अतिथि देवो भव : भारतीय भोजन परंपरा आत्मा है, भोजन यदि देह है तो

उम्र के 18 वर्ष तक भोजन का मतलब मेरे लिए सिर्फ भारतीय भोजन था. खाना मतलब दाल, भात, रोटी, तरकारी, चटनी, अचार, पापड़ इत्यादि था.

विशिष्ट भोजन यानि पूरी, पराठा, खीर, हलुवा. नाश्ते में समोसा, चाट, पकौड़ी, मिठाई यानि लड्डू, पेड़ा, बर्फी, गुलाबजामुन, रबड़ी, मलाई और कुल्फी, जीवन इससे परम संतुष्ट.

फिर मेडिकल कॉलेज में हॉस्टल की मेस में भी कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ. बस एक छोले भठूरे से अवश्य परिचय और मैत्री हो गयी.

चायनीज़ भोजन से पहली बार चेन्नई में मेरे एक विभाग के मित्र ने परिचय कराया जब हम वहां ट्रेनिंग में गए थे. खाना वही नूडल, फ्राइड राइस, वेज मनचूरियन वगैरह था.

खाने के बाद मुझे लगा कि हम लोग वृथा चीन के प्रति शत्रु भाव रखते हैं. चीन शत्रु देश नहीं है और मैं भारत-चीन के मैत्रीपूर्ण संबंधो का पक्षधर हो गया.

इतालियन भोजन यानि पिज़्ज़ा के साथ ऐसा नहीं हुआ. कलकत्ता में पहली बार पिज़्ज़ा खाया और इसलिए खाया कि और डिश मंगाने के पैसे नहीं थे. और रेस्तरां वाला पैसे लौटाता नहीं, मजबूरी में खाना पड़ा था और खाने के तुरंत बाद पिज़्ज़ा कभी नहीं खाने का निर्णय लिया गया.

विवाह के बाद स्थिति में गुणात्मक परिवर्तन हुआ. मेरी पत्नी भोजन के मामले में संकुचित राष्ट्रीयता की बजाय अंतरराष्ट्रीयता की पक्षधर थी. शादी के तुरंत बाद उन्होंने मेरा परिचय कॉन्टिनेंटल फ़ूड से कराया जिसकी एक डिश Vej-Augratin मुझे अच्छी लगी थी.

मेरी पत्नी बॉम्बे आकर प्रसन्न हुई और एक दिन स्वयं पिज़्ज़ा खाने के बाद मेरे लिए भी लेकर आई. मेरे ये बताने पर कि मैं पिज़्ज़ा नहीं खाता वे थोड़ी निराश हुई और फिर उसी निराशा में उस पिज़्ज़ा को भी स्वयं खा लिया था.

खैर पिज़्ज़ा आता रहा, और जब हम लोग बनारस जाएं तो लद कर बनारस भी जाता रहा. धीरे-धीरे मेरा विरोध भी थोड़ा कम हुआ और मैं भी एक दो स्लाइस खाने लगा.

क्रान्तिकारी परिवर्तन तब हुआ जब मुंबई में एक रेस्तरां ने बॉम्बे मसाला पिज़्ज़ा introduce किया. इस पिज़्ज़ा की देह तो इतालियन थी लेकिन आत्मा भारतीय. मैं इसका भक्त हो गया और नियम से इसे खाने लगा.

मेरे पुत्र के जन्म के बाद भोजन में काफी परिवर्तन हुआ, पुत्र बचपन से विद्रोही और क्रांतिकारी विचारधारा का था और भोजन सम्बन्धी समस्त मान्यताओं को उसने जड़ से उखाड़ फेंका.

अब घर में पिज़्ज़ा/ पास्ता/ बरितो/ फजीता/ अमेरिकन/ मेक्सिकन/ कॉन्टिनेंटल और जाने क्या-क्या विदेशी भोजन का प्रवेश हो गया. मैं अब घर में अल्पमत में था और बहुमत पत्नी और बेटे का था.

बेटा तरह-तरह के खाने की फरमाइश करता और उसकी माँ उसे पूरा. मेरी पत्नी इससे विदेशी भोजन बनाने में प्रवीण हो गयी और इसका ज्ञान मुझे तब हुआ, जब मैंने उसे ओबेरॉय होटल के शेफ को मरिनारा सॉस (एक तरह की टमाटर की विदेशी चटनी) के बारे में टिप देते सुना.

बेटा सुबह ब्रेकफास्ट में पैनकेक और वैफल खाने लगा. पैन केक तो बन जाता लेकिन वैफल कैसे बने, निदान विदेश से वैफल मेकिंग मशीन आयात हुई.

अब घर में वैफल बनता और वैफल का पूरा टिप्पंच होता यानि मैपल सिरप, हनी, बटर,आइस क्रीम, चॉकलेट सॉस. लेकिन मैंने पैन केक और वैफल खा कर अपना बनारसी धर्म नहीं भ्रष्ट किया.

जिस दिन वैफल बनता, उस दिन मै 200 ग्राम जलेबी मंगा कर दूध-जलेबी खा लेता. वैफल पर कैलोरी बर्बाद करना मुझे कतई गवारा नहीं था.

पत्नी और बेटे के दबाव में मैं विदेशी भोजन खाने तो लगा लेकिन आत्मा से मैं अभी भी देसी हूँ. दाल, चावल, सब्जी का सादा भोजन सर्वश्रेष्ठ लगता है. नाश्ते में पूरी, सब्जी, जलेबी और स्वीट में गुलाब जामुन का कोई जवाब नहीं, ऐसा अभी भी मानता हूँ.

कटलेट पर समोसा, आइसक्रीम पर कुल्फी, कोल्ड ड्रिंक पर लस्सी और चॉकलेट पर बर्फी को वरीयता देता हूँ.

आज से 15 वर्ष पहले अपने एक पत्रकार मित्र के सौजन्य से, मुझे PM हाउस में जाने का अवसर मिला था. किसी पुस्तक का विमोचन समारोह था, उसके बाद हाई टी.

वैसे तो मैंने बहुत हाई टी देखी है, लेकिन वो अनोखी थी. मेनू में था सिर्फ समोसा, गुलाब जामुन, और चाय/ कॉफ़ी और साथ में था अटल जी का आतिथ्य.

मैं किसी से बात कर रहा था, अटल जी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और बड़े प्रेम से पूछा था “आपने कुछ लिया नहीं.”

मैं अभिभूत था, देश का प्रधानमंत्री मुझसे ये पूछ रहा था, लेकिन मैं शायद गलत कह रहा हूँ. वे उस समय प्रधानमंत्री नहीं थे, वे एक घर के बुजुर्ग थे, जो अपने छोटे-बड़े हर अतिथि का ख्याल रख रहे थे.

अतिथि देवो भव की परम्परा का निर्वाह करते हुए एक घर के बुजुर्ग. आखिर ये परंपरा भी तो हमारे भोजन का ही एक अभिन्न अंग है.

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