सनातन पर ईसाईयत के हमले – 3

सनातन पर ईसाईयत के हमले के प्रथम भाग में बताया गया कि किस तरह अँग्रेजी शासन ने अपने क्रिश्चियन मिशनरियों द्वारा भारत के ज्ञान के आधार अर्थात वेदों पुराणों और अन्य ग्रंथों को अपने अनुसार अनुवादित किया तथा किस तरह हिन्दू भगवानों को बाइबिल की मनगढंत कहानियों में ढूंढा तथा किस तरह ईसाईयों ने हिन्दू भगवानो को यूनान के देवताओं के नाम से प्रमाणित किया तथा सनातन पर ईसाइयत के प्रभाव आधारित बताया.

इसी प्रकार सनातन पर ईसाइयत के हमले -2 में बताया गया किस तरह ईसाइयत ने अपने मंसूबो को कामयाब बनाने के लिए कौन-कौन से संस्था खोले, उनका उपयोग किस तरह भारत को तोड़ने के लिए किया, तथा कौन-कौन से ईसाई मिशनरी भारत आये तथा किस तरह भारत की सभ्यता को ईसाई सभ्यता बनाने में समर्थ हुए.

अब हम बात करेंगे किस तरह ईसाई मिशनरियों ने भारत के कुछ लालची लोगों को मिशनरी बनाया तथा किस तरह इनका दुरुपयोग कर भारत में ईसाइयत की नींव डाली.

आज भारत में रहने वाला हर नागरिक भारतीय कहलाता है, वैसे ही भारत जब आर्यावर्त था तब हर नागरिक आर्य कहलाता था. लेकिन मैक्स मुलर ने आर्य को बाहरी बताते हुए एक थ्योरी दी जिसमें महाप्रलय के बाद जाफेथ (जाफेथ नूह का पुत्र था, ज़्यादा जानकारी के लिए प्रथम भाग पढ़े) के कुछ वंशज दुनिया को जीतने के लिए भारत में आये और भारत में ही बस गये, जिन्हें भारतीय आर्य बोला गया.

मैक्स मूलर (1823-1900) औपनिवेशिक शासकों और ईसाइयत के प्रचारक की तरह आधिकारिक रूप से कार्य करते थे.

उन्होंने 16 दिसम्बर 1868 को ब्रिटेन के विदेश मंत्री ओर्गोइल के ड्यूक को पत्र लिखा जिसमें उन्होंने बताया कि ‘भारत का प्राचीन धर्म (सनातन) अब पूरी तरह ध्वस्त होने को है, अगर ईसाइयत इस समय भारत में प्रवेश नहीं करती तो यह किसकी गलती होगी?’

फिर उन्होंने लिखा कि ‘मैं वह दिन देखने के लिए जीवित नही रहूँगा फिर भी मेरा यह वेदों का अनुवाद का संस्करण भारत के भविष्य और इस देश के लाखों मनुष्यों को ईसाइयत के लिए बहुत प्रभावित करेगा.’

फिर उन्होंने लिखा कि ‘इन भारतीयों को वेदों के मूल को अपने अनुसार दिखाया जाये और पिछले तीन हज़ार साल में जो कुछ भी इससे निकला वो सब नष्ट कर दिया जाये अर्थात भारतीय देवी देवताओं के प्राचीन वैभव को पूर्णतः भ्रष्ट कर दिया जाये, तथा भारत की वर्ण व्यवस्था जो आज तक हिंदुओं के धर्मान्तरण में सबसे बड़ी रुकावट थी, वह भविष्य में धर्मांतरण का सबसे बड़ा इंजन साबित हो सकती है बशर्तें कुछ बड़े भारतीय लोगों को लालच में रखकर अपने पक्ष में खड़ा कर लिया जाये.’

इसी तरह मैकाले (भारतीय एजुकेशन सिस्टम मैकाले एजुकेशन सिस्टम पर ही आधारित है) ने भी ब्रिटिश सरकार को एक पत्र लिखकर जानकारी दी कि ‘जब वो भारत भ्रमण पर निकले तब उन्हें कहीं भी कोई गरीब या भिखारी नहीं मिला. भारत में एक सुसंगठित व्यवस्था है और आर्थिक रूप से बहुत ही संपन्न देश है. अगर हमें इस देश को तोड़ना है तो इनकी रीढ़ की हड्डी की तरह सुदृढ़ व्यवस्था को तोड़ना होगा तथा इनकी पुरानी मान्यताओं को तोड़ कर बाइबिल सम्बंधित मान्यताएँ देनी होगी तथा इनके पौराणिक (वेद, पुराण) एजुकेशन सिस्टम को बदलकर नया एजुकेशन सिस्टम बनाना होगा.’

आज भी यह धोखेबाज़ी का सिलसिला रुका नहीं, आजकल ईसाई मिशनरी दिन प्रति दिन नया रूप धारण करते जा रहे हैं. आज देश में हालेलुया ग्रुप बहुत ही ज़्यादा भारत का वातावरण ख़राब कर रहे हैं.

आजकल जीसस के नाम पर जो कन्वर्शन का सिलसिला चल रहा है अगर वह अभी थमा नहीं तो भारत के लिए बहुत विकट स्थिति बन जायेगी.

वहीँ दूसरी तरफ़ आज भी धर्म दीपिका और अग्नि मिनिस्ट्री नाम की बहुत सी मिशनरी शोध पत्रिकाएँ हैं जिनमें सन् 2000 तथा उसके बाद कई आलेख छपे हैं.

इन नए बने हुए ईसाई मिशनरियों ने इन लेखों में दिखाया है कि ‘ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में जो प्रजापति बताये गए हैं वो वास्तव में ईसा मसीह ही हैं.’

ऐसे ही चेन्नई के लोकप्रिय ईसाई प्रचारक स्वयं को साधु कहने वाले साधु चेल्लप्पा ने कहा कि वेदों में प्रजापति ईसा मसीह के आने का पूर्वानुमान था इसलिए बिना ईसा मसीह के वेदों की ख़ोज अपूर्ण है.

साधु चेल्लप्पा ने अपने लेख में लिखा है कि – “Diwali, the festival of lights, is a Christian Festival, Animal Sacrifice is a Christian culture adopted by Hindus and Gayatri Mantra actually glorifies Jesus. The Vedas, the ancient Indian sacred writings had anticipated the coming of Christ to take away the sins of man. They call Him Purusha Prajapati the creator God who would come as a man to offer himself as a sacrifice. Jesus Christ came to fulfill the Vedic quest of the Indian people, because the Vedas are incomplete without Him, just as the Old Testament was fulfilled at the coming of the Messiah’.

ऐसे ही सन् 1961 में हिन्दू से ईसाई बने एम. देइवनयमम ने एक तमिल पुस्तक प्रकाशित की जिसका नाम था ‘Was thiruvalluvar a Christian’ जिसका शोध था कि संत थॉमस जो ईसा की मृत्यु के बाद सन् 52 में भारत आये और उन्होंने सर्वाधिक प्रसिद्ध तमिल लेखक तिरूवल्लुवर का धर्मान्तरण कराया जिससे ‘तिरुकुरल’ एक ईसाई ग्रन्थ हो गया (चूँकि तिरुकुलर तमिल का अब तक 2000 सालों में सबसे प्रसिद्ध ग्रन्थ है).

ऐसे ही देइवनयमम और उसको साथियों ने एक और मान्यता दी जिसके अनुसार ‘संत थॉमस सन् 52 में भारत आये और उत्तर भारत में ईसाईयत के प्रचार के लिए संस्कृत भाषा का उदय किया लेकिन दुष्ट ब्राह्मणों और आर्यों ने उस भाषा को हथिया लिया.’

उन्होंने कहा कि, ‘वेदों की रचना ईसा मसीह के आने के काफी बाद अर्थात दूसरी शताब्दी में हुई थी. और हिन्दू धर्म में वास्तुकला, मूर्तिशिल्प और भक्ति से जुड़ाव थॉमस के ईसाईयत के प्रभाव से ही हुआ है.’

और मिशनरियों ने कहा कि ‘ब्राह्मण संस्कृत और वेदांत शिक्षा बुरी शक्तियां हैं जिन्हें समाज के पुनर्शुद्धिकरण के लिए समाप्त कर देना चाहिए.

फिर इन मिशनरियों ने संत थॉमस की मृत्यु पर एक और नई कहानी गढ़ दी जिसके अनुसार ‘3 जुलाई 72 को ईसा मसीह के शिष्य संत थॉमस पहाड़ी की ओर जाते समय कुछ चेन्नम्ब्रनार ब्राह्मणों से मिले जो बलि चढ़ाने के लिए मंदिर जा रहे थे.

उन ब्राह्मणों ने चाहा कि सन्त थॉमस भी उनकी पूजा में शामिल हों, पर सन्त थॉमस ने बलि चढ़ाने से जब उन ब्राह्मणों को रोका तथा सलीब के चिन्ह से उस पूजा स्थल को नष्ट कर दिया, तब उन दुष्ट ब्राह्मणों ने गुस्से में ईसा मसीह के पुत्र संत थॉमस को भाले से गोद कर मार डाला’

क्रमश: 4

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