वीर सावरकर पुण्य स्मरण : जब कांग्रेस गाती थी God save the King, तब वे जुते थे कोल्हू में

आज परम पूज्य स्वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर जी की पुण्यतिथि है… कुछ तथ्य जो उनके व्यक्तित्व का वर्णन करते हैं …

बहुत कम लोगो को इसकी जानकारी है कि वीर सावरकर ने भी मोतीलाल नेहरु, जवाहर लाल नेहरु और मोहनदास करमचंद गाँधी की तरह बार एट लॉ की परीक्षा पास की थी, पर इंग्लैंड में उन्हें बैरिस्टर की डिग्री सिर्फ इसीलिए नहीं मिली क्योंकि उन्होने अंग्रेजों की वफ़ादारी की शपथ लेने से इनकार कर दिया था.

सन 1900 में उन्होंने ही पूर्ण स्वतंत्रता को अपना लक्ष्य बताया था. भारतीय इतिहास में ऐसा कहने वाले वो प्रथम क्रन्तिकारी थे. इससे पश्चात् परम पूज्यनीय डॉ हेडगेवार जी ने कांग्रेस अधिवेशन में इसकी मांग रखी, जिसे ठुकरा दिया गया. जिसे हुतात्मा भगत सिंह ने जोरदार तरीके से उठाया. बाद में 1929 में कांग्रेस ने इसे मान्यता दी. इससे पहले तक गाँधी एंड नेहरु कम्पनी डोमिनियन स्टेट की मांग करते थे.

नवम्बर 1905 में उन्होंने भारत में पहली बार विदेशी वस्त्रो की होली जलाई, वो भी तथाकथित महात्मा से लगभग 17 साल पहले.

जब कांग्रेस के अधिवेशन में “लॉन्ग लिव द किंग” गाया जाता था, तब वीर सावरकर कोल्हू में बैल की जगह जुत कर 30 सेर तेल रोज निकलते थे. नारियल के रेशे से रस्सी बुनते थे.

1908 में उन्होंने “भारत का स्वाधीनता संग्राम 1857” लिखा जिसे अँग्रेज़ों ने छपने से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया था. इसे भारत में स्वयं भगत सिंह के छपवा कर बंटवाया था. इस ग्रंथ को क्रांतिकारियों की गीता कहा जाता था. विडंबना देखिये आज भगत सिंह के कथित समर्थक ही वीर सावरकर पर भद्दे कमेंट करते हैं.

अँग्रेज़ों के शासन काल में वो अकेले ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्हें 2 जीवन काले पानी की सज़ा दी गयी थी. इस पर जब उनसे पूछा गया कि वो इस सजा को किस रूप में देखते हैं तो उन्होंने कहा था कि ‘2 जन्म की छोड़िये मुझे तो इस पर हंसी आती है कि अंग्रेज सरकार ये समझती है कि ये लोग भारत पर शासन करते रहेंगे, क्रिश्चियन जिनका पुनर्जन्म में विश्वास नहीं वो लोग मुझे 2 जन्म का कारावास दे रहे हैं. इससे बड़ी जीत और क्या होगी?’

एक महान क्रांतिकारी होने के साथ-साथ वो एक महान कवि भी थे. अंडमान की जेल में उन्होंने कील से दीवारों पर खुरच कर लगभग 10000 पंक्तियों का महाकाव्य लिखा था.

परम पूज्य डॉ. हेडगेवार जी, बाबा साहेब आंबेडकर और गाँधी की तरह ही वीर सावरकर समाज सुधारक भी थे. ब्राह्मण होते हुए भी वो छुआछूत के सबसे बड़े विरोधी थे. 1931 मे उन्होने ‘पतित पावन मंदिर’ की स्थापना की थी जिसमे सभी हिंदू बिना किसी भेदभाव के पूजा कर सकते थे. इस मंदिर में दलित पुजारियों की नियुक्ति की गयी थी. जिस ज़माने में किसी दलित की छाँव मात्र से कथित सवर्ण अपवित्र हो जाते थे उस समय मंदिरों में दलित पुजारियों की नियुक्ति बहुत बड़ी बात थी.

1937 मे उन्हे हिंदू महासभा का अध्यक्ष चुना गया था. उसके बाद उन्होंने इस संगठन को एक नयी दिशा दी.

यहाँ अगर मैं वीर सावरकर पर लिखना शुरू करूँ तो शायद मेरी डायरी के सारे पन्ने भर जायेंगे, मेरी कलम की स्याही खत्म हो जाएगी और फिर भी मैं उनके व्यक्तित्व का एक छटांक भी वर्णन न कर पाउँगा.

दुःख होता है कभी-कभी जब ऐसे महान क्रांतिकारियों पर कुछ तथाकथित ‘फेसबुकिये क्रांतिकारी’ लांछन लगाते हैं. सूर्य पर थूकने वाले शायद ये भूल जाते हैं कि उनका थूक वापस उन्हीं के चेहरे पर गिरता है. आप चाहे सावरकर को कितना ही कलंकित करने की कोशिश क्यों न करो हर बार आप मुंह की ही खाओगे.

शत-शत नमन उस वीर को जिसने अपने जीवन के बहुमूल्य 29 वर्ष जेल और नज़रबंदी मे बिताए और बदले में आज़ाद भारत में जेल गए. जिसने भारत की आज़ादी के लिए अपने नाख़ून खिंचवाये और बदले में आज़ाद भारत में ताने सुने. माँ भारती अपने इस वीर पुत्र पर गर्व करती है.

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