पुरोहितजी कहिन : रहे जो रगों में उसके हम नहीं कायल, बहे जो देश की खातिर उसे लहू कहिये

दिवाली की छुट्टियों में तब जबकि वह करीब 15 से 20 दिन की होती थी और हमको वह भी कम लगते थे. छुट्टियों के पहले दिन ही पिताजी अच्छी-अच्छी पिस्तौलें और प्रतिदिन “तय ” एक रील का डिब्बा ले आते थे और बस उसी दिन से चालू हो जाती थी हमारी जंग-ए-आजादी.

पिस्तौल हाथ में आते ही सबसे पहले हम जो ढूंढते थे वह था हमारा तौलिया जिसे अपनी कमर पर बांध कर, पिताजी द्वारा विप्र शोचाचार विधि से उतारी गई जनेउ जो एक नियत स्थान पर विसर्जन के लिए रखी जाती थी, उसे धारण करके बालों को थोड़ा पानी लगाकर उनकी तरह सेट करके जब बिना मूछों के एक हाथ को अपनी आभासी मूछों पे ताव देते हुए और एक हाथ से उस पिस्तौल से टिकडी के फायर की आवाज करते थे “धाँय ” तो साथियों में हर्षोल्लास छा जाता था.

“इंकलाब जिंदाबाद”
” चंद्रशेखर आजाद जिंदाबाद ”
“अंग्रेजो निकल लो नहीं तो ठोक देंगे”
की आवाजो से कॉलोनी गूंज उठती.

इतना सुनहरा था हमारा बचपन. खिलौने वाली वह पिस्तौल और बारूद की टिकड़ी का वह धमाका हमारे मन में चंद्रशेखर आजाद को जीवंत कर देता था.

सभी में होड़ लगी रहती कि,

मैं आजाद बनूंगा,
मैं भगत सिंह बनूंगा,
मै सुभाष चंद्र बोस,
और मैं बिस्मिल…

हां यह बात आज तक समझ में नहीं आई कि कोई भी कभी “साबरमती का संत” बनने को तैयार नहीं होता था. सभी को अपनी पिस्तौल के दम पर आजादी चाहिए थी इसलिए जब कभी आगे इतिहास की पढ़ाई में चरखे से काती गई आजादी का स्वेटर बुनते हुए सुनते तो शैक्षणिक बोर्ड में श्रद्धा बिलकुल खत्म हो जाती थी.

ऐसे थे हमारे बचपन के चंद्र शेखर आजाद और दीपावली के समय उनको दी जाने वाली श्रद्धांजलि.

अकारण ब्राह्मणों को गालियां देने वाले लोग यह जान लें कि वे चंद्रशेखर आजाद ब्राह्मण वीर थे इसलिए नहीं कह रहा हूं कि मैं ब्राह्मण हूं बल्कि इसलिए कह रहा हूं कि वे ब्राह्मण थे.”

हालांकि इन सबसे पहले वे एक सच्चे क्रांतिकारी थे. भारत माँ के सच्चे सपूत थे.

यहां facebook पर ऐसे कई कुबुद्धिजीवी भी हैं जो ऐसे महानायक को भगोड़ा मानते हैं, उन तक अगर यह बात पहुंचे तो वे यह जान लें कि –

“उस शेर की पिस्तौल से निकली आखरी गोली के करीब 1 घंटे बाद तक भी किसी अंग्रेज सैनिक की हिम्मत नहीं हुई उनके पास जाने की. ”

और जो तुम पूछते फिरते हों ना कि उन्होंने क्या उखाड़ लिया अंग्रेजो का तो भाई जरा तत्कालीन इंग्लैंड के उन गोपनीय संसदीय दस्तावेजों को पढ़ लो, पता चल जायेगा कि उन्होंने क्या उखाडा अंग्रेजो का या कहे उखाड़ ही डाला अंग्रेजो को.

आजादी पर सैकड़ों किताबें पढ़ने से भी जो आजादी का सही अर्थ ना समझ सके उनके लिए केवल चंद्रशेखर आजाद का जीवन चरित्र समझ लेना ही बहुत है.

आज के इस पुण्य दिवस पर मैं आपको यकीन दिलाना चाहता हूं,

है वीर शिरोमणि पूर्वज! बेशक पराक्रम में आपके एक कोटि अंश से भी हमारी कोई तुलना नहीं हो सकती लेकिन रक्त की परिभाषा आज हमारे लिए भी वही है जो तब आपके लिए थी, जो आपको पसंद थी,

“रहे जो रगों में उसके हम नहीं कायल, बहे जो देश की खातिर उसे लहू कहिये”

“हर बार आएंगे और मर मिटेंगे,
वादा है गुलामी ना एक पल सहेंगे…

कहते थे तब भी फिर से कहेंगे ,
आजाद रहे है आजाद रहेंगे….

आज़ाद रहे हैं, आज़ाद रहेंगे

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