लोकतंत्र की लैब में मीडिया के गिनी पिग बन के रह गए पक्ष और विपक्ष

हाल की एक खबर पर ध्यान दीजिए!

जूही चौधरी नाम की किसी महिला को शिशु तस्करी के आरोप में बंगाल में गिरफ्तार किया गया. उन्हें मीडिया ने बीजेपी महिला मोर्चा की नेता बताया है. ये भी बताया जा रहा कि उनके पिता रविंद्र नाथ चौधरी बीजेपी के राज्य सचिव हैं.

निश्चित रूप से शिशु तस्करी एक जघन्य अपराध है. अगर जूही चौधरी को दोषी पाया जाता है तो उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिलना चाहिए…

लेकिन एक बात और…

दस-बारह दिन पहले NDTV के पत्रकार रवीश कुमार के भाई बृजेश कुमार को एक नाबालिग लड़की के यौन शोषण मामले में खूब घेरा गया था. रविश कुमार और कांग्रेस का नाम उस आरोपी बृजेश के साथ जोड़कर व्यंग कसे गए थे.

हालांकि दोनों आरोपी अभी विचाराधीन हैं…

दोनों के अपराधों में उनसे सम्बद्ध पार्टी को संलिप्त करके देखना मूर्खता होगी. क्योंकि दोनों के अपराध व्यक्तिगत हितों के मद्देनजर हैं.

किसी भी राजनैतिक पार्टी को इस बात की खबर नहीं होती कि अमुक कार्यकर्ता किस किस अपराध में शामिल है या निकट भविष्य में उसके किस अपराध में शामिल होने की सम्भावना है…

क्योंकि राजनैतिक पार्टी के पास कोई इंटेलीजेंस एजेंसी नहीं होती जो एक-एक कार्यकर्ता के ऊपर नजर रख सके.

लेकिन प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इन दोनों खबरों में इनके व्यक्तिगत अपराधों के साथ इनकी पार्टी का नाम जोड़ा गया…

ज़ाहिर सी बात है इसलिए जोड़ा गया ताकि विपक्षी दल एक-दूसरे का उपहास करें… दोनों दलों में टकराव हो… चर्चाएं हों, विवाद हो… हंगामा हो. बयान जारी किये जाएं… और मीडिया ट्रायल हो.

फायदा किसका हो रहा है?

पक्ष का?

विपक्ष का?

या सिर्फ मीडिया का…

असल में वर्तमान में पक्ष और विपक्ष लोकतंत्र की लैब में गिनी पिग बन के रह गए है. कंट्रोल मीडिया के हाथ में जा रहा है.

हर दस-बारह दिन में एक गैर जरूरी सा मुद्दा उछलता है और उसे लेकर हम एक-दूसरे का सर फोड़ने को तैयार हो जाते हैं.

हालात ऐसे हो गए हैं कि वैचारिक संवाद अब बीते जमाने की बात हो चली है. जब तक व्यक्तिगत स्तर पर गाली गलौच न हो जाय तब तक कोई डिबेट अमान्य सी रहती है.

इसका कारण है भारत में प्राइवेट मीडिया चैनलों का वर्चस्व. जो बेख़ौफ़ होकर जब खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहते हैं तो अपनी पोल खुलने के डर से न्यायपालिका, व्यवस्थापिका और कार्यपालिका का कोई भी प्रतिनिधि उनके इस दावे को अतिक्रमण कहने का साहस भी नही कर पाता.

असल में भारतीय राजनीति में ये बेवजह का कोलाहल इन्हीं मीडिया चैनलों की खुराफात की वजह से है.

इन्हें अन्ना हज़ारे से अब कोई मतलब नहीं है. इन्हें हार्दिक पटेल से कोई अब कोई वास्ता नही. कन्हैया कुमार का खेल खत्म हो गया है. अब कन्हैया की जगह खालिद उमर और शेहला राशिद दिखने लगे हैं. तेज़ बहादुर यादव का अब कोई नाम नहीं लेता. इन्द्राणी मुखर्जी अब बूढी हो गई है.. या फिर ये नई बच्ची गुरमेहर हो.

सब मीडिया के शिकार हैं….

असल में मीडिया के लिए TRP दूध के समान होता है… इसके शिकार आइडेंटिटी क्राइसिस से जूझते इंडिविजुअल इन्हें निरीह गाय-भैंस के समान नजर होते हैं.

इनके पास पैसा, नाम या फिर पावर की कमी होती है और मीडिया ऐसे ही Vulnarable लोगों की तलाश में रहती है…. फिर इन identity crisis से जूझते लोगों को पॉपुलैरिटी का ऑक्सिटोसिन देती है.

उसके बाद जब ये नशे में बयानबाजी करते हुए अपने फेमस होने पर इतरा रहे होते हैं तो इतनी देर में TRP के रूप में इनके शरीर सारा का दूध खींच लेती है..

और अंत में TRP खत्म – बंदा जाए भाड़ में.

फिर कोई नही पूछता.

सावधान! अगर आपके पास पावर, पैसा या नाम में से किसी भी चीज की कमी है और आप उचक-उचक कर इन्हें हासिल करने की जद्दोजेहद में लगे हैं तो अगले शिकार आप हो सकते है.

यही मीडिया मैनेजमेंट है… यही खबरों के सेंसेशनलाईज़ेशन का कारण है. लेफ्ट हो या राईट! किसी भी खबर पर सर फोड़ने से पहले एक बार जरूर सोचिये क्योंकि मीडिया का सिद्धांत एकदम स्ट्रेट है, लेफ्ट या राईट नहीं.

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