न फैलाएं ऐसी कहानियां जिन पर भरोसा कर मिले मौत या धर्मांतरण की लाचारी

स्पष्टवादी शत्रु से ज़्यादा घातक विश्वासघाती मित्र होता है, क्योंकि शत्रु की हरकतों से हम भलीभाँति अवगत होते हैं लेकिन विश्वासघाती मित्र से हम अनभिज्ञ होते हैं.

ठीक उसी प्रकार धार्मिक आधार पर मनमुटाव करने वालों से ज़्यादा घातक होते हैं धार्मिक आधार पर सामाजिक सौहार्द्र बनाने के नाम पर झूठी कहानियां गढ़कर समाज को सच्चाई से विमुख करने वाले.

झूठ की बुनियाद पर बनाया हुआ भविष्य मात्र निष्क्रिय ही नहीं होता बहुत घातक भी होता है. आज़ादी के समय से ही वामपंथियों ने भारतीय इतिहास और साहित्य को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया जिसका खामियाजा आज पूरे भारतवर्ष को उठाना पड़ रहा है.

कभी आपने सोचा है कि आख़िर क्यों आज देश के कुछ युवा JNU जैसे परिसर में बैठकर देश को तोड़ने के तरीक़े खोजते रहते हैं?

इसके लिए हमारी बुनियादी शिक्षा जिम्मेदार है. हमें कभी वो पढ़ाया ही नहीं गया जिससे हमारे अंदर देशभक्ति प्रफ़ुल्लित होती और देश पर सर्वस्व न्यौछावर करने की प्रेरणा आती और ना ही हमें कभी वो पढ़ाया गया जिसके चलते हम अपनी संस्कृति पर गर्व कर सकते.

हमारे वामपंथी साहित्यकारों ने हमारी संस्कृति को हमारे समक्ष ऐसे प्रस्तुत किया जैसे हम सिर्फ ज़ाहिल और अंधविश्वासी हों जिनका ज्ञानशून्य हो!

पिछले साहित्यकारों ने तैमूर, अलाउदीन, अकबर और औरंगजेब जैसे आक्रांताओं को परमस्नेही, धर्मप्रिय और प्यार की मूर्ति घोषित किया था.

जिसका खामियाजा भारतभूमि ने किस रूप में चुकाया है वह सर्व विदित है.

अब सोशल मीडिया के आने से समय बदल रहा है. रँगे सियारों की कलई भी उतर रही है और सच्चाई भी धीरे-धीरे सामने आ रही है.

इसके साथ ही लेक़िन सोशल मीडिया पर हज़ारों की संख्या में कुकुरमुत्ते की तरह झूठे कहानीकार उग आए हैं जो भारत भूमि की ज़मीनी स्तर की जानकारी नहीं रखते और सामाजिक सौहार्द्र के नाम पर हज़ारों झूठी कहानियां लिख देते हैं.

कई तथाकथित लेखक कहते हैं कि उनका एक मुस्लिम मित्र है जिसके घर में सभी लोग आपस में संस्कृत में बात करते हैं और प्रतिदिन शाम को श्रीराम जी की आरती करते हैं उस परिवार को उर्दू से लगाव नही है, वो भारत भूमि के प्रति तन मन धन से समर्पित हैं.

ऐसी ही कई झूठी कहानियां सोशल मीडिया में चलती रहती हैं. ऐसे तथाकथित लेखकों को जमीनी स्तर की जानकारी नही होती और वो मुस्लिमों की मानसिकता से पूर्णतः अनभिज्ञ होते हैं. ऐसे तथाकथित लेखकों का लक्ष्य अपने आपको साहित्यकार घोषित करना होता है.

वो ये नहीं सोचते कि वो क्या बो रहे हैं, उनकी इस झूठी करतूत का देश को कितना खामियाजा भुगतना पड़ेगा.

आप आज घर में बैठकर सामाजिक सौहार्द्र बनाने के लिए लैपटॉप, मोबाइल पर मुस्लिमों को परम स्नेही और उदार दिल वाले मसीहा बनाते हुए जो कहानी लिखते हो, यथार्थ में वो इसके पूर्णतः उलट हैं! चाहें तो आप कश्मीर से कलकत्ता और कैराना से कोचीन तक कहीं भी देख लो आपको हज़ारों उदाहरण मिल जायेंगे.

मेरी एक जानकार प्रोफ़ेसर साहिबा हैं जो पिछले वर्ष तक किसी हिंदी पत्रिका और पेपर के लिए कहानियाँ लिखती थीं. उन्होंने भी अपने जीवन में कई कहानियां लिखीं थी जिसमें वो मात्र सामाजिक तानाबाना मज़बूत करने के लिए मुस्लिमों को बहुत ही उदार और नेकदिल प्रस्तुत करती थी.

उनका एक मात्र बेटा था जिसकी नज़रों में भी प्रोफेसर साहिबा ने मुस्लिमों को रहमदिल, मोहब्बत प्रिय और इंसाफ पसंद घोषित किया हुआ था.

वो लड़का पिछले तीन साल पहले बँगाल की किसी यूनिवर्सिटी में बी. टेक. करने के लिए गया. जानकारी मिली कि उनके बेटे को वहीं बंगाल में किसी ख़ातून से इश्क़ हो गया.

इश्क़ अपने अंतिम चरण में था. बेटे ने ख़ातून को प्रपोज़ किया लेकिन ख़ातून के घरवालों को अपनी लड़की का गैर मुस्लिम लड़के के साथ इश्क़ मंज़ूर नहीं था.

छः महीने पहले पता चला कि प्रोफेसर साहिबा ग्वालियर छोड़कर कहीं दूर चली गई हैं. फिर पता चला कि उनका बेटा किसी ने मार दिया है, जिसकी ख़बर लेने के लिए वो बंगाल गयी हैं, लेकिन तब से मुझे उनकी कोई ख़बर नही मिली.

यह घटना मैं मात्र इसलिये लिख रहा हूँ कि आजकल के झूठे कहानीकार उन प्रोफ़ेसर साहिबा की तरह ही मुस्लिमों के नेकदिली और मोहब्बत की झूठी कहानियाँ लिखते हैं जिसे पढ़कर उस प्रोफ़ेसर के लड़के की तरह कुछ युवा/ युवतियां असलियत से विमुख होकर किसी ख़ातून/ मोमिन की मोहब्बत में पड़ जाते हैं जिसका खामियाजा या तो धर्म परिवर्तन करके देना पड़ता है या अपनी जान देकर.

आप कहानी लिखिए, जो भारत भूमि के हित में हो और नौजवानों को सच्चाई से अवगत कराये, ना कि आप की झूठी कहानियों के जंजाल में फँसकर कोई लड़का/ लड़की धर्म परिवर्तन को मजबूर हो या मौत के घाट पर उतार दिया जाए.

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