज़माने में मर्दानगी की निशानी होते थे, लेकिन आज छाती को शेव कर लेना फैशन है… शुरू में ज़रूर अजीब लगा होगा…. लेकिन अब जब मर्दों के 6 पैक या 8 पैक हम देखते हैं तो दिमाग में एक बार भी ख़याल नहीं आता कि इसकी छाती पर बाल भी रहे होंगे…

तो BRA जकड़न नहीं है…. ये सभ्यता की देन है… बिलकुल अन्य कपड़ों की तरह…. हम औरतों की ही इजाद रही होगी ये शेप में बने रहने के लिए….. जिसका आज विरोध हो रहा है….

जब इसका फैशन नहीं रहेगा… जब हम एक बार फिर आदिम हो जाएंगे…. तो इसके न पहन पाने के कारण हम एक बार फिर विरोध में उतरेंगे…

जब दीपिका पादुकोण का My Choice वीडियो वायरल हुआ था तब उसमें भी ब्रा को जकड़न की तरह दर्शाया गया था… ABVP से तुलना करते हुए आज की तथाकथित नारियां फिर ब्रा के विरोध में उतर आई हैं. ये वास्तव में आज़ादी की मांग नहीं ये उनकी वो कुंठा है जो खुद ही इजाद करती हैं, फिर खुद ही उसके विरोध में भी उतरती हैं…

क्योंकि उन्हें पता ही नहीं है कि जिस वामपंथी विचारधारा से प्रभावित होकर वो अपनी कुंठा का सार्वजनिक प्रदर्शन करना सीख रही हैं, वो विचारधारा उन्हें कोल्हू के बैल की तरह एक ही जगह घुमाए हुए है, जहां से तेल निकलने की भी उम्मीद नहीं… तो आत्म उन्नयन की बात करना ही व्यर्थ है…

इसलिए उनके सारे विरोध शरीर और SEX के इर्द गिर्द ही होते हैं… वो आत्मा की बात ही नहीं करते… क्योंकि वो सिर्फ देह है … एक मांसल देह… अपनी ही आत्मा के अस्तित्व को ठुकराने वाली देह!

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