पुरोहितजी कहिन : बात गधे की

Fox and the Donkey purohitji kahin making india modi akhilesh

एक समय की बात है, एक जंगल की एक कॉलोनी में एक गधा रहता था. वह बहुत परिश्रम करता था. उसके पड़ोसी लोमड़ी, सियार, गीदड़ और लकड़बग्घे को गधे की मेहनत से प्राप्त समृद्धि एवं सुख से अत्यंत ईर्ष्या थी. वे सभी अलग-अलग प्रकार के छल षडयंत्रो से गधे को बरगला कर उसका धन हड़प लेते थे.

गधा फिर से खूब मेहनत करता. धीरे-धीरे वह काफी समृद्ध हो गया. अब उसके पड़ोसियों की हालत खराब, करें तो क्या करें? उन्होंने मिलकर एक गठबंधन बनाया और धूर्त सियार ने सबसे कहा कि क्यों ना गधे का सब कुछ एक साथ हड़प लिया जाए? सभी ने उत्सुकता जाहिर की, कि यह कैसे होगा? टेढ़ी नाक वाले सियार ने यह उस पर छोड़ देने को कहा.

टेढ़ी नाक वाले सियार ने दूसरे दिन गधे से कहा कि भाई छोटे बड़े दाँव हम आप अक्सर खेलते रहते हैं, आओ अब एक बड़ा दाँव खेला जाए.

गधे ने पूछा,”क्या दाँव है बताइये?

सियार बोला, “भाई एक निश्चित समय पर मैं जो कुछ अपने मन में सोचूंगा तुम्हें वह बताना होगा यदि तुमने बता दिया तो हम सबका अर्थात पूरे गठबंधन का सब कुछ तुम्हारा और अगर नहीं बता पाए या गलत बताया तो तुम्हारा सब कुछ हमारा.”

गधे ने कुछ विचार किया और फिर वह तैयार हो गया.

गधा बोला, “भाई यह मामला पूरी जिंदगी भर के धन का है अतः कोई बेईमानी ना हो इसलिए यह सारा प्रसंग स्वयं राजा शेर (जो दिन में 20 घंटे सोता है ) के सामने हो.”

धूर्त नकटेडवा सियार और उसकी मंडली तैयार हो गई. उन्हें तो पता था कि वे उसे हरा ही देंगे.

तो साहब राजा को सूचना भिजवाई गई.

राजा ने व्यवस्था दी और इस अजीबोगरीब प्रसंग को देखने के लिए सभी उपस्थित हो गए. राजा के मन में गधे को लेकर सहानुभूति थी कि बेचारा गधा अपना सब कुछ हार जाएगा.

शर्त के मुताबिक सियार ने कहा कि, “भाई अब मैं जो सोचूँगा वह तुम्हें बताना है अगर तुमने सच बता दिया जिसका कि निर्धारण मै करूंगा तो हमारा सब कुछ तुम्हारा वर्ना तुम्हारा सब कुछ हमारा. गधे ने सहमति मैं सिर हिला दिया.

सियार ने सोचने का नाटक कर के गधे से पूछा ,”बताओ मैंने क्या सोचा, बताओ मेरे मन में क्या है?

गधे ने राजा को संबोधित करते हुए कहा महाराज मुझे अत्यंत ही पीड़ा का अनुभव हो रहा है, कितने दुःख की बात है जो शुभ इन्होंने सोचा वह बता देने की वजह से उन्हें अपना सब कुछ हारना पड़ेगा लेकिन फिर भी मैं धन्य हूं कि उन्होंने ऐसी बात सोची. महाराज उन्होंने यह सोचा है कि आप एवं महारानी जिनको कोई संतान नहीं है, ईश्वर आपको वह संतान प्रदान करें, आप को संतान लाभ हो ऐसी शुभकामना उन्होंने की है.

सियार और उसकी ठग मंडली के चेहरे उतर गए. जनता वाह वाह करने लगे और सिंह प्रसन्न हो गया. अब सियार ऐसा फंसा कि यदि ना कह दे तो शेर मार डालें और हां कर दे तो सब कुछ हार जाए. अब मजबूरी में क्या करे? अखिरकार जान के लालच में उसे गधे की बात माननी पड़ी और इस प्रकार से उस गधे को जिसे मूर्ख समझा गया उसने अपने लुटेरे ठगों से सब कुछ वापस प्राप्त कर लिया.

भाई मेरी जातक कथाये पढ़ने वालों को अच्छे से समझ में आ गया होगा कि,

वह गधा कौन है

नकटेडवा सियार कौन
ठगमंडली कौन
राजा सिंह कौन
और सिंह की वह संतान अर्थात “विकास” कौन?

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