मणिपुर : इरोम शर्मीला की साइकिल, BJP और केजरीवाल!

दो तीन दिन से मीडिया में इरोम शर्मीला की एक फोटो इन्टरनेट और अखबारों में घूम रही है जिसमें वे सायकिल से नामांकन करने जा रही हैं. अभी यही कोई दो दिन पहले मणिपुर की इरोम शोर्मिला जी ने मणिपुर में होने वाले विधान सभा चुनावों के लिए नामांकन किया.

गौरतलब है कि मणिपुर में AFSPA कानून को हटाने की मांग करते हुए इरोम शर्मीला जी ने 16 सालों तक अनशन किया. जोकि मानवाधिकार कानूनों की मांग के लिए सबसे लम्बा विश्व रिकार्ड है.

इरोम शोर्मिला जी की पार्टी पीपुल्स रिसर्जेंस एंड जस्टिस एलायंस मणिपुर के विधान सभा चुनावों में पहली बार भाग लेने जा रही है.  इरोम शोर्मिला की PRJA इस बार सिर्फ 10 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. और स्वयं इरोम वर्तमान मुख्मंत्री ओकराम इबोबी के खिलाफ thubal विधान सभा से लड़ेंगी.

मणिपुर की वर्तमान राजनैतिक स्थिति का जायजा कुछ इस प्रकार है – मणिपुर में विधान सभा की 60 सीटें है और लोकसभा की 2 सीटें हैं. मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी की अगुवाई में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस यहाँ की रूलिंग पार्टी है और अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस मुख्य विपक्ष पार्टी है. नजमा हेपतुल्ला जी यहाँ की महामहिम राज्यपाल हैं.

राज्य की 60 सीटों पर चुनाव दो चरणों में होंगे. पहले चरण का मतदान 4 मार्च और दूसरे चरण का मतदान 8 मार्च को होगा. वोटों की गिनती 11 मार्च को होगी. ऐसे में महज दस सीटों पर दावेदारी पेश करने वाली इरोम की पार्टी चुनाव में सिर्फ अपनी ताकत आजमाने के लिए ही लड़ती दिखाई दे रही है. उस पर भी देखने वाली बात ये होगी की उनकी पार्टी उन दस सीटों में से कितनी सीटें हासिल करती है.

मणिपुर के तीन मुख्य ट्राइबल समुदाय – मेटी, कुकी और नागा हैं. नागा समुदाय ज्यादातर पहाड़ी क्षेत्रों में प्रवास करता है. मेटी और कुकी पिछले कई साल से अपनी दुकानों, जमीनों और नागा समुदाय के घुसपैठ के खिलाफ मोर्चाबंदी पर हैं. वही नागा समुदाय भी मणिपुर के हिल एरिया को अपना रिहायशी क्षेत्र बताते हुए इस पर किसी और समुदाय के अतिक्रमण के खिलाफ नजर आता है.

पिछले दिनों मणिपुर के मुख्यमंत्री ने राज्य के हिल एरिया को इंडस्ट्रियल जोन बनाने का निर्णय लिया. तब से नागा समुदाय में एक खास प्रकार का असंतोष व्याप्त है और वे प्रदर्शन पर उतर आये हैं. पिछले करीब डेढ़ सौ दिनों से मणिपुर और नागालैंड के बीच मारकाट और इन दोनों राज्यों को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों को बंद कर उन पर प्रदर्शन और आगजनी जैसी घटनाओं के पीछे का ये एक बड़ा कारण है.

इस प्रदर्शन के कारण दोनों राज्यों के बीच आवागमन ठप्प है, जिसके कारण आम जनता को बेतहाशा मंहगाई से जूझना पड़ रहा है. लोग पेट्रोल 200 -250 रूपये प्रति लीटर की दर से खरीदने को विवश हैं वही गैस की कीमत अनधिकारिक रूप से 1500 -2000 रूपये प्रति सिलेंडर तक बिक रही है.

नार्थईस्ट में घुसपैठ एक बड़ा मुद्दा होता है. असम चुनावों में बंगलादेशी घुसपैठ ने चुनावी माहौल को भारतीय बनाम बंगलादेशी सपोर्टर पर लाकर खड़ा कर दिया था. यहाँ रहने वाले ट्राइबल समुदाय अपनी संस्कृति, विरासत, सभ्यता आदि को लेकर इतने संवेदनशील होते हैं कि उन्हें अपने क्षेत्र में किसी अन्य समुदाय का आगमन अतिक्रमण समान लगता है.

इसलिए यहाँ के प्रत्येक राज्य के विभिन्न ट्राइब्स में सामुदायिक संघर्ष भी होते रहते हैं. अखबारों में अक्सर हर तीसरे चौथे महीने किसी न किसी राज्य के किसी न किसी समुदाय द्वारा कभी विशेष दर्जा तो कभी इनर लाइन परमिट जैसी विशेष मांगों के लिए प्रदर्शन होते रहते हैं.

ऐसे माहौल में नागा हिल एरिया को इंडस्ट्रियल ज़ोन घोषित करने के बाद नागा समुदाय द्वारा विरोध प्रदर्शन के कारण मणिपुर के मेटी और कुकी समुदाय का सीधा समर्थन ओकराम इबोबी के पक्ष में जाता दिखता है. हाल ही में केंद्र सरकार ने कांग्रेस की मणिपुर में इबोबी सरकार पर “sebogation” का आरोप लगाया था.

केंद्र सरकार का आरोप है कि मणिपुर की कांग्रेस सरकार इस ज्वलंत मुद्दे को चुनावों तक ज़िंदा रखना चाहती है ताकि उसे राज्य की मुख्य दो समुदायों का एकमुश्त समर्थन हासिल हो सके. हालाकि मणिपुर की मौजूदा स्थिति को देखते हुए इस आरोप का खंडन तो बिलकुल नहीं किया जा सकता क्योंकि केंद्र सरकार ने जब भी नागा समुदाय और मणिपुर सरकार के साथ बातचीत की पहल की तो यहाँ की कांग्रेस सरकार ने उसे किसी भी तरह से बस टालने की ही कोशिश की है.

ऐसे में जलते हुए मणिपुर में जब इरोम शर्मिला सिर्फ दस सीटों पर चुनाव लड़ते हुए एक वहां की बेहद विवादस्पद AFSPA कानून के मुद्दे पर इबोबी सरकार को घेरती हैं तो एक बड़े समुदाय का येन केन प्रकारेंण समर्थन हासिल करने वाली इबोबी सरकार के विपक्षियों को सत्ता में आने की एक उम्मीद नजर आती है.

ऊपर से इरोम शर्मीला जब वहां के मुख्यमंत्री के खिलाफ चुनावी नामांकन करती हैं तो दिल्ली के मुख्यमंत्री को अगर उनमें अपना अक्स नजर आना कोई बड़ी बात नहीं. एक दिन पहले ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरिवाल और आम आदमी पार्टी के संसद भगवंत मान ने इरोम शर्मीला की पार्टी को आर्थिक सहायता के रूप में एक बड़ी राशि दी. इरोम के बढ़ते हुए कद में देश की कई बड़ी पार्टियों को अपना भविष्य नजर आता है. इरोम को कालांतर में तृणमूल कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ से भी अपनी पार्टी में शामिल होने के प्रस्ताव दिए हैं.

हालांकि किसी भी पार्टी को आर्थिक सहायता देने या लेने का अधिकार है. वर्तमान में देश की कई बड़ी पार्टियों ने चंदे के बल पर ही अपना राजनैतिक सफ़र शुरू किया है. इरोम की पार्टी PRJA भी उसी रस्ते पर चलते हुए वेबसाइट के माध्यम से चंदे इकठ्ठा कर रही है.

ऐसे में अरविन्द केजरीवाल द्वारा इरोम की पार्टी को पचास हज़ार रूपये और उनकी पार्टी के सांसद भगवंत मान द्वारा एक महीने का वेतन देने की आलोचना करना नैतिकता से परे है.

ये बात और है कि अरविंद केजरीवाल की नियत जगजाहिर है और इरोम भी अरविन्द केजरिवाल के ही रास्ते पर चलती प्रतीत होती है जिसमें मुख्यमंत्री के खिलाफ चुनाव लड़ना – सायकिल द्वारा यात्रा – वेबसाइट के द्वारा चंदे इकठ्ठा करना आदि साफ़ नजर आते हैं.

मणिपुर के राजनैतिक परिदृश्य, उसमें इरोम का भविष्य आदि पर चर्चा करने के साथ ही एक सवाल और उठता है की इस पूरे प्रकरण में भाजपा कहाँ नजर आती है? जब कि बीजेपी नार्थईस्ट में एक सनसनी की तरह उभरी है, ऐसे में मणिपुर की कांग्रेस सरकार को अकेले चुनौती देने वाली इरोम को भाजपा का खुला समर्थन क्यों नहीं हासिल हो पाता?

बंगलादेशी घुसपैठ पर साफ़ नजरिया रखने वाली बीजेपी को नार्थईस्ट में हाथों हाथ लिया जा रहा है. असम और अरुणाचल प्रदेश में बीजेपी ने नजीरे पेश कर दी हैं.

ऐसे में इरोम शर्मीला को समर्थन देने से बीजेपी क्या इसलिए पीछे हटती है क्योंकि इरोम को अप्रत्यक्ष रूप से अरविन्द केजरीवाल का समर्थन प्राप्त है? बीजेपी मणिपुर की कांग्रेस सरकार को सेबोगेसन, अन्तरसामुदायिक संघर्ष को बढ़ावा देने के अलावा घुसपैठ, गरीबी, आदि मुद्दों पर घेर सकती थी.

ऐसा माना जाता है की इसके पीछे दो बाते हैं –एक तो केंद्र सरकार का NACN (IM) समझौता और दूसरा – एकमात्र नागा पीपल फ्रंट के साथ बीजेपी के गठजोड़ की संभावना. हालांकि बीजेपी और नागा पीपल फ्रंट (NPF) के बीच चुनाव पूर्व किसी भी गठजोड़ की घोषणा नहीं हुई है.

लेकिन यहाँ के लोंगों का ऐसा मानना है कि नागा लोंगों के साथ केंद्र सरकार का centre- NACN(IM) समझौता होने के कारण भाजपा चाहती तो नागा लोंगो पर एक दवाब बनाते हुए मणिपुर की परेशानियां दूर कर सकती थी.

मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी ने स्वयं ये बात इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में कही थी. जानी मानी पोलिटिकल एनालिस्ट पूजा चाओबा “इम्फाल फ्री प्रेस” में लिखती हैं –“बीजेपी और नागा पीपल फ्रंट के चुनाव पूर्व गठजोड़ न करने का एक बड़ा कारण है – दोनों अपने अपने चुनावी क्षेत्र के वोट बैंक को बनाए रखना चाहते हैं. NPF जहाँ हिल एरिया में अपने नागा वोटों को कवर करेगी वहीँ बीजेपी की नजर मेटी समुदाय के वोटों पर रहेगी”.

कुल मिलाकर मणिपुर में बीजेपी को NPF का करीबी माना जाता है. इसी मुद्दे को लेकर बीजेपी के एक विधायक कुम्चम जोयकिशन पार्टी से इस्तीफ़ा देकर कांग्रेस ज्वाइन कर लिया. मणिपुर में मेटी और कुकी का नागा के साथ संघर्ष और बीजेपी की नागा पीपल फ्रंट के साथ करीबियत को मुद्दा बनाते हुए जहाँ कांग्रेस इसका फायदा उठाना चाहेगी.

वहीं बीजेपी अपने मेटी और NPF अपने नागा वोटों की उम्मीद में अपने अपने क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद में होंगे.

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