सनातन पर ईसाईयत के हमले -1

​ईसाईयत ने भारत में अपना वर्चस्व बनाने के लिए सनातन की जड़ों अर्थात वेद, पुराण और रामायण जैसे धार्मिक ग्रंथो पर प्रहार किया.

1600 से आज तक भारत में बहुत से ईसाई विद्वान् रॉबर्ट डी नोबली, विलियम जोन्स, मैक्स मुलर, ब्रायन होऊटन और बिशप राबर्ट कोल्डवेल जैसे ईसाई मतावलंबी भारत आये और उन्होंने भारतीय भाषाविज्ञान का मानचित्र बाइबिल के मानव विज्ञान के अनुरूप तैयार किया.

Robert de Nobili (1577-1656) नाम के ईसाई मिशनरी थे जिन्होंने दावा किया कि उन्हें एक पुराना ग्रन्थ मिला है जो पूरी भारतीय परम्पराओं को ईसाईयत के ही एक उपधर्म की तरह दिखाता है, जिसे “पंचम वेद” नाम दिया जिसे ईसा वेद भी कहते हैं.

इसके समर्थन में ईसाई मिशनरी और हिन्दू साधुओं के रूप में छिपे हुए ढोंगियों ने यहाँ तक कह दिया कि

“इस ‘पंचम वेद’ की पाण्डुलिपि निःसन्देह उस काल की ही है जब बाक़ी वेद लिखे गए थे” और कहा कि “प्राचीन धर्मों के विकृत होने के कारण साधुओं ने एक ईश्वर में विश्वास किया और ये वेद लिखा अब इसे ‘इजूर वेदम्’ सबसे सत्य और शुद्ध वेद कहा जाये.”

मैक्स मूलर, विलियम जोन्स, और बिशप रोबर्ट कोल्डवेल जैसे ईसाई मिशनरियों ने रोबर्ट डी नोबिलि की मनगढ़ंत कहानी का खुलकर समर्थन किया और उसकी विरासत को आगे बढ़ाने और वैदिक शब्दावलियों का इसाईकरण भी किया ताकि हिंदुओ के बीच गलतफहमियां पैदा की जा सकें.

फिर विलियम जोन्स ने समान ध्वनि वाले नामों और संयोग से आये समध्वनि शब्दों से बाइबिल और वेदों, पुराणों का बाहरी आंकलन किया, और उन्हें एक दूसरे के अनुरूप बताया. जैसे जोन्स ने कहा कि नूह के जलप्रलय के बाद शीघ्र ही राम ने भारतीय समाज का पुनर्गठन किया, इसलिए भारत बाइबिल से जुड़ी सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है.

शब्दों की ध्वनियों में संयोग से प्रकट होने वाली समानता के आकलन से विलियम जोन्स ने हिन्दू भगवान “राम” को बाइबिल के “रामा” से जोड़ा और “राम” के पुत्र “कुश” को “हैम” के पुत्र “कुसा” से जोड़ दिया.

जोन्स ने विष्णु के चौथे अवतार नरसिंह को नमरूद के रूप में अनुमोदित किया जो हैम का वंशज था और “बेबल की मीनार” से संबंधित था.

इसके बाद ईसाई विद्वानों ने अपनी उद्देश्य प्राप्ति के लिए वेद-पुराणों की शब्दावलियों के बाइबिल से सम्बन्ध ढूंढ निकाले, उसके बाद जोन्स ने मनु स्मृति का अध्ययन करके मनु स्मृति में भी ईसाईयत का उल्लेख होने की पुष्टि की.

विलियम जोन्स का उद्देश्य यह प्रमाणित करना था कि “बाइबिल में दिए गए मोज़ेज (मूसा) के वर्णन की पुष्टि संस्कृत ग्रंथों ने भी की है और ऐसा करने के लिए जोन्स ने मनु को आदम माना और विष्णु के प्रथम तीन अवतारों को नूह के जलप्लावन की कहानी में ढूँढा.

फिर जोन्स ने एक और दावा किया कि मनु ही नूह है और तर्क दिया कि “बाइबिल में वर्णित नाव पर सवार आठ मनुष्यों की कहानी वास्तव में मनु और सप्त ऋषियों की स्वर्ग जाने वाली कहानी ही है.”

फिर जोन्स ने हिन्दू देवताओं को यूनानी देवताओँ के समांतर रखकर उन सभी को एक ही अवतार बता दिया, केवल उनके नाम बदल दिए.

बाइबिल का सहारा लेते हुए जोन्स ने भारतियों को हैम की संतान बताया है, और अरबवासियों को शेम की संतान बताया है तथा यूरोपियों को जाफेथ की सन्तान बताया है.

अब मुद्दे पर आता हूँ. चूँकि हम भारतीय पहले अरबियों के ग़ुलाम रहे, फिर यूरोपियों के ग़ुलाम रहे, तब जोन्स ने अपना तर्क देते हुए कहा कि हम भारतीय हैम की संतान है और बाइबिल के अनुसार हमें गुलाम रहना था.

(चूँकि बाइबिल के अनुसार महाप्रलय के बाद नूह के तीनों पुत्र हैम, शेम और जाफेथ ही दुनिया की आबादी के पूर्वज हैं, जिसमें हैम जो नूह की नग्नता (महाप्रलय के बाद नूह वाइन पीकर अपनी कुटिया में नंगा सो रहा था) पर हँस पडा, तब नूह ने हैम को श्राप दिया कि तेरे वंशज शेम और जाफेथ के वंशजो की ग़ुलामी करेंगे.)

क्रमशः 2

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