भारतवर्ष के मूलाधार पर प्रहार-2 : जहां लहू पीना ही प्रवृत्ति हो वहां निर्मल जल कहां से देगा स्वाद

indian culture education history making india

देश के मूलाधार चक्र को सुनियोजित ढंग से बर्बाद करने का सबसे उत्तम अस्त्र शिक्षा व्यवस्था एवं इतिहास लेखन है. इस अस्त्र का उपयोग बहुत ही उत्तम ढंग से स्वतंत्रोत्तर काल में किया गया है, क्योंकि हम उतने औपनिवेशिक काल में नहीं हुए जितना स्वतंत्रोत्तर काल में हुए. मैं नहीं कह रहा कि जिनके हाथ में सत्ता आई सभी ने इस राष्ट्र के मूलाधार चक्र पर प्रहार करने में अपना योगदान दिया. स्वतंत्रता के बाद जिनके हाथ में सत्ता आई उसमें बहुत सारे राष्ट्रवादी भी थे लेकिन समय के साथ उनकी संख्या कम होती चली गई या हाशिए पर ढकेल दिया गया.

यदि सूक्ष्म विश्लेषण किया जाए इतिहास लेखन पर स्वतंत्रता के पश्चात और विद्यालयों में पाठ्यक्रम में जो इतिहास सम्मिलित किया गया तो आप पाएंगे जैसे-जैसे राष्ट्रवादी लोग राजनीतिक पटल पर से गायब होते गए वैसे-वैसे इतिहास लेखन भी बदला और इतिहास के पाठ्यक्रम में भारत का मूल तत्व ही गायब कर दिया गया. वो विभूतियां जिन्होंने भारत के परचम को विश्व में लहराया और विश्व ने अंगिकार भी किया वो इतिहास से गायब कर दी गईं. हर दशक के इतिहास की किताबों को उठाकर देख लीजिए तो आपको एक सहसंबंध नजर आएगा और आपको षड्यंत्र स्पष्ट हो जाएगा.

भारत की संवेदनशील परंपरा की दुहाई देकर कि भारत हमेशा शांतिप्रिय राष्ट्र रहा है, किसी पर कभी आक्रमण नहीं किया है, सबको पनाह दिया है और अपनाया है जैसे मीठे लोलीपॉप देकर दूसरों के व्यभिचारों एवं अमानुषिक अत्याचारों पर बहुत सफाई से पर्दा डालने की कोशिश हुई है. वर्तमान में कक्षा 6-12 तक के इतिहास की NCRT की किताबों को उठाकर देख लीजिए कि इतिहास के नाम पर क्या परोसा जा रहा है.

इतने गौरवशाली इतिहास को बहुत ही सफाई से और सुनियोजित ढंग से पिछड़ा घोषित किया गया और वह लोग जो दो हजार वर्ष पूर्व तक जंगलों में विचरण करते थे उनको इस पावन भूमि के ‘जन गण मन’ का ‘भाग्य विधाता’ घोषित किया और जिन लोगों ने धर्म और संप्रदाय के नाम पर पूरे विश्व में रक्तपात किया और कर रहे हैं उनको शांति के दूत घोषित करके महान बताते हुए महिमा मंडित किया गया. भारतीयता की वकालत करने वाले राजनीतिक व्यक्ति या इतिहासकार सांप्रदायिक घोषित कर दिए और उन्हें ही देश का खलनायक बता दिया गया और ऐेसा माहौल तैयार किया गया कि वही आने वाली पीढ़ियों के लिए वह चरमपंथी नजर आने लगें.

अपने ही देश के इतिहास के साथ इस तरह का क्रूर मजाक क्या मूलाधार चक्र पर प्रहार नहीं है?

