मनुष्य का मस्तिष्क : विज्ञान, दर्शन और प्रकृति का जादू

Ma Jivan Shaifaly human brain nervous system Making india

जब हम नवजात शिशु के रूप में जन्म लेते हैं तब हमारे मस्तिष्क में 10000 करोड़ नर्व कनेक्शन होते हैं. जी हां, छोटे से मस्तिष्क में 10000 करोड़ तंत्रिका वायर (neurons) के कनेक्शन मस्तिष्क के विभिन्न हिस्सों को एक जाल के रूप में जोड़े हुए होते हैं. यह नर्व कनेक्शन विभिन्न जानकारियों के सन्देश वाहक होते हैं जो कि मस्तिष्क के अलग अलग हिस्सों में प्रोसेस हो कर मनुष्य को सुनने, दिखने, याद, दर्द वगैरह का अहसास कराते हैं.

लेकिन प्रकृति का जादू यहाँ से और भी मज़ेदार हो जाता है.

वह यह कि नवजात के छोटे से मस्तिष्क में इन 10000 कऱोड नर्व की ज़गह तो होती है लेकिन इस वक़्त यह मस्तिष्क एक खाली हार्ड डिस्क की तरह होता है जिसमें विभिन्न सॉफ्ट वेयर, जानकारियां, एप्प्स, चित्र, वीडियो आने वाले समय में स्टोर होने हैं.

ज़ादू यह है प्रकृति का कि सीमित ज़गह की वजह से उपरोक्त 10000 करोड़ नर्व ट्रैक्ट्स में से 5000 नर्व ट्रैक्ट्स प्रकृति डिलीट कर देगी अगले कुछ माह में, वे नर्व ट्रैक्ट जिनका वह नवजात उपयोग नहीं कर रहा होगा. जी हां ठीक आपके मोबाइल फोन की मेमोरी की तरह जब हम व्यर्थ के एप्प को डिलीट कर देते हैं उपयोग में न आने पर जिससे नए उपयोगी एप्प स्टोर किये जा सकें.

साथ ही नए ट्रैक्ट्स के बनने की प्रक्रिया शुरुआती तीन वर्ष में चलती रहती है. जो कि मस्तिष्क की स्टोरेज कैपेसिटी में तेज़ वृद्धि की मदद से होती है. तेज़ वृद्धि का अर्थ यह कि नवजात शिशु के मस्तिष्क का वजन पहले जन्म दिन तक दो गुना और तीन वर्ष की उम्र तक तीन गुना हो जायेगा. मनुष्य के मस्तिष्क के कुल विकास का 90 प्रतिशत पहले 2 वर्ष में विकास हो जायेगा. सिर्फ बाकी का 10 प्रतिशत विकास अगले 30 वर्षों में होगा और इसके बाद ह्वास होना शुरू होगा.

साथ ही इन शुरुआती तीन वर्षों में 100000000 करोड़ नए नर्व ट्रैक्ट बनेंगे और 5000 करोड़ बिना काम के ट्रैक्ट डिलीट हो जाएंगे.

यह इनफार्मेशन देने वाले नर्व ट्रैक्ट के डिलीट होने वाली बात एक प्रयोग के द्वारा समझी जा सकती है (हालाँकि यह प्रयोग नहीं करना है)
वह यह कि सामान्य आँखों के एक शिशु को कुछ माह तक आँखों में पट्टी बांध कर रखा जाये, फिर कुछ माह बाद खोला जाये तो शिशु को आँखों के पूरी तरह सामान्य होने के बावजूद नहीं दिखेगा क्योंकि आँखों से मस्तिष्क के पिछले हिस्से (occipit, जहाँ देखने का अहसास होता है) को जानकारी पंहुचाने वाले ट्रैक्ट को प्रकृति अनुपयोगी समझ डिलीट कर देगी. और ऐसा नवजात शिशु के मोतियाबिंद को लंबे समय तक ऑपरेट न कराने वाले शिशुओं के माता पिता को देखने मिल भी जाता है.

एक खाली CD जिस तरह भविष्य में एक ISIS के क़त्ल दिखाते वीडियो की CD भी बन सकती है और हरिओम शरण के भजन की CD भी, कोई एजुकेशनल CD या मनोरंजक CD भी. ठीक उसी तरह इन ट्रैक्ट्स का इस्तेमाल इस खाली मस्तिष्क को किसी भी तरह की जानकारी स्टोर करवा विभिन्न तरह की धारणाओं वाले व्यक्तित्व के निर्माण में किया जा सकता है.

नर्स की ग़लती से यदि एक कट्टर मुस्लिम परिवार का बच्चा किसी कट्टर क्रिश्चन परिवार को मिल जाये तो वो क्राइस्ट का कट्टर भक्त होगा किसी हिन्दू परिवार को मिल जाये तो कट्टर हिन्दू होगा. और इसका उल्टा करने पर उल्टा भी हो जायेगा.

मतलब यह कि प्रकृति ने मस्तिष्क के इन ट्रैक्ट्स में किसी धार्मिक समूह की कोडिंग या ठप्पे नहीं लगाए. इसलिए विभिन्न धार्मिक समूह का सम्बन्ध आध्यात्म से न होकर आधिपत्य से ज़्यादा है. आध्यात्म प्रकृति और एकांत व्यक्ति के बीच की कड़ी है न कि किसी समूह की.

उपरोक्त जानकारियों के आधार पर आप समझ सकते हैं कि अनुपयोगी न्यूरॉन के ख़त्म होने और नए के बनने की तेज़ प्रक्रिया (700 नए न्यूरॉन कनेक्शन प्रति सेकंड) शुरुआती 2 वर्षों में सबसे ज़्यादा होती है. अतः इस उम्र में मिला प्यार, देख रेख, पोषण, आयरन (नर्व के लिए ज़रूरी मिनरल), खेल, आवाज़, लोरी, संगीत, सुरक्षा, स्पर्श, माँ का दूध इत्यादि का मनुष्य के व्यक्तित्व विकास में कितना महत्त्व है. माँ का दूध नए न्यूरॉन की जानकारी वहन करने की स्पीड को तेज़ करने वाली बाहरी परत माइलिन के निर्माण को 30 प्रतिशत तक ज़्यादा कर देता है.

इस खाली डिस्क में यह हम पर है कि हम क्या भरते हैं. प्रकृति ने हम सबको इस अज़ब खेल में अकेला भेजा है समूह में नहीं.

दो बच्चे एक से माहौल में अलग अलग कैसे हो जाते हैं फिर? आप यही पूछना चाह रहे हैं न?

तो उत्तर है नर्व ट्रैक्ट्स की संख्या और गुणवत्ता माता पिता के विभिन्न जेनेटिक कॉम्बिनेशन की वजह से अलग अलग होगी.

अर्थात हार्ड डिस्क की ram, बनावट, स्थायित्व अलग अलग होने से हर व्यक्ति अलग ही होगा. उसकी कोई प्रतिलिपी कभी भी अस्तित्व में नहीं होगी. लेकिन ये 2 वर्ष उसे बेहतर और सफल या दुष्ट और असफल बनाने में बेहद अहम होंगे. उसके हार्ड डिस्क और वायर्स का सही या गलत उपयोग करने पर.

आप शुरू में प्यार न करोगे शिशु को फिर प्रेम का ट्रैक्ट प्रकृति डिलीट कर देगी. नफरत नहीं करोगे तो नफरत का. बस उतना ही बचेगा जो कि survival instinct के लिए ज़रूरी हो.

शरुआती 5 वर्षों में बने रह गए नर्व ट्रैक्ट और उनसे मिली जानकारी इसी वजह से आजीवन व्यक्तित्व का हिस्सा बन ज़ातीं है और वे धारणाएं फिर हर तरह के तथ्य और तर्कों और प्रमाणों के प्रति resistant होती है फिर वे कितनी भी अतार्किक ही क्यों न हों. दृढ, न मिटने वाली धारणाएं. infact कभी वे टूटें तो, उन धारणाओं का टूटना मस्तिष्क को दर्द का पीड़ा का अवसाद का अहसास देता है. ऐसा इन ट्रैक्ट्स की मजबूती की वजह से होता है.

दुनिया बेहतर बनानी हो तो इन शुरुआती मस्तिष्क पर ध्यान देना होगा.

क्या आपको पता था बिना आपके प्रयास के आपका मस्तिष्क इन सारी प्रक्रियाओं से गुज़रा है. हम तो 100000000 करोड़ की गिनती भी न कर पाएंगे और प्रकृति ने इतने ट्रैक्ट बिल्कुल सही जगह पर जोड़ दिए और कुछ करोड़ उखाड़ दिए.

उन सभी माँओं को और उन सभी पिताओं, नानी, दादी, दादा, नाना को इस दुनिया को बेहतर और सुन्दर बनाने के लिए धन्यवाद जिन्होंने अभी अभी अपने शिशु को चूमा या घुटनों पर झूला झुलाया.

आपका
डॉ अव्यक्त

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