गुरु गोरखनाथ के महान इतिहास के बावजूद उपेक्षित हैं नाथ सम्प्रदाय के लोग!

जून 2001 में नेपाल के युवराज दीपेन्द्र ने काठमांडू के शाही महल में राजा बीरेन्द्र विक्रमशाह और महारानी ऐश्वर्या सहित शाही परिवार के 7 लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी थी… बाद में दीपेन्द्र ने भी आत्महत्या कर ली…

नेपाली मीडिया के अनुसार दीपेन्द्र राजकुमारी देवयानी राणा से विवाह करना चाहते थे लेकिन शाही परिवार इस रिश्ते के लिये तैयार नही था… इसी बात पर क्रोधित होकर उन्होने पूरे शाही परिवार की हत्या कर दी. राजा बीरेन्द्र के बाद उनके भाई ज्ञानेन्द्र को नेपाल का शासक बनाया गया किंतु नेपाली जनता ने उन्हें स्वीकार नही किया और कुछ समय बाद नेपाल की जनता ने राजशाही का अंत कर अपने राष्ट्र मे पूर्णतया लोकतंत्र का मार्ग अपना लिया.

शैव सम्प्रदाय की एक शाखा ‘नाथ सम्प्रदाय’ के नाम से जानी जाती है. इस सम्प्रदाय के संस्थापक ‘मत्स्येन्द्रनाथ’ थे जिन्होने ‘योगिनी कौल’ नामक सिद्धांत का प्रतिपादन किया था. इनके शिष्य ‘गुरू गोरखनाथ’ ने ‘नाथ सम्प्रदाय’ को परम वैभव पर पहुंचाया था. इनका वास्तविक नाम ‘गोरक्षनाथ’ था. अर्थात गायों की रक्षा करने वाले ‘गुरू गोरखनाथ’ ने अनेक सिद्धांतो का प्रतिपादन किया था जो इतने जटिल थे कि सामान्यजन को समझ नहीं आते थे. अत: आज भी समाज में अबूझ मामले को लेकर कहा जाता है कि ये क्या ‘गोरखधंधा’ लगा रखा है. ‘गुरू गोरखनाथ’ ने शक्ति की पांच स्थितियां बताई थी-
1 निजा
2 परा
3 अपरा
4 सूक्ष्मा
5 कुंडली
ये गूढ़ अध्ययन के विषय हैं.

‘गुरू गोरखनाथ’ ने सारे भारत का भ्रमण कर ‘नाथ सम्प्रदाय’ का प्रचार प्रसार किया…पूर्व में असम से लेकर पश्चिम मे बलोचिस्तान और उत्तर मे कश्मीर से दक्षिण मे श्रीलंका तक… श्रीलंका मे इनके ‘गुरू मत्स्येन्द्रनाथ’ को राजदरबार मे विशिष्ट स्थान दिया गया था. ‘गुरू गोरखनाथ’ को सर्वप्रथम नेपाल मे देखा गया था. उस जगह को नेपाल मे – “गोरखा” कहा जाता है.

आज नेपाल में गोरखा एक जिला है. ‘गुरू गोरखनाथ’ के नाम पर ही नेपाल की प्रजा के एक बड़े समुदाय को गोरखा कहा जाता है. भारतीय सेना में भी ‘गोरखा रेजिमेंट’ है. गोरखे स्वामीभक्त और साहसी होते हैं. ये कभी अपने स्वामी के साथ गद्दारी नहीं करते. यही कारण है कि ब्रिटेन की महारानी के जो निजी अंगरक्षक है वे गोरखा ही है.

भारत के उत्तरप्रदेश मे भी एक जिला है जिसका नाम गोरखपुर है. यहां ‘गोरक्षनाथ महाराज’ का मंदिर है. इस जिले का नाम गोरखपुर इन्ही ‘गुरू गोरखनाथ’ के नाम पर पड़ा.

एक बार ‘गुरू गोरखनाथ’ भ्रमण करते हुऐ नेपाल की राजधानी काठमांडू पहुंचे. यहां नेपाल नरेश ‘पृथ्वीनारायणशाह’ ने गुरू की बेहद सेवा की. प्रसन्न होकर गुरू ने उनसे वर मांगने को कहा. शाह ने कहा कि उनके वंश का राज नेपाल में अजर अमर रहे. तब ‘गुरू गोरखनाथ’ ने उनसे एक कटोरा दही मांगा. शाह ने उनको दही दिया. ‘गुरू गोरखनाथ’ ने दो घूंट दही पीकर वह दही वापस उस कटोरे मे उगल दिया. और उस दही को राजा से पीने के लिये कहा. शाह क्रोधित हो गये.

उन्होंने दही धरती पर फेंक दिया. दही के छींटे उनकी पैर की उंगलियो पर गिरे. तब ‘गुरू गोरखनाथ’ ने क्रोधित होकर ‘पृथ्वीनारायणशाह’ के परिवार के बारे में भविष्यवाणी की कि यदि तुम इस दही को पी लेते तो तुम्हारा वंश नेपाल पर जब तक संसार रहता तब तक शासन करता. किंतु तुमने दही स्वयं अपने हाथ से धरती पर गिरा दिया. तो पैर की जितनी उंगलियो पर यह दही लगा है उतनी पीढ़ी तक ही तुम्हारा वंश नेपाल में शासन कर पायेगा. उसकी अगली पीढ़ी में आत्मघात के कारण नेपाल से तुम्हारे वंश का नाम मिट जायेगा. पैर की दस उंगलियों पर दही लगा था. बीरेन्द्र विक्रमशाह ‘पृथ्वीनारायणशाह’ की दसवी पीढ़ी के सदस्य थे.!!!

‘नाथ सम्प्रदाय’ का इतना महान इतिहास होने पर भी जब एक समाचारपत्र में ‘नाथ सम्प्रदाय’ के मृतकों को घरों में दफनाने की खबर पढ़ी तो विश्वास ही नहीं हुआ कि भारतीय सनातन संस्कृति और पंरपराओं को जितना नुकसान 800 साल के असभ्य अरबी गुलामी और 200 साल के यूरोपीय/अंग्रेजों के शासन ने नहीं पहुंचाया उससे कहीं अधिक क्षति 70 साल के घृणित सेकुलरी शासन ने सनातन संस्कृति को पहुंचाई है.

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