पुरोहितजी कहिन : सनातनियों! अपने समाज के शिव को पहचानिए जो आज भी नीलकंठ है

।।ओम नमः शिवाय।।

आज महाशिवरात्रि है, सभी के लिए सनातन की व्यवस्था के अनुसार इस पर्व के अपने-अपने अर्थ हैं और अपनी-अपनी श्रद्धा. इस महापर्व के आयोजन के सभी के अपने-अपने ढंग हैं और अपने-अपने रंग.

मेरे लिए यह त्योहार शिवत्व की अनुभूति कराने वाला है.

तो आखिर क्या है शिवत्व?

कौन है शिव?

“अथातो ब्रह्म जिज्ञासा”

यही तो वह क्षमता है जो प्रेरित करती है जानिए शिव को, जानिये ब्रह्म को.

आज बात शिव की, शिव जो कभी तमोगुण के अधिष्ठाता है, कभी मंगल करण, कभी अघोरी, चिता भस्म से अपने अलौकिक देह का सौन्दर्यीकरण करने वाले, कभी-कभी दिगंबर, वस्त्रहीन विचरण करने वाले, कभी-कभी परम भोक्ता, विष्णु के मोहिनी अवतार से रमण को उत्सुक और कभी-कभी संपूर्ण जगत को आदर्श दाम्पत्य का आशीर्वाद देने वाले आदर्श दंपति.

हरि अनंत हरि कथा अनंता. उनके अनंत प्रकार है अभिव्यक्त होने के, उनके आराध्य श्री राम है और श्री राम के आराध्य स्वयं वे हैं! यही सनातन है, लेकिन शायद हमारा ज्ञान एवं अहंकार हमें इस सत्य को स्वीकार नहीं करने देता.

आज मैं शिवत्व की अभिव्यक्ति के ऐसे अनछुए, अनदेखे प्रकटीकरण के वर्णन का प्रयास कर रहा हूं. वैसे तो त्रिगुणों से निर्मित आपके शरीर में शिव स्वयं स्वत: तमोगुण के रूप में विद्यमान हैं और जब-जब आपके शरीर में अपने शत्रु के, धर्म के शत्रु के संहार का संकल्प दृढ़ हो जाता है तो यही शिवत्व आपको शत्रुओं के संहार का बल प्रदान करता है. वस्तुतः आप केवल निमित्त होते है, संकल्प तो सदा शिव का ही होता है.

आज का पर्व आपके अंदर उपस्थित सदाशिव को जानने, पहचानने और आराधना करने का है. सर्वप्रथम तो अपने शरीर में स्थित शिव को पहचानिए और आवश्यकता पड़ने पर उनकी अभिव्यक्ति का उपाय कीजिए. जब-जब असुर शक्तियां नियंत्रणहीन हो जाएं तब-तब अपने शरीर से साक्षात शिव को प्रकट कीजिए.

अब बात शिव की एक और अभिव्यक्ति की. आप के धर्म सनातन के शिव को जानते हैं आप???

नहीं!

जी हां। तमोगुण के अधिष्ठाता, शूद्रों के महादेव, ध्यान से देखिए अपने शूद्र भाइयों को कि जब-जब सनातन पर संकट आया है कैसे आशुतोष सदाशिव वीरभद्र रूप में उनसे प्रकट हुए है.

कैसे उन्होंने सनातन की रक्षा के लिए, अपने आराध्य ‘वैष्णव’ की रक्षा के लिए अपना भी लहू बहाया है और शत्रुओं का भी. आज महाशिवरात्रि के इस पर्व पर अपने समाज के शिव प्रतीकों अर्थात शूद्रों का सम्मान एवं आराधना कीजिए.

जानिए कि जब-जब शत्रु आपकी तरफ बढ़ते हैं वे ही भैरव रूप में दीवार बनकर खड़े हो जाते हैं आपकी रक्षार्थ.

हे ब्राह्मणों! तुम भी समझ लो कि तुम्हारे उस छः डोरा सूत की रक्षा उन्हीं मैले-कुचैले हरिजनों, खटीकों, चर्मकारों, भीलों, मीणाओं व अन्य शूद्रों ने भी की है, जिन्हें देखकर तुम नाक-मुंह सिकोड़ लेते हो.

शिव के मंदिर में शिव पर चिताभस्म तुम्हे अलौकिक लगती है पर अपने धर्म के शिव प्रतीक शूद्रों के आभूषणों से घृणा करते हो! पहचानो पाखंड को.

‘यदि वे मात्र सनातन के किसी नियम से बद्ध होकर ऐसा कर रहे हैं तो यह तुम्हारी गलतफहमी है, सत्य यह है कि वे शिव बन कर तुम्हारी रक्षा कर रहे हैं.’

वे तुम्हें अपना आराध्य मानते हैं तो अब तुम्हारी बारी है उनके स्मरण की, सम्मान की, अनुराग की, प्रेम की. परशुराम के वंशजों! स्मरण रहे, स्वयं परशुराम भी उन्ही शिव से शक्ति प्राप्त हैं।

राजपूतों! क्षत्रियों! तुम भी याद रखो तुम्हारे कुल गौरव, भीष्म के गुरु के गुरु वही महादेव है.

महाराणा प्रताप ने अपने दैविक शिव का पूजन एकलिंगनाथ के रुप में किया और पार्थिव शिव को ढूंढने वन-वन भटके, तब उन्हें भील रूप में राणा पूंजा मिले जिनमें उन्हें अपने पार्थिव शिव की अनुभूति हुई और देखते ही देखते भीलों की उस सेना ने आपके परम शत्रु अकबर को हल्दी घाटी के युद्ध में दिन में तारे दिखा दिए थे.

तो हे सनातनियों! अपने समाज के शिव को पहचानिए जो आज भी नीलकंठ है, जो आज भी आपकी घृणा, द्वेष और छुआछुत से उत्पन्न अपमान के विष को अपने कंठ में धारण करता है. जो आज भी नि:स्वार्थ रूप से सज्ज है आपकी रक्षा के लिए, मरने और मारने के लिए.

तो आप भी स्वयं शिव बनिये और अपने समाज के शिव को पहचानिये. मात्र बड़े-बड़े सांस्कृतिक श्लोकों एवं स्तुतियों से शिव प्रसन्न नहीं होंगे.

जब भी हरि के साथ हर का संयोग हो जाएगा और हर सनातनी ‘हरिहर’ हो जाएगा तो निश्चित जानिए कि शत्रु अपने प्राणों की भीख मांगते नजर आएंगे. विश्व विजय तो कुछ भी नहीं है.

इसीलिए परम वैष्णव भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि

“रुद्राणां शंकरचस्मि”

मै रुद्रों में शिव हूँ.

तो हे वैष्णवों, शैव्यों एवं शाक्तों बोलिए,

हर हर हर हर हर हर हर हर महादेव

सभी को महाशिवरात्रि के महापर्व की अनंत शुभकामनाएं.

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