मुख्यमंत्री बाल हृदय उपचार योजना की धज्जियां उड़ाती मप्र की नौकरशाही

मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का फाइल फोटो और मरीज़ बालिका तनु

बाबा तुलसीदास भी गजब के विचारक थे, सरल भाषा में इतने मतलब की बातें बता गए कि उन बातों की गांठ खोलकर, आज चार सौ साल बाद भी सूंघा जाए, तो आपको मंत्र मुग्ध होकर गहरे सोच में डूबने को मजबूर होना पडेगा.

अब देखिये, किस तरह भगवान राम समुद्र से तीन दिनों तक अनुनय-विनय करते रहे कि उन्हें लंका तक जाने का रास्ता दिया जाए. पर समुद्र था कि हमारे सरकारी तंत्रों की तरह श्री राम के प्रार्थना पत्र की फाईल को बिना किसी निर्णय के बिला बजह लटकाता रहा.

समुद्र ने यह नहीं सोचा कि श्री राम का जल्दी से जल्दी लंका पहुंचना कितना जरूरी था. अन्त में मजबूर होकर राम जी को क्रोध आ गया. उन्होने देरी से परेशान होकर अपना धनुष उठा लिया और तीर चढ़ाकर समुद्र को सुखाने की चेतावनी दे डाली.

अपने अस्तित्व पर आए खतरे से डर कर समुद्र तुरन्त ही प्रगट हो गया और हाथ जोड कर क्षमा याचना करने लगा. तुरन्त ही लंका तक जाने के लिए ‘सेतु बनाने’ का नक्शा पास करके पुल बनाने का तरीका भी बता दिया.

सामान्य स्थिति में मानवीय आधार पर समुद्र को राम की प्रार्थना पर तुरन्त ही यह सब कर लेना था. उसके पास देरी करने का कहीं कोई कारण तर्कसंगत नहीं था. महान बाबा तुलसी दास जी ने इस कथानक का कितना उम्दा और सटीक चित्रण किया है –

विनय न मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीत,
बोले राम सकोप तब, भय बिनु हौंहि न प्रीति

संवैधानिक व्यवस्था वाले देशों में सबको कानून का भय होना जरूरी होता है. एक तरफ सिंगापुर को देखिए और दूसरी तरफ हमारे भारत को देखिए. जमीन आसमान का फर्क है.

हम 1947 में आजाद हुए, उन्हीं अंग्रेजों से 1965 में सिंगापुर को आजादी मिली. सिंगापुर का आकार इन्दौर जिले के बराबर, भारत के आगे राई के दाने के बराबर. पर प्रगति, विकास, नागरिक हितों और कानून-व्यवस्था, आधुनिकीकरण के मामले मे हमसे हजार गुना ज्यादा आगे है.

मजाल है वहां कोई लाल बत्ती कूदकर आगे बढ जाये. दुनिया के सभी धर्मों के लोग वहां रहते हैं. हिन्दू, मुस्लिम, बौद्ध, चीनी, मलेशियन, ऑस्ट्रलियन जिस धर्म के चाहे उस धर्म और देशों के. पर भला हिम्मत है किसी की जो धर्म, जाति, रंग, रूप के बलबूते पर दबंगई कर सके. असम्भव….

असम्भव, पर ऐसा कैसे सम्भव है? सिर्फ और सिर्फ एक ही वजह से, वह वजह है कानून का भय. कानून तो हमारे यहां भी है, पर उसका भय लुच्चे, लफंगे, चोर, बेईमान, लुटेरे, हत्यारे, बलात्कारी, कमीनो, भ्रष्टाचारियों को कतई नहीं है. क्योंकि उन्हें मालूम है कि हमारी कानून-व्यवस्था इतनी लचीली है कि उसे जैसे भी चाहो वैसे अपने हित में मोड़ा जा सकता है.

जहॉ तक कानून बनाने, कानून चलाने, और कानून की धज्जियां उड़ाने वालों पर पैनी नजर रखने का सवाल है, हमारे देश मे घूम फिर कर यह राजनेताओं और प्रशासकीय तन्त्र जिसे ब्यूरोक्रेसी कहते हैं, यह अक्सर इन दोनों के हाथ का खिलौना बन कर रह जाती है.

योजनाएं कितनी भी सार्थक क्यों न हों, पर उनका क्रियान्वयन जब तक प्रभावी ढ़ंग से तथा ईमानदारी से नहीं होगा तब तक विकास का ढ़ोल पीट कर हम ‘नरोवा कुंजरोवा’ कह कर जनता को गुरू द्रोणाचार्य की भांति मूर्ख बना कर अपना उल्लू तो सीधा कर सकते हैं पर बुराईयों के अश्वत्थामा का अन्त नहीं कर सकते हैं.

इस विवेचन के प्रमाण में, मैं आप सब के विचारार्थ एक महत्वपूर्ण प्रकरण प्रस्तुत कर रहा हूं.

मरीज का नाम- बेबी तनु
आयु- 14 वर्ष
जाति- बंजारा
पिता-माता का व्यवसाय- दैनिक मजदूरी
बीमारी- हृदय के वाल्व की खराबी

मुख्यमंत्री बाल हृदय उपचार योजना के अन्तर्गत एक लाख 65 हजार रूपयों के अनुदान की हकदार. इन्दौर शिविर में प्रकरण की समीक्षा, कागजात तैयार कराये गये. दो बार जिला कार्यालय में कागजात जमा हुए. मां-बाप ने अफसरों के कई चक्कर लगाए.

उत्तर मिला- अभी तुम्हारे पैसे आहरण होकर मेदांता अस्पताल में नहीं पहुंचे, पांच दिन बाद आना, फिर कहा दस दिन बाद आना. लड़की की हालत गंभीर. एक सरकारी बिचौलिये ने सलाह दी, पांच हजार का खर्चा आयेगा काम तुरन्त हो जायगा.

मेरे संज्ञान में मामला आया. मैंने लोकप्रिय कलेक्टर पी नरहरि को एसएमएस द्वारा हस्तक्षेप करके मदद की गुहार लगाई. तुरन्त सिविल सर्जन और नोड़ल अधिकारी डॉ जडिया का मेरे पास फोन आया.

मुझे कहा गया कि डॉ जडिया ने उनके पूरे दफ्तर में बेबी तनु की फाईल की खोज करवाई पर फाईल कहीं ननहीं मिली. दो बार दस्तावेज जमा करने के बाद प्रकरण लापता हो गया. शायद पांच हजार से भेंट-पूजा हो जाती तो फाईल गायब नहीं होती.

चलो कोई बात नहीं, मैंने बंजारा बच्ची के माता पिता को फिर से आफिस जाकर डॉ जडिया जी से मिलने की सलाह दी. लडकी की मां गई. उसने कागजात फिर से जमा कराए.

पुन: तीन दिनों की चुप्पी. आखिर मैंने जडिया जी से फोन पर चर्चा की तो मुझे कहा गया कि बच्ची के पिता का आधार कार्ड खरगोन जिले का है. उसे खरगौन के जिला कार्यालय में कागजात देना पड़ेंगे.

दफ्तर के कायदे, कानून, व्यवस्था सब अपनी जगह हैं, और एक होता है जिेसे मानवीय पहलू कहते है. वह अपनी जगह है. मरीज गंभीर है उसका जीवन खतरे में है.

आधार कार्ड कहीं का हो, वह है तो भारतवर्ष का ही. उसे पासपोर्ट की तरह माना जाता है. उसकी संवैधानिक मान्यता सम्पूर्ण भारत में एक समान यथोचित है. ऐसा तो नहीं कहा जा सकता कि आधार कार्ड चूंकि खरगोन जिले का है तो उसकी नागरिकता सिर्फ खरगोन जिले तक ही सीमित है. बच्ची के मॉ बाप मजदूरी करके अपना पेट भरने इंदौर में झौपड़ी बनाकर रहते हैं.

आधार कार्ड खरगोन का है उसे भारतीय क्यों नहीं माना जावेगा. अब क्या गंभीर हालत में अपनी बच्ची को लेकर मां-बाप खरगोन के दफ्तर के चक्कर काटें.

जब इन्दौर के कलेक्टर के हस्तक्षेप के बाद भी हमारी ब्यूरोक्रेसी के यह समुद्रीय कीड़े-मकोड़े नियम-कायदे में उलझाकर गरीबों का शोषण और मुख्यमन्त्री की कल्याणकारी योजनाओं का सत्यानाश करने में लगे हैं तो बताइये प्रजातन्त्र के जन मानस के राम को क्रोध क्यों नहीं आना चाहिये.

हाँ, अगर दाने-दाने को मोहताज गरीब मां-बाप आज इतने सक्षम होते कि पांच हजार रूपयों का निवाला उस सरकारी बिचौलिये रूपी सुरसा के मुंह में ठूंस देते तो फिर हाथों-हाथ बेबी तनु का प्रकरण बन जाता और अभी तक आपरेशन हो जाता.

पर अब तो समय आ गया है कि तुलसी दास जी को भी स्वर्ग से ई मेल करके कहना पड़ेगा-

विनय न मानत दफ्तरिया जड़, गए सत्तर बरस बीत,
बोलो जन-राम सकोप अब, भय बिनु होहि न प्रीति.

क्या मैं आपसे अपेक्षा करूं कि आप अपने स्तर पर इस कन्या का जीवन बचाने का कोई प्रयास कर सकते हैं? कम से कम आप राम की तरह क्रोधित होकर अपने वैचारिक तीरों को भंज कर भारतीय प्रजातन्त्र में व्याप्त इस भ्रष्टाचारी ब्यूरोक्रेसी के समुद्री दानव पर अपना आक्रोश तो जाहिर कर सकते हैं!

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