कुछ और इशारे करती यूपी के गांवों की ज़मीन की महक

एक गड़रिया परिवार की झोपड़ी, परंपरागत ग्रामीण घर, सजावट में कमल उकेरे हुए

कल देर रात और आज दोपहर बाद तक विधानसभा क्षेत्र खलीलाबाद (संत कबीर नगर) के ग्रामीण इलाकों में रहा. जमीन का असली चुनावी मिजाज़ आपको तब पता चलता जब प्रत्याशी से अलग होकर क्षेत्र का जायजा लीजिये.

श्री राजेंद्र पाल

तस्वीर में दिख रहे आप हैं राजेंद्र पाल जी जो 19 साल बसपा में रहे, वामसेफ काडर रहे, संगठन में पदों पर भी रहे…. आज भाजपा में हैं. मैंने इन्हें साथ लिया कल, बाकी इलाकों के साथ दो गांवों तक पहुंचने में.

पाल जी गड़रिया समाज के अति पिछड़े वर्ग से आते हैं, जुझारू हैं और जातीय संगठन में गजब की पकड़ दिखी इनमें.

इस सीट पर इस समाज के लगभग 7 हजार वोट हैं जो परंपरागत तौर पर अभी तक बसपा के पाले में जाते रहे हैं लेकिन आज ज़मीन की महक कुछ और इशारे कर रही है.

गांव में पहुँचने पर साफ संकेत मिला की बदलाव का मन पहले ही बना हुआ है.

गांव के यादव ग्राम प्रधान की स्वीकारोक्ति : साहब 50 परसेंट हमार बिरादरी टूटत बाs…!

कारण? सपा हारत बाs…!

2014 लोकसभा की तर्ज पर जातीय समीकरण ध्वस्त हो रहे हैं और दलित, जनजाति, पिछड़ा, अति पिछड़ा समाज उसी तेवर के साथ वोट करने के तत्पर है.

जमीन दो सच्चाई बोल रही है :

– सैफई के जातीय पहचान को छोड़ कर ओबीसी वर्ग के बाकी लोग सपा से दूर हैं.

– मायावती के अपने मूल वोट बैंक से अति पिछड़ों और एक अच्छी संख्या में दलितों ने भी बसपा से दूरी का रुख किया है. बसपा के ‘मज़हबी’ प्रेम से वो धोखे में महसूस कर रहा है.

लगातार बढ़ रहे मतदान प्रतिशत के इस औसतन 5% बढ़त का 90% हिस्सा भाजपा का है. पहली के बार के वोटर बने युवाओं का वोट 2 सौ फीसदी भाजपा का है. अब तक न निकलते वोटर भी निकल कर इस बढ़त में शामिल हैं.

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