Sri M -3 : स्वातंत्र्य, वेदांती शिक्षाओं की आत्मा है

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Sri M

Sri M को जब उनके गुरु बाबाजी ने उपनिषद की शिक्षा देना प्रारम्भ किया तो उनके मन में भी वही सवाल था जो हम सबके मन में हैं-

“बाबाजी, उपनिषद क्या बहुत कठिन नहीं है? क्या वे केवल सन्यासियों और प्रकाण्ड पंडितों के लिए नहीं है?”

(श्री एम को जो लोग अभी अभी जान पाए हैं, जिन्होंने इस सीरीज़ के पहले के लेख नहीं पढ़े हैं उनको एक जानकारी फिर से देना चाहूंगी कि श्री एम का वास्तविक नाम मुमताज़ अली है. इसके बावजूद वो अपने गुरु से उपनिषद पर चर्चा क्यों कर रहे हैं इसके लिए आपको सबसे पहले लेख से उनके बारे में पढ़ना होगा.)

खैर बाबाजी का जो जवाब था, उस जवाब को इस समय संदर्भित करना मेरे लिए ज़रूरी हो गया है जब हम वर्ण व्यवस्था और जात पात के बारे में फैलाई भ्रांतियों में अपने मूल सनातन धर्म को खो रहे हैं. बाबाजी बताते हैं-

“पुजारियों और पोंगा पंडितों द्वारा ऐसी भावना जनता में फैलाई गयी है क्योंकि उन्हें भय है कि उपनिषदों की सीधी-सीधी शिक्षाएं लोगों को तर्क संगत  रूप से सोचने के लिए प्रेरित करेंगी और उनके द्वारा फैलाए गए तथा लोकप्रिय किए गए ढपोरशंखी अंधविश्वासों से उन्हें दूर ले जाएँगी.

उन्हें डर था कि अगर लोग अपने आप सोचने लगे तो उनके चंगुल से बाहर निकल जाएंगे. अत: चालाक पुजारियों ने, जिनका राजा और प्रजा दोनों पर ही, उनके और भगवान् के बीच अपनी मध्यस्थता स्थापित करने के कारण, अधिकार था, लोगों द्वारा उपनिषदों के अध्ययन में बाधाएं उत्पन्न की. इस महान सभ्यता की अवनति का एक कारण शुद्ध ज्ञान की यह उपेक्षा है. – कि उपनिषद केवल सन्यासियों के लिए हैं”. यह मिथक भी पुजारियों का अपना आविष्कार था. सरसरी निगाह से उपनिषद देखने भर से तुम्हें पता लग जाएगा कि लगभग सभी उपनिषद ऐसे महान ऋषियों द्वारा पढ़ाये जाते थे जो गृहस्थ थे और जिनके बच्चे भी थे. उनमें से कुछ जैसे जनक, राजा थे तथा महान ऋषि विश्वामित्र, जिन्होंने हमें गायत्री मंत्र दिया, ऋषि होने से पहले क्षत्रिय थे.

“हमें भूल नहीं जाना चाहिए कि प्रख्यात ऋषि व्यास जिन्होंने वेदों का संचयन किया और ब्रह्मसूत्र की रचना की, एक मछुआरिन के बेटे थे. योग्यता महत्वपूर्ण है न कि किसी जाति या गोत्र में जन्म. अगर तुम समझते हो कि तुम्हारी एक आत्मा है जो अशरीरी है, तो क्या उसके माँ-बाप हैं?

महान ऋषि उन दिनों अपनी संतान को दूसरे ऋषियों के पास उपनिषदों का अध्ययन करने भेजते थे. वह प्रबुद्ध युग था- उपनिषद काल- समस्त सच्चे साधकों के लिए अध्ययन के समान अवसरों वाला, चाहे वे किसी भी जाति या सम्प्रदाय के हों.

