सिमिट- सिमिट जल भरहिं तलावा, जिमि सद्गुण सज्जन पहिं आवा

वर्तमान समय में प्रायः हम ” अंगूर खट्टे हैं” की कहावत को सुनते-कहते रहते हैं अर्थात यह कार्य सम्भव नहीं है.

यदि सच में अंगूर खट्टे हैं तो वह मीठे कैसे होंगे? हमारे निकटतम कुटुंबजन के पास द्राक्षा (अंगूर) लता थी. उन्होंने इस पौधे को नर्सरी से लाकर बड़े ही जतन से अपने अंगने में लगाया था. अनुकूल वातावरण और बागवानी पाकर वह पौधा बड़ा होकर एक लता का रूप लेता है. निर्धारित ऋतु में वह पल्लवित-पुष्पित हुआ, फल भी आ गए. लेकिन अंगूर लता के लिए यह माटी ही अपरिचित थी, अतः फल परिपक्व होने के पश्चात भी खट्टे ही रह गए.

उन्होंने आस-पड़ोस में पूछा. जिनके पास पूर्व से यह पौधा था उनसे जानकारी भी ली. किसी शुभचिंतक ने उनको कहा कि यह लता अपनी माटी का नहीं है तो इसके फलों को मीठा करने के लिए एक उपाय तो है – इस लता की जड़ से एक हाथ की दूरी छोड़कर माटी को कोड़कर भुरभुरा बना लें. उसके पश्चात उस कोड़ी हुई माटी पर आप दूध और छोआ को मिलाकर पटवन करें. निश्चित रूप से खट्टे फल मीठे हो जायेंगे. और हमारे कुटुंब ने बताया कि इस उपाय के पश्चात फल मीठे हो गए.

प्रयास.. को मत भुलाईये. प्रयास को भुलाना आत्मसमर्पण ही है. उपाय जानते हुए भी आलस्य बोध होता है तो सोचिए, यदि शिवाजी ने अफजल खान के बाह्य क्रूरता और विशालकाय सैन्य को देखकर ही आत्मसमर्पण कर दिया होता तो आज हम सभी के हृदय में शिवाजी वह स्थान प्राप्त नहीं कर पाते. आशा है कि आपका सारा आलस्य ‘फुरफुर’ हो गया होगा.

क्योंकि.. संत तुलसीदास जी ने लिखा है-

‘सिमिट- सिमिट जल भरहिं तलावा।
जिमि सद्गुण सज्जन पहिं आवा॥’

कर के देखिये, अच्छा लगता है..

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