हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास-4: अपनी रोजी के लिए अपना खेल दिखा रहे बौद्धिक मसखरे

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Bhagwan Singh

मैं अपनी बात फिर कल की अन्तिम कड़ी से आरंभ करूंगा कि हमें अपनी समस्याओं को अपनी नजर से देखना और समझना होगा, न उन्हें इतिहास में जाकर समझा जा सकता है न इतिहास से बाहर आकर, परन्तु किसी ऐसे व्यक्ति या स्रोत पर भरोसा करके, यहां तक की सही बात को उसके बताने पर सही मान कर चलना उसके फरेब का हिस्सा बनना है क्योंकि जहां बात सही भी हो वहां उसकी प्रासंगिकता, अथवा अनुपात आदि की भिन्नता से आपको आपके ही हितो के विरुद्ध इस्तेमाल किया जा सकता है.

पश्चिमी देश दूसरे महायुद्ध से पहले जब अपने उपनिवेशों के विस्तार की प्रतिस्पर्धा में थे, तब उन सबके विद्वान उन देशों के समाज, भाषा, इतिहास और सत्ता के चरित्र का अध्ययन करने में जुटे रहते थे, इसलिए आप को भारतीय अध्ययन के लिए इतालवी, जर्मन, फ्रेंच, रूसी, अमेरिकी और ब्रितानी अधिकारी माने जाने वाले विद्वान परस्पर प्रतिस्पर्धा करते दिखाई देते थे. एक दूसरे से आगे जाने के प्रयत्न में बहुत परिश्रम से उन्होंने ऐसे काम किये जिनकी गुणवत्ता के समक्ष नतशिर होना पड़ता है. उनके काम की लगन और काम की गुणवत्ता को देखते हुए इस ओर ध्यान ही न जाता था कि उसके पीछे राजनीति भी है.

राजनीति थी यह तो अब आप लौट कर देखें तो इस बात से ही समझ में आ जाएगी कि उपनिवेशों की प्रतिस्पर्धा समाप्त होते ही सभी देशों की दिलचस्पी उन देशों और समाजों और उनके इतिहास में समाप्त हो गई या दिखावे भर की रह गई, जिनका अध्‍ययन करने के लिए उनके विद्वान जुटे हुए थे. यदि किसी की दिलचस्पी बनी हुई है तो अकेला अमेरिका है जिसके साधनों और प्रोत्साहनों से अनेकानेक देशों के विद्वान, स्वयं उसके विद्वान वही काम कर रहे हैं क्योंकि अमेरिका अकेला ऐसा देश है जो विश्‍व को अपनी धौंस में रख कर नवउपनिवेशवादी हथकंडे से उन देशों को हांकना और उनकी संपदा का दोहन करना चाहता है! (नव उपनिवेशवाद उपनिवेशवाद का गर्हित रूप है क्‍योंकि उपनिवेशवाद में उपनिवेशों के भले बुरे का उत्‍तरदायित्‍व भी शासकों पर आता है, नव उपनिवेशवाद में उनको बर्बाद करके भी उनके संसाधनों का दोहन किया जाता है.

इसके साथ ईसाइयत के वैसे ही मंसूबे युद्ध से पहले भी थे और आज भी हैं और इनकी आड़ में भी काफी दूर तक, यदि पूरी तरह न भी कहें तो, अमेरिका है. सच कहें तो मुझे मिशनरी योजनाओं, उनके पीछे के आर्थिक संबल, पश्चिमी देशों के आम ईसाई का धर्मनिष्ठा से इसमें सहयोग और पोप की ओर से दिए जाने वाले समर्थन आदि का गणित मालूम नहीं है. मात्र एक अनुमान है कि यदि एक अकिंचन व्यक्ति को धर्मान्तरण के लिए दो लाख दिया और उसके लिए दूसरी अनेक सुविधाएं जुटाई जा सकती हैं तो इसके लिए पूरी दुनिया में बहुत भारी रकम खर्च हो रही है. यह संभव है कि अमेरिकी प्रशासन इसमें स्वयं धन की व्यवस्था न करता हो, मात्र सुविधाओं और अवसरों का प्रबन्ध करता हो जो समर इंस्टीट्यूट आफ लिंग्विस्टिक्स जैसी संस्थाओं के माध्यम से सीआइए करता है, परन्तु इसका नैतिक समर्थन और कूटनीतिक उपयोग अमेरिकी प्रशासन भी करता है. इसी के भरोसे किलपैट्रिक ने भारत के विखंडीकरण – बाल्कनाइजेशन – की धमकी दी थी और अमेरिका इस पर चुपचाप काम करता रहा है, और इसी के कारण संघ को बिना किसी आपराधिक घटना के आतंकवादी संगठन के रूप में चिन्हित किया गया था और मोदी के वीजा में दखल दिया गया था, क्योंकि संघ अकेला ऐसा संगठन है जो इस धर्मान्तरण का विरोध करता आया है.

