अरि शोणित से युक्त धरा जब अपना रूप संवारती, तुलजा और जीजा प्रसन्न हो शिवा शिवा पुकारती

shivaji jayanti narendra-modi

यवनी शूलों से छलनी धरती त्राहि-त्राहि जब करने लगती,
बहे रक्त से रजस्वला हो हल्दीघाटी सी लगने लगती.

ऋतुकाल तब संभव होता आस नई सी जगने लगती,
सनातन पीड़क कालरात्रि नवकीरणो से छँटने लगती.

भरहरण कर निर्भय करती धरा अग्नि सम भभकने लगती,
तुलजा जब भी दिखने लगती मृत आँखे भी चमकने लगती.

भगवा बांधे शिवसेना जब दुर्गम रण में विकट उतरती,
गिरते तन भी तन जाते विजय ध्वनि तब निकट गुजरती.

हिंदुआ सूर्य, मराठा वैभव, दक्कन दीर्घा नरपति,
शिवाजी राजे छत्रपति शिवाजी राजे छत्रपति..

उष्ण लहू में बहता भगवा और हाथो में बाघनखि,
रिपुदमन घुड आरूढ़ होकर चले विजय को सारथि,

सिंह सी शक्ति बाज सी दृष्टि अरि का विचलन नापती,
तांडव करती अदिक् तलवारे रुधिर यवनो का चाटती.

प्राप्त पलायन को होकर के जब शत्रु सेनाएं भागती,
फहरा उठता भगवा किलो पर मंगल दुंदुभी बाजती.

अरि शोणित से युक्त धरा जब अपना रूप संवारती,
तुलजा और जीजा प्रसन्न हो शिवा शिवा पुकारती.

जिसके पुण्य स्मरण करती सदा स्वयं माँ भारती,
शिवाजी राजे छत्रपति, शिवाजी राजे छत्रपति..

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY