कश्मीरी भाषा को मिल सकती है देवनागरी लिपि के प्रयोग की मान्यता

सुनने में आया है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय,भारत सरकार, कश्मीरी भाषा के लिए देवनागरी लिपि की आवश्यकता और उपयोगिता को समझते हुए एक प्रारूप तैयार कर रहा है.

यों केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने कश्मीरी के लिए नागरी-वर्णमाला तैयार कर रखी है. भुवन वाणी ट्रस्ट, लखनऊ ने भी इसी तरह की लिपि निर्देशिका मेरे निर्देशन में बनाई है.

मित्रों को जानकार ख़ुशी होगी कि कश्मीरी की प्रसिद्ध रामायण “रामावतारचरित” का सानुवाद देवनागरी में लिप्यंतरण मैंने इसी निर्देशिका के अनुसार बहुत पहले किया है. लगभग 500 पृष्ठों की यह रामायण ट्रस्ट से 1975 में छप चुकी है और इस की प्रस्तावना डॉ0 कर्णसिंह जी ने लिखी है.

बिहार सरकार ने मेरे इस परिश्रमसिद्ध कार्य के लिए मुझे ताम्रपत्र से सम्मानित किया है. उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की ओर से भी इस कार्य के लिये मुझे प्रशस्तिपत्र पदान किया गया है जिस पर हिंदी जगत के प्रसिद्ध विद्वान और आलोचक हज़ारीप्रसाद द्विवेदी के हस्ताक्षर हैं.

अगर कश्मीरी के लिए देवनागरी लिपि के प्रयोग को सरकारी मान्यता मिलती है तो निश्चित रूप से कश्मीरी भाषा और साहित्य को आशातीत गति मिलेगी. ख़ास तौर पर विस्थापित कश्मीरी पंडितों को देवनागरी लिपि का प्रयोग करने में खासी सुविधा होगी.

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