बाबाजी ने उपनिषदों के अध्ययन के लिए विद्यार्थी में जो आवश्यक गुण बताए वो हैं- तीक्ष्ण, पूर्वग्रह – रहित दिमाग, पर्याप्त बौद्धिक शक्ति और स्वस्थ शरीर. इसलिए योगासनों का अभ्यास, एक सही और पोषक खुराक और एक तरह की शांतचित्तता आवश्यक है.

श्री एम का सवाल था- लेकिन बाबाजी, उपयुक्त गुरु भी आवश्यक है?

(अपनी आध्यात्मिक यात्रा के दौरान आ रही समस्याओं के लिए जब स्वामी ध्यान विनय का मुंह तकती निरीह सी खड़ी हो जाती हूँ या श्री एम की तरफ से कोई संकेत नहीं पाती हूँ तो ध्यान विनय यही कहते हैं आपकी निर्भरता को ख़त्म करना ही हमारा उद्देश्य है. इसके लिए भी मेहनत तो आपको ही करना होगी. आप उस स्तर तक तो पहुँच जाओ जहां आपको किसी की आवश्यकता न रह जाये.)

मेरे और श्री एम के सवाल के उत्तर में बाबाजी कहते हैं- गलत गुरु से गुरु का न होना बेहतर है. गुरु का काम है शिष्य का मार्ग-दर्शन करना न कि उसे सदा के लिए अपने ऊपर निर्भर बनाना. एक आध्यात्मिक गुरु को विद्यार्थी का मार्ग-दर्शन कर उसे उस हद तक पहुंचा देना चाहिए जहाँ वह खुद अपने पैरों पर खड़ा हो सके. स्वातंत्र्य वेदांती शिक्षाओं की आत्मा है.

“स्वातंत्र्य वेदांती शिक्षाओं की आत्मा है”……… लेकिन फिर स्वामी ध्यान विनय कहते हैं…. यूं आप अगली सांस भी खुद लेने के लिए स्वतन्त्र नहीं है… लौकिक जगत की स्वतंत्रता की परिभाषा, उस स्वतंत्रता को अनुभव करने का मेरा दृष्टिकोण, और फिर होशपूर्वक सारे अनुभवों को ग्रहण करते हुए ये जान पाना कि आप वास्तव में उतने ही स्वतन्त्र हो जैसे अपनी धुरी पर घुमती हुई पृथ्वी किसी भी तरह कहीं से भी बंधी हुई न होने के बावजूद सूर्य से बंधी हुई उसके चारों ओर चक्कर लगाती है… हम जिस पृथ्वी पर रहते हैं जब वो ही स्वतन्त्र नहीं तो हम खुद को किन शब्दों में स्वतन्त्र कहें!

तब मैंने ये जाना कि हम ब्रह्माण्ड की प्रयोगशाला के एक उपकरण मात्र हैं, जिसे किसी विशेष उद्देश्य के लिए लाया गया है…

एक मित्र से बात करते हुए ध्यान विनय एक दिन कह रहे थे, कि मेरी तरह मोदीजी को भी इस बात का ज्ञान है कि ब्रह्माण्ड की विशेष योजना के तहत उन्हें किसी विशेष उद्देश्य के लिए प्रधानमंत्री बनाया गया है. और ये उनकी हर बात, हाव भाव, उठने, बैठने और चलने के तरीके से ही पता चलता है… ऐसा वास्तव में है या नहीं ये एक अलग विषय है, लेकिन ऐसा भाव आ जाना ही आपको विशेष बना जाता है और वो विशेष ऊर्जा आप पर काम करने लगती है…

ये संवाद सीधे मुझसे नहीं हो रहा था, लेकिन वो जानते हैं कि मैं एकलव्य की तरह वैसे ही उनको देखेते, बोलते, सुनते हुए वो सबकुछ सीख रही हूँ जो वो मोदी जी के लिए कहते हैं… ध्यान विनय की हर बात, हाव भाव, उठने, बैठने और चलने के तरीके से ही पता चलता है… कि ब्रह्माण्ड की विशेष योजना के तहत उन्हें किसी विशेष उद्देश्य के लिए बनाया गया है.

और मेरा उनके साथ होना उस उद्देश्य को कार्यान्वित करने के लिए…

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