इस बार बिलकुल जाने मत देना यारों…

jane bhi do yaro making india ma jivan shaifaly

तब मैं बहुत छोटी थी, जब फिल्म ‘जाने भी दो यारों’ आई थी, तब मेरे लिए वो सिर्फ एक कॉमेडी फिल्म थी जिसमें सतीश शाह की लाश को लेकर नसीरुद्दीन शाह और रवि वासवानी पूरी फिल्म में परेशान होते रहते हैं. और पंकज कपूर जैसे बिल्डर्स और अखबार की भक्ति बर्वे जैसी सम्पादक के चंगुल में फंसकर अंत में उनका सत्य सामाजिक व्यवस्था की सूली चढ़ जाता है.

उन दिनों फिल्मों के संवाद और सिनेमैटोग्राफ़ी ही आधा काम कर जाते थे, उसके बाद बारी आती थी कलाकारों की अदायगी की और संगीत तो नेपथ्य की सजावट होता था, जिसकी ज़रूरत तब पड़ती थी, जब परदे पर कलाकार के संवाद बात अधूरी छोड़ जाते थे…

ऐसा ही एक गाना उस फिल्म में इस्तेमाल किया गया था…. हम होंगे कामयाब एक दिन … मन में है विश्वास पूरा है विश्वास…

गाना आज के समय में भी प्रासंगिक है…. फिल्म की कहानी भी कोई ज्यादा आगे पीछे करने की ज़रूरत नहीं है… आज भी पूंजीपति वही है जो अपने काले कारनामों को छुपाने के लिए आम आदमी को निशाना बनाता है… और मेन स्ट्रीम मीडिया (MSM) के बारे में तो आज का आम आदमी भी बहुत आसानी से राय बना सकता है… बहुत ज्यादा दिमाग लगाने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती…
अब बात की जाए उस लाश की जिसे दो युवा पूरी फिल्म में ढोते रहे…. आज भी वो लाश उतनी ही जीवंत है… जितनी उस फिल्म में थी… जिसके पीछे फिल्म के अंत में रामायण और महाभारत के कलाकार तक आपस में लड़ मर लेते हैं….

लेकिन फिल्म में अंत में पूंजीपति और अखबार नवीस (आज के सन्दर्भ में मेन स्ट्रीम मीडिया पढ़ा जाए) मिलकर उन युवाओं को ही गुनाहगार साबित कर सूली पर चढ़ा देते हैं और नेपथ्य में सत्यमेव जयते का लटका हुआ बोर्ड अनृतमेव जयते हो जाता है….

आज का आम आदमी और युवा उतना ही भोला है ज्यादा फर्क नहीं आया है… फर्क आया है तो सोशल मीडिया की क्रान्ति से… जहां आम आदमी शरीर पर आई खरोंच तक की सेल्फी निकालकर स्टेटस बनाकर दर्ज कर देता है… तो फिर देश की देह पर आ रही खरोंचों को कोई कैसे नज़र अंदाज़ कर सकता है.

सोशल मीडिया को अनसोशल मुद्दों का अड्डा बनाने वाले दुश्मनों को जब ये समझ आ गया कि सबसे ईज़ी टारगेट कौन है और कैसे उन्हें अपने चंगुल में फंसाया जा सकता है… तो उन्होंने उन कुछ गिने चुने युवाओं को बरगलाने की कोशिश की जो सामाजिक व्यवस्था की लाश को ढो रहे हैं…. और पूंजीपति और खबर की दुनिया (फिर इसे मेन स्ट्रीम मीडिया पढ़ें) के लोग षडयंत्र बनाकर इन युवाओं को सूली पर लटकाने की तैयारी करने लगे….

और आप कहते हैं क्यों नहीं पकड़ती सरकार डंडे के जोर पर इन युवाओं को…
नहीं… अब सामाजिक व्यवस्था केवल चंद लोगों के हाथ लगी लाश नहीं रह गयी है… वो सोशल मीडिया की वो आग बन गयी है जिसमें जिसने भी गलत इरादे से हाथ डाला तो उसका हाथ ही नहीं जलेगा… उसकी पूरी शख्सियत जला दी जाएगी…

फिर से उन्हीं नौजवानों को सूली पर नहीं चढ़ाया जाएगा.. इस बार नहीं जीतेंगे वो पूंजीपति और खबरनवीस…

रोहित तो गया पर इस बार इन हार्दिक पटेलों, कन्हैयाओं और उमर खालिदों को नहीं मरने देंगे… इस बार इन कठपुतलियों को नचानेवाले हाथों तक पहुंचना है…

डायलॉग ज़रूर फ़िल्मी है कि क़ानून के हाथ बहुत लम्बे होते हैं… लेकिन सड़कों पर ट्रैफिक संभालती या चाय-पान की दुकान पर मुफ्तखोरी करती हुई पुलिस और अदालतों में बरसों से लटक रहे केसों को देखकर ये मत समझ लेना कि हमारी पुलिस सच में बिलकुल फ़िल्मी है…

अभी क़ानून का वास्तविक रूप आपने देखा कहाँ है… अभी तो सिर्फ उन बच्चों की सुरक्षित घर वापसी करना है जिन्हें निशाना बनाया गया है… क़ानून के हाथ वाकई बहुत लम्बे हो गए हैं साहब… इस बार बिलकुल जाने मत देना यारों….

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