कितने भी गौर से देखो, फिरंगी चश्मे से भारत दिखाई देता ही नहीं

फिरंगी चश्मे से आप भारत को देख ही नहीं सकते… कितने भी करीब से देखो, कितने भी गौर से… कुछ दिखाई ही नहीं देगा…

नेटफ्लिक्स पर एक आर्ट-फार्ट टाइप मूवी देख रहा था – ‘तृष्णा’. फ़्रीदा पिंटो है, स्लमडॉग मिलियनायर वाली. किसी अँगरेज़ की बनाई फिल्म है, अनुराग कश्यप ने भी मदद की है.

बहुत मेहनत से बनाई गयी है. एक-एक सीन में कपड़े-लत्ते, बोलचाल, घर की बनावट और सजावट… सब कुछ बहुत ऑथेंटिक है.

ट्रैफिक, बस अड्डे और रेल स्टेशन, आड़े-तिरछे चलते हुए ऑटो-रिक्शा और उसमें लटकी सवारियां, बिजली के खंभे पर बैठे बन्दर से लेकर राजस्थान में नाचते मोर… हर चीज़ को बहुत ध्यान से देखा है बन्दे ने और कैमरे में कैप्चर किया है…

पर जो चीज नहीं पकड़ पाया है, वह है कहानी की आत्मा. राजस्थान के एक गाँव से निकल कर एक लड़की अपने प्रेमी के साथ भाग कर मुम्बई चली जाती है… वहाँ वह एक सबमिसिव दब्बू सी लड़की बन कर अपने प्रेमी की सेक्स स्लेव बन कर रह जाती है…

वर्षों चुपचाप शोषण सहती है, फिर एक दिन एकाएक इतनी मज़बूत हो जाती है कि चाकू लेकर उस बन्दे का खून कर देती है और भाग कर वापस गाँव आ जाती है. और दो दिन बाद फिर बिना किसी वजह के अपने आप को चाकू मार लेती है…

विदेशियों को भारत में जितने क्लीशे (Cliche – रूढ़ोक्ति, चलन से बाहर हुआ मुहावरा) दिखाई देते हैं, इसमें वो सब है.

मंदिर में सेक्स करती मूर्तियाँ, कामसूत्र, दबी-कुचली औरत और उसका शोषण और विद्रोह… ख़राब ट्रैफिक और बिजली के खंभे पर बन्दर तो है ही…

क्लीशे का यह हाल है कि एक दृश्य में इसका हीरो वाइन की बोतल सामने रखकर नाच देख रहा है, कामसूत्र मुद्रा में सेक्स कर रहा है और उसी दृश्य में उसके हाथ में उपनिषद भी है…

ऐसा नहीं है कि इसके निर्देशक ने भारत को देखने-जानने की कोशिश नहीं की है… बहुत कोशिश की है, बहुत गौर से देखा है…

पर इतना ही समझ में नहीं आता कि एम्पावरमेंट खोजती राजस्थान के एक गाँव की लड़की यूँ ही एक लड़के के साथ उठ कर मुम्बई नहीं चली जाएगी…

इतनी बेवकूफ नहीं है… ना ही गाँव से निकल कर आई पढ़ी-लिखी अंग्रेजी बोलती, नौकरी करती लड़की इतनी दब्बू होगी कि चुपचाप वर्षों तक सेक्स स्लेव बन कर रहेगी…

यह 50 शेड्स ऑफ़ ग्रे नहीं है बेट्टा… ना ही इतनी कमज़ोर कि एक दिन चाकू उठा कर सब कुछ ख़त्म कर लेगी….

फिल्मकार ने बहुत गौर से भारत को देखा है, पर उसे भारत के मध्यम वर्ग की महत्वाकांक्षी लड़की में समझदारी, आत्मसम्मान, जिजीविषा… कुछ भी दिखाई नहीं दिया है…

घर से भाग कर सेक्स करने की आज़ादी में ही एम्पावरमेंट खोजता रह गया है बेचारा… कितने भी गौर से देखो, फिरंगी चश्मे से भारत दिखाई देता ही नहीं…

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY