कैसे पहले की सरकारों ने सेना के हाथ बांध रखे थे, बताती है ‘द गाज़ी अटैक’

‘द गाज़ी अटैक’ देखी. यह कई मामलों में विशेष है. शायद पहली बार सिर्फ एक घटना, वो भी युद्ध की, पर पूरी तरह आधारित कोई फिल्म बनी है.

फिल्म में बॉलीवुड की नचनिया गैंग के कोई भी लटके-झटके नहीं हैं. ना कोई गाना, ना कोई नाच, ना कोई जबरन ठूंसा हुआ प्रेम मुहब्बत ना ही कोई सेक्स सीन!

ना ही फिल्म के हीरो को जेम्स बांड बनाया गया, जो अमूमन अकेले ही दो-चार-पांच सौ को निपटाया करता है, वो भी अपने हाथो से!

डायरेक्टर, कहानीकार और डायलॉग लेखक ने नेवी की तकनीकी जानकारी पर अच्छा काम किया है. छायांकन भी वास्तविकता के करीब है.

और इसलिए आम दर्शक सब-मरीन में दो-ढाई घंटे गुजार आता है.

इस फिल्म की कही कोई चर्चा नहीं है, ना ही कोई समीक्षक इस पर अपनी बिकी हुई कलम से कहीं किसी अखबार का कोई पन्ना काला करता नजर आया.

कैसे आएगा… क्योंकि इसमें ना तो तैमूर के पिताजी हैं, ना ही असहिष्णु गिरोह! चूंकि मीडिया का हाइप नहीं है तो लगता है कि किसी ए, बी, सी या डी कंपनी का पैसा भी नहीं लगा है, और शायद तभी कोई सेक्युलर हिडन एजेंडा भी नहीं है.

इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा भी नहीं गया है, ना ही फिल्म रिलीज़ से पहले कोई कंट्रोवर्सी पैदा की गयी… बल्कि सच को सीधे-सीधे परोसा गया है.

फिल्म अपने सन्देश को सरलता से अपने दर्शक तक पहुँचाती नजर आती है. तभी तो राष्ट्रवाद किसी चाशनी में लपेट कर नहीं बल्कि अपने शुद्ध रूप में उभरा है.

और निर्देशक यह बताने में सफल रहा है कि कैसे पहले की सरकारों ने सेना के हाथ बाँध रखे थे, जिसका नुकसान हमारे वीर जवान उठाते रहे हैं. फिर भी अपनी जान पर खेल कर उन्होंने कैसे देश और हमारी रक्षा की.

इस फिल्म ने यह एक बार फिर प्रमाणित किया कि एक्टिंग करना पेड मीडिया के किसी लाड़ले चॉकलेटी हीरो की बपौती नहीं और ना ही परफेक्शन पर किसी का एकतरफा कॉपीराइट है.

अब जब इतना कुछ है तो हम दर्शकों का भी तो कोई फर्ज बनता है… इसलिए हम भी लंबे समय के बाद कोई फिल्म देखने गए.

और यही नहीं चूंकि एक मित्र ने फिल्म की तारीफ़ पहले ही कर दी थी, इसलिए 200 रूपये की जगह 600 रु के टिकट पर देख कर आये.

और क्यों ना देखें! प्रेस्टिट्यूट अगर दो कौड़ी की फिल्मों को सैकड़ों करोड़ की बता सकता है तो एक आम दर्शक होने के नाते हमारा भी तो कुछ फर्ज बनता है.

महंगी टिकट पर दिए गए अतिरिक्त पैसे मेरे आक्रोश की कीमत नहीं बल्कि देश में फल-फूल रहे समाज-विरोधी, संस्कारहीन, देशद्रोही, अधर्मी लोगों के खिलाफ अपने विरोध का सांकेतिक प्रदर्शन है.

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