जिन दिनों दूसरे देशों के विद्वान भारतविद्या या प्राच्यविद्या में प्रतिस्पर्धारत थे, उन दिनों भी उनके बीच एक छिपी सहमति थी कि ऐसे तथ्यों को जो यूरोपीय अग्रता और गोरी नस्ल की श्रेष्ठताबोध से जुड़े हैं और फरेब के तहत सिद्धान्त के रूप में प्रतिपादित किए गए हैं उनका सम्मान करते हुए ही वे अपने शोध और अध्ययन करेंगे, बल्कि अपने अध्ययनों के माध्यम से उनको अटल सत्य बनाने का प्रयत्न करेंगे.

इतिहास का राजनीतिक और कूटनीतिक उपयोग ही हमारी आज की दुनिया की मानव त्रासदी का सबसे बड़ा कारण है और यदि हम सोचें कि आइएसआइ के जिन कुकृत्यों को संचार माध्यमों से सबसे जघन्य बना कर प्रचारित किया जा रहा है और यह बताया जा रहा है कि ऐसा विश्‍व इतिहास में पहले हुआ ही नहीं था और इसलिए पश्चिमी जगत इससे बहुत भयभीत और चिन्तित है तो यह हमारी नासमझी है. वे स्वयं इससे भी जघन्य कृत्यों में शामिल रहे हैं, और इतिहास की असंख्य ऐसी घटनाओं से परिचित हैं.

हम अपनी जगह बैठे, उनके प्रचार के आधार पर यह मान लेते हैं कि यूरोप और अमेरिका इस्लामी आतंकवाद से दहशत में हैं, परन्तु यह निरी नाटकबाजी है और कुछ दूर तक उनकी योजना का हिस्सा.

इसे भी आप मेरा अनुमान मान सकते हैं, परन्तु आज से तीन साल पहले ‘हाउ डीप आर दि रूट्स आफ इंडियन सिविलाइजेशन’ पर आयोजित एक अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में जिसमें केवल वे तीन पश्चिमी विद्वान सम्मिलित थे, जिनके नामों से हम इसलिए परिचित है कि वे भारतीय या कहें हिन्दू संवेदनाओं के अनुरूप लेखन करते रहे हैं.

मैने अपने निबन्ध का आरंभ ही इस बात से किया कि पश्चिम के अध्येताओं की एक निजी जानकारी है जिससे वे सभी परिचित हैं परन्तु दूसरों से उसका साझा नहीं करते, और एक दूसरी परोसी या निर्यात की जाने वाली जानकारी है जिसमें उस सचाई को छिपाया और विकृत करके परन्तु अन्तिम सत्य बना कर दिखाया जाता है. राजनीतिक और कूटनीतिक तकाजों से इतिहास का उपयोग अब बन्द होना चाहिए. इसी के चलते हमने सभ्यता से हैवानियत पैदा कर दी है.

The dichotomy between private knowledge and public discourse must end as we have produced savagery out of civilization. उस समय वे तीनों विद्वान जिन्होंने आर्यों के आक्रमण की कहानी गलत है का नाद करते हुए ‘दक्षिणपंथी’ सोच के लोगों के बीच अपनी पैठ बनाई थी, मंच पर ही थे और एक के मुंह ये हठात निकल गया, यह तो होता ही रहेगा इसे कैसे रोका जा सकता है और शेष दोनों ने तत्काल सहमति में सिर हिलाया . इसे स्खलक्षर न्याय कहते हैं. असावधानी में सचाई को उगल देना. बाद में वे पछताए भी होंगे क्योंकि मेरा इशारा उनकी तरफ भी था और उन्होंने स्वयं सार्वजनिक रूप से मेरे आरोप की पुष्टि कर दी थी.

मेरे पास अपने आरोप के पुष्ट प्रमाण थे जिनका हवाला अपने निबन्ध में दिया था परन्तु यहां इतना ही कि हमारे सामने दो चुनौतियां हैं जिनका सामना हमें करना होगा पर किया नहीं क्योंकि बुद्धिजीवियों ने सत्ता में अपना टुकड़ा तलाशने में अपनी सारी शक्ति लगाई जब कि उनके सामने पश्चिमी मनोबन्धों से मुक्ति का संग्राम छेड़ने और अपनी ज्ञानसंपदा तैयार करने की, कहें भौतिक स्वाधीनता प्राप्त करने के बाद मानसिक स्वतन्त्रता प्राप्त करने की अधिक गंभीर और लंबी लड़ाई पड़ी थी.

अपनी महिमा से बेसुध, वे जघन्य तरीकों से सत्ता में आए या सत्ता में विराजमान टुच्चों के कृपापात्र बने और बिना अधिक कुछ किए अधिक से अधिक पाने खाने की चिन्‍ता में प्राणवायु को अपानवायु बनाने में व्यस्त रहे. शायद उनकी सारी शक्ति भारत को सांप्रदायिक ताकतों के हाथों में जाने से बचाने में लगी रही और उनकी इस ताकत के बल पर ही उन्हें जिससे डर था वह सत्ता में आ गई. अब वे देश को तानाशाही से बचाने की चिन्ता में लगे हुए हैं और यदि उनकी सोच यही रही जो ‘भारत की बर्वादी तक जंग रहेगी, जंग रहेगी’ में प्रतिध्वनित था, तो असंभव कुछ नहीं है, वे बुरे दिन भी देखने पड़ सकते हैं परन्तु उनका योगदान या कुयोगदान ऐसा है जिस पर वह अंजाम को जाने बिना या जानते हुए गर्व करते हैं.