रही बात धार्मिक क्षेत्र की जिस देश की मिट्टी ही ‘एकम् सत् विप्राः बहुधा वदन्ति’ एवं ‘ वसुधैव कुटम्बकम ‘ जैसे बहुआयामी मानवीय मूल्यों का उच्चारण करती हो वहां एकांगी और एक पंथ वालों का दिया हुआ ‘सेकुलरिज्म’ का सिद्धांत बहुत स्वादिष्ट नजर आने लगा, मुंह से लार टपकती है और अपने यहां के बहुआयामी मानवीय मूल्यों से मुंह कसैला हो जाता है, उबकाई आती है. सही बात है जहां लहू पीना ही प्रवृत्ति हो वहां निर्मल जल कहां स्वाद प्रदान कर पाएगा. चंदन-रोली का टीका मस्तक पर लगा लो, शिखा रख लो तो कट्टर एवं सांप्रदायिक हो गए और जालीदार टोपी, क्रास या पग धारण कर लो तो धार्मिक हो. सूर्य, जल, अग्नि को पूजते हैं तो कर्मकांडी और पिछड़े हैं और पत्थर की शिला पर पत्थर मारते हैं तो प्रगतिशील और धार्मिक, तरह तरह के अमानुषिक अत्याचार एवं मीठे प्रलोभनों द्वारा धर्मांतरण कराएं तो धार्मिक. जो व्यवस्था ऐसी दोगलेपन से ग्रस्त हो वह किस तरह का आधार एवं नींव तैयार करेगी?

क्या यह मूलाधार चक्र पर प्रहार नहीं है?

साहित्य को उठाकर देख लीजिए चाहे वह किसी भी भाषा का साहित्य हो किस तरह से भारतीय मूलतत्व गायब हुए. मैं नहीं कहता कि आप किसी और राष्ट्र के कवि, लेखक एवं साहित्य को मत पढ़िए पर पहले अपना मूल पढ़ लीजिए, ताकि पता तो रहे कि आपके अपनों ने क्या लिखा है, क्या कहा है. हमको इतर का साहित्य पढ़ाया जाता है, हम कंठस्थ करते हैं और कहते हैं कि ‘ फलाने देश के ढिकाने साहित्यकार ने क्या बात कही है’ और बाद में अपने देश के किसी साहित्यकार को पढ़ते हैं तो कहते हैं ‘ ऐसा तो फलनवा देश के प्रतिष्ठित साहित्यकार ने कहा है’.

हम भूल जाते हैं कि फलनवा देश के साहित्यकार ने जो बात अपने समय में कही थी वही बात हमारे मिट्टी के साहित्य में कितने वर्षों पहले कही गई थी. दृष्टिकोण ही बदल जाता है. जो बात हमारे यहां लोगों ने पहले ही कह दिया था हम उसको किसी और देश में सैकड़ों वर्षों बाद कही गई बात से प्रमाणित करते हैं. साहित्य के नाम पर भी क्या परोसा जा रहा है किताबों को उठाकर देख लीजिए अंतर स्पष्ट हो जाएगा.

अंग्रेजी साहित्य ही पढ़वाना था तो भारतीय साहित्य के अंग्रेजी अनुवाद को प्रोत्साहित करना चाहिए था ताकि विश्व पटल पर हम अंग्रेजी साहित्य में दखल पाते और भारतीय साहित्य, मूल्यों को इस उत्तर-औपनिवेशिक काल में फिर से विश्व पटल पर पहुंचा पाते.

साहित्य ही पढ़वाना था तो वेदों, उपनिषदों से शुरू करना चाहिए था जहां से विश्वसाहित्य का भी श्रीगणेश होता है. वेदों से चलकर कालिदास से लेकर कबीर तुलसी तक को पढ़ाया गया होता तो सोचिए मूलाधार चक्र कितना जाग्रत होता और मानवीय संवेदनाओं का संचार प्रत्येक व्यक्ति में कितने सुंदर ढंग से हुआ होता. साहित्य के नाम पर कूड़ा को महिमा मंडित किया गया और सफेद-सफेद सुंदर कागजों पर बहुमूल्य स्याही की बर्बादी से काले किए गए पन्नों को साहित्य का दर्जा दे दिया गया. शायद कलम भी आंसू बहाती होगी और कागज भी अपनी किस्मत पर पछताता होगा?

यह देश के मूलाधार चक्र पर प्रहार नहीं है तो क्या है?

आज किसी भी हाईस्कूल के विद्यार्थी से पूछिए कि गुरूत्वाकर्षण का सिद्धांत तो वह सिद्धांत के साथ-साथ न्यूटन का नाम लेगा. उसको न्यूटन साहब से 1200  साल पहले भास्कराचार्य द्वारा दिया हुआ सिद्धांत नहीं मालूम है. किसी भी गणित के कक्षा 6 के विद्यार्थी से पूछिए कि ‘ समकोण त्रिभुज में आधार के वर्ग एवं लंब के वर्ग का योग उस त्रिभुज के कर्ण के वर्ग के बराबर होता है.’ इस प्रमेय को क्या कहते हैं तो वह नाम लेगा पाइथागोरस का. उसको यह नहीं मालूम कि ईशा के छ: शताब्दी पूर्व यह प्रमेय बौधायन ने दिया था. इस तरह से सहस्र उदाहरण दिए जा सकते हैं.

