उत्तर प्रदेश का जातिवादी जाल और उसमें फंसा वोट नुमा खरगोश

बहुत पहले मैंने एक एक धार्मिक कथा पढ़ी थी. कथा कुछ यूँ थी कि- एक गांव में एक युवक रहता था. युवक अपने जीविकोपार्जन हेतु प्रतिदिन रात को जंगल में तीन-चार जाल बांध कर आता और सुबह तक किसी न किसी जाल में एक दो खरहा( खरगोश) जरूर फंस जाते. युवक सुबह-सुबह जंगल पहुंच कर सभी जालों को खोलता और उसमें फंसे हुए खरगोशों को शहर में जा कर बेच आता और उस आमदनी से वह अपने परिवार का भरण-पोषण करता.

प्रतिदिन जाल बांधना और फिर उस में फंसे एक-दो खरगोशों का बेचना उस युवक की नियमित दिनचर्चा थी. एक दिन युवक बीमार पड़ा और तेज ज्वर के कारण वह जंगल में जाल बांधने नहीं जा सका. जाल उसके बरामदे में ही रखा रह गया. युवक जब सुबह उठा तो उसे बरामदे से एक खरगोश की आवाज़ सुनाई दी. अरे ! यह क्या? जाल में एक खरगोश फंसा पड़ा था..युवक अपने भाग्य पर खुश हुआ और वह खरगोश को बेचने शहर निकल गया…

अगले दिन ‘ज्वर और आलस्य’ से फिर जंगल न जा सका लेकिन यह क्या ? इस सुबह भी एक काला खरगोश उसके जाल में फंसा मिला. युवक के लिए दूसरे दिन भी खरगोश का घर में आकर फंसना, कौतूहल का विषय बन गया.

युवक अब तीसरे दिन से प्रयोग करने लगा. उसने जाल को कमरे में रखकर चिटकनी चढ़ा दी लेकिन खरगोश उस दिन भी जाल में फंसा मिला. घोर आश्चर्य कि कमरे में घुसने की कोई जगह न होते हुए भी खरगोश प्रवेश कैसे किया.

अरे ! बिना कर्म के फल मिलने लगा. अब इससे सुन्दर कौन सी बात हो सकती है. अगले दिन से वह युवक, जाल को कभी खपरैल पर बांधता तो कभी डेहरी में बंद कर देता तो कभी पेड़ पर बांध आता लेकिन सुबह तक उसे एक खरगोश जरूर मिलता. कितने आनन्द की बात कि घर बैठे शिकार जाल में फंस जाए. युवक अब अपने कर्म से हटकर पूरी तरह भाग्य के भरोसे पर हो गया. वह रोज़ दुर्गम और नये-नये जगह तलाशता और जाल बांध कर खरगोश फंसाता.

एक दिन रात को अचानक उसके समक्ष प्रभु प्रकट हुए और बोल- वत्स ! तुम्हें पता नहीं कि तुम क्या कर रहे हो मुझे तुम्हें एक खरगोश देने के लिये बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ता है.

वत्स ! तुम्हारे प्रारब्ध में नित्य दिन एक खरगोश लिखा हुआ है जिसे पूर्ण करने के लिये मुझे बहुत संकट का सामना करना पड़ता है. रोज एक खरगोश से वह कराना पड़ता है जो उसके सामर्थ्य में नहीं है. पहले तुम कर्म करते थे और तुम्हारे कर्म के आधार पर तुम्हें एक-दो खरगोश अतिरिक्त भी मिल जाता है लेकिन अब तुम कर्म को त्याग कर केवल भाग्य भरोसे बैठे हो और तुम्हें यह दंभ हो गया है कि मैं कुछ करूँ या न करूँ मुझे एक खरगोश तो मिलना तय हैं.

युवक प्रभु के समक्ष दंभी मुस्कान बिखरते हुए बोला- प्रभु जब मुझे पता लग चुका है कि मैं कर्म करूँ या ना करूँ, मुझे एक खरगोश मिलना ही है तो बेकार की परिश्रम क्यों करूँ भला !

सच में उत्तर-प्रदेश की राजनीति भी कुछ ऐसी ही है. नेताओं को खूब मालूम है कि उन्हें वोट जाति के नाम पर मिलेंगे तो काहे करें कर्म! खरगोश तो जाल ढूंढ कर चला आयेगा खुद फंसने. नेता अपनी मेहनत क्यूँ बेकार करें. उनके हिस्से के खरगोश खपरैल पर चढ़ कर फंस जायेंगे. डेहरी में चले आयेंगे, पेड़ पर चढ़ जायेंगे उनको तो केवल जातिवादी जाल बांधना है और मजे से खर्राटा भरना है.

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