यह लंबी भूमिका जो इतनी खिंचती चली गई, जरूरी थी यह बताने के लिए कि हमें जो इतिहास पढ़ने को मिला है उसे दुबारा जांचते हुए पढ़ना होगा और जिन भी समस्याओं का समाधान हम चाहते हैं, वह हमें अपनी सीमित और दूसरों से मिली परन्तु परीक्षित जानकारी के आधार पर ही करना होगा.

हम उसी इतिहास को दूसरे के कहने से याद करके उसकी साजिश के शिकार हो सकते हैं, और उसे ही अपने ढंग से समझते हुए उस तरह की साजिशों के चक्रव्यूह से बाहर निकल सकते हैं.

इतिहास की भूमिका चिकित्सा में केस हिस्ट़री जैसी है और इसमें न दूसरी की चाल से घालमेल होना चाहिए न ही अपने राग, विराग, क्षोभ या द्रोह के कारण किसी तरह की मिलावट होनी चाहिए . अच्छा हो या बुरा, तथ्य तथ्य है और उसके किसी अंश को नकारने के बाद हम न तो सही निदान कर सकते हैं न ही उस व्याधि का सही उपचार कर सकते हैं.

हमने पीछे जापान, इजराइल, वियतनाम, ईराक आदि के दृष्टान्त दिए. उन पर जो बीती, वह बीत गई और इतिहास की चीज हो गई, परन्तु यदि इतिहास वर्तमान का हिस्सा बन जाय और हमारे न चाहते हुए भी दूसरों की मध्यकालीन सोच के कारण बना रह जाय तो क्या हम उतनी आसानी से उसको भुला सकते हैं?

हमारा दुर्भाग्य है कि दूसरों का इतिहास इतिहास बन जाता है और वे उससे शिक्षा मात्र लेते हैं, उन्‍हें उससे उलझना नहीं पड़ता, हमारा इतिहास इतिहास नहीं बन पाता और वर्तमान पर भारी पड़ता है और हमारी आधी से अधिक शक्ति उस इतिहास से लड़ने में खर्च हो जाती है. अपनी वर्तमान समस्याओं का सामना करने के लिए ऊर्जा तक नहीं बची रहती!

ऐसा न होता तो पिछले चालीस साल से भ्रष्टाचार, भाई भतीजावाद, मिलावट, जमाखोरी, वंशवाद, निकम्मापन, रिश्‍वतखोरी, बेरोजगारी, बढ़ती हुई आर्थिक विषमता, किसानों की आत्महत्या, देश के बाजारीकरण की प्रक्रिया और आत्मनिर्भरता के ह्रास, शिक्षा की जड़ों में ही नव अभिजातवाद के प्रवेश और उसके उच्छेदन में अरुचि, चिकित्सा के निजीकरण और अधिसंख्य जनों को चिकित्सा सुविधाओं से वंचित किए जाने जैसी समस्याओं को छोड़ कर या उनसे समझौता करते हुए हम केवल सांप्रदायिकता के विरोध पर इतने टूटे हथियारों से जुटे न रहते कि उसी की बदौलत वह आ धमकती और तब पता चलता कि सांप्रदायिकता को मिटाने को वह स्वयं चिन्तित है जिसे सांप्रदायिकता का जनक बताया जा रहा था और उसे जिलाए रखने के तरीके वे निकाल रहे हैं जो कागजी तलवार से इसका विरोध करते रहे हैं, पर जानते हैं कि इसके अतिरिक्त उनको जीवित रखने का कोई मुद्दा बचा ही नहीं है.

बौद्धिक मसखरे अपनी रोजी के लिए अपना खेल दिखा रहे हैं, हम समझ बैठते हैं कि वे देश और समाज के लिए चिन्तित हैं. हम इतिहास को छोड़ने को तैयार रहे हैं, प्रत्येक नये विचार, आन्दोलन, नैतिक तकाजे का समर्थन किया है, परन्तु दूसरों का इतिहास आपके गले पड़ जाय तो क्या उपाय है!

हम हिन्दुत्व के प्रति घृणा के इतिहास की पड़ताल करने को निकले थे और यह इतिहास उस पुरातन अवस्था तक जाता है जब हिन्दू शब्द का प्रयोग नहीं होता था और कोई दूसरा शब्द भी उस अवधारणा का स्थान नहीं ले सकता जिसे हिन्दू शब्द व्यंजित करता है, क्योंकि इसका एक सिरा भौगोलिक क्षेत्र या देश से जुड़ता है और दूसरा संस्कृति से कहें, राष्ट्रीय संस्कृति से. विषय बहुत जटिल और बहुआयामी है! ऐसा कि इसकी भूमिका में ही इतना समय लग गया. फिर आज तो खत्म होने से रहा!

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