साहब आपने भौतिक विज्ञान में न्यूटन पढ़ाया अच्छी बात है, पढ़ाना भी चाहिए लेकिन कितना सुंदर होता जब साथ में आप भास्कराचार्य को भी पढ़ाए होते और उस सिद्धांत का इतिहास एवं इतिहास के पाठ्यक्रम में भी भास्कराचार्य को सम्मिलित किए होते. तब इतिहास में रुचि रखने वाले छात्रों की भी इतिहास के प्रति भी ललक बढ़ती और विज्ञान के क्षेत्र में अपना भविष्य बनाने वाले विद्यार्थी का दृष्टिकोण विज्ञान के प्रति कितना ऐतिहासिक होता.

गणित, विज्ञान, तकनीकि, चिकित्साशास्त्र (medicine), रसायनशास्त्र, भौतिक विज्ञान, खगोलशास्त्र (astronomy), नौकायन ( navigation: नाम ही संस्कृत शब्द नाव से बना है), ब्रम्हांड विज्ञान (cosmology), शल्यचिकित्सा (surgery), धातु विज्ञान (metallurgy), आर्युवेद, शरीर विज्ञान (anatomy), अनुवांशिकी (genetics) इत्यादि ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं जहां भारत ने विश्व को परिचित कराया है. पश्चिम में इन क्षेत्रों में जो भी प्रगति हुई वह कमोबेश 15वीं शताब्दी के बाद हुई या औद्योगिक क्रांति के साथ हुई.

आपने बचपन में Physics में पढ़ा होगा की Energy दो प्रकार की होती है – Static & Kinetic. यह सिद्धांत भी यूरोपीय लोगो को पता नहीं था 300-400 वर्ष पहले तक. आपको जानकर आश्चर्य होगा की यह जानकारी भी यूरोप को भारत से लिए गये संस्कृत ग्रंथो से मिली.

दूसरी शताब्दी (2nd Century) में स्पेन भारत से Wootz steel खरीदता था, जिससे उनके तलवार, अंगरक्षक ढाल बनती थी. यह स्टील केवल भारत में ही बनती थी, क्योंकि भारत एकमात्र विकसित सभ्यता थी उस समय. (यह सब ग्रीक इतिहास में लिखा हुआ है). यह वही स्टील है जिससे टीपू सुल्तान की तलवार बनी थी जिसे अंग्रेजों ने अपने कब्जे में ले लिया था. इसी तलवार पर फैराडे और नोबल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों ने कई साल लगा दिए शोध करके पता करने में किन धातुओं के मिश्रण से बना है.

जिस चीज को जानने के लिए बड़े-बड़े वैज्ञानिकों ने अपने यहां करोड़ों की लागत से बनी हुई आधुनिक प्रयोगशालाओं में अपने जीवन के दशकों लगा दिए वहीं भारत में प्राचीन काल में ही उसे हमारे यहां किसी गांव में धूल-मिट्टी में रहने वाले किसी अनपढ़, निर्धन लोहार ने प्रकृति की छांव में बनाई होगी. भारत के राजस्थान में ऐसे प्राचीन उद्योग मिले हैं जिसमें जिंक धातु (Zinc metal) बनाते थे distillation प्रक्रिया से.

ऐसा कौन सा क्षेत्र है जिसमें भारतियों की दखल और पकड़ उस समय के अनुसार न रही हो? किसी भी प्रगति को देख लीजिए उसके मूल में आपको भारतवर्ष ही नजर आएगा. कभी भी इन विषयों के पाठ्यक्रम में इसकी ऐतिहासिकता को सम्मिलित किया गया या इतिहास को इस दृष्टिकोण से पढ़ाया गया?

इन कुछ उदाहरणों एवं पक्षों को देखते हुए क्या आपको यह नहीं लगता कि इस राष्ट्र के मूलाधार चक्र पर कितनी खूबसूरत तरीके से बर्बर प्रहार किया गया है. यदि मेरा यह दृष्टिकोण गलत है तो मैं अपने दृष्टिकोण पर आलोचना का भी स्वागत एवं सम्मान करूंगा.

पहला भाग यहाँ पढ़ें –

भारतवर्ष के मूलाधार पर प्रहार : आवश्यक है पुनः आत्मसाक्षात्कार

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY