किताबी कीड़ा नहीं, बनों किताबी तितली

book butterfly Ma Jivan Shaifaly

“मर्जी का हो तो अच्छा, न हो तो और अच्छा”- ये श्री हरिवंशराय बच्चन द्वारा कहा गया वो ब्रह्मवाक्य था जो वो अक्सर अमिताभ बच्चन को कहा करते थे और उस बात को अमिताभ ने न सिर्फ सुनी बल्कि अपने पूरे अस्तित्व के साथ स्वीकार की, जिसका परिणाम आज सदी के महानायक के रूप में हम सबके सामने प्रस्तुत है- बेशक अमिताभ का सोचा हुआ कुछ और था यदि वो हो जाता तो शायद उन्होंने ये मुकाम हासिल न किया होता….

कहते हैं कि वटवृक्ष के नीचे कोई पौधा नहीं पनपता लेकिन श्री हरिवंशराय बच्चन जैसे विराट व्यक्तित्व के स्वामी की छत्रछाया में अमिताभ के व्यक्तित्व का विस्तार इस बात को सिद्ध करता है कि अमिताभ ने चाहे हरिवंश का लिखा सारा का सारा साहित्य पढ़ा हो और उसे जहां तहां सुनाते हुए भी नज़र आते हैं, लेकिन बहुत कम जगह उन्होंने अपने पिता के इस ब्रह्मवाक्य को उजागर किया है कि मर्जी का हो तो अच्छा न हो तो और अच्छा… क्योंकि उन्होंने इस ब्रह्मवाक्य को जीया है… लिखे हुए की तरह केवल लोगों को पढ़कर नहीं सुनाया…

क्योंकि अमिताभ इस बात को समझ सके कि लिखा जाने वाला अक्सर वो होता है जो पकड़ में आ जाता है … जो छूट जाता है वो कभी पकड़ में न आने वाली बात होती है जिसको कितना भी पकड़-पकड कर शब्दों में डालो वो हाथ से मछली की तरह छूट कर गिर जाती है उस नदी में जहां उसके जिंदा रहने की गुंजाइश सबसे ज़्यादा रहती है…

जो पकड़ा गया, लिखा गया, समझा गया वो मृत हो गया हम शब्दों की लाशें गाड़े रहते रहते हैं किताबों की कब्र में, और मायने भटकते रहते हैं कभी रूह बनकर कभी भूत बनकर….

इसलिए बुद्ध ने कभी कुछ नहीं लिखा, कबीर ने कभी कुछ नहीं लिखा, ओशो ने कभी कुछ नहीं लिखा, उन्होंने सिर्फ कहा. जो आध्यात्मिक, ब्रह्मांडीय ज्ञान प्राप्त किया वो कहा.. जो आज भी ऊर्जा के रूप में घूम रहा है ब्रह्माण्ड में और उनके अनुयायियों ने अपने अपने अर्थ निकालकर ग्रन्थ बना लिए…

कृष्ण ने अर्जुन से सच में क्या कहा था कोई नहीं जानता … हम सिर्फ वही जानते हैं जो व्यास ने गणपति से लिखवाया…

उसी तरह जो कहा गया वो अनुयायियों ने अपने अपने सन्दर्भ पकड़कर लिख डाला… सहमति और असहमति का चक्रव्यूह बनाकर खुद ही उलझते रहे… खुद को सही साबित करने के लिए अपने ही सद्गुरू द्वारा कहे अर्थों के साथ शब्दों का खिलवाड़ करते रहे…

आज भी वही हो रहा है इस खेल में अक्सर हम जीत भी जाते हैं लेकिन कब तक….. एक बिंदु पर आकर तो सारी सहमति-असहमति एकाकार होकर शास्वत सत्य में उतर आएगी तब क्या करोगे…

आज का समय पराकाष्ठा की सीमा को उलांघता अभिव्यक्ति का युग है, ये क्रांतिकारी नहीं विघटनकारी है …. क्योंकि हमें सिर्फ अपनी कहनी है दूसरों की सुननी नहीं है जिसके लिए हम अपने ही सिद्धांतों को ताक पर रखकर केवल कहने में लगे हुए हैं….

शब्दों का चयन कोई मायने नहीं रखता, किसी भी शब्द विन्यास के साथ मर्जी के अर्थों को ठूंसकर हम भाषा के साथ बलात्कार कर रहे हैं .. और नाजायज़ शब्दों और अर्थों को पैदा कर रहे हैं ..

शब्दों को सम्मान दो उससे अधिक अर्थों को … क्योंकि शाश्वत सत्य ब्रह्माण्ड की संदूकची में बंद है जिसके आगे आपकी सारी बातें गौण है … जो आप लिख रहे हैं ब्रह्माण्ड की ऊर्जा में सम्मिलित नहीं हो रही लेकिन सही अर्थों में ढाला गया तो अर्थ उस संदूकची तक पहुँच सकेंगे…

या यूं कहें कि ब्रह्माण्ड के वो शाश्वत सत्य आपके अक्षरों की देह में ना सही उनके अर्थों में ज़रूर उतरेंगे….

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