जन्मोत्सव : यदि आपने पाठक साहब को नहीं पढ़ा, तो सबकुछ पढ़कर भी कुछ नहीं पढ़ा

बचपन से ही किताबें पढ़ने का शौकीन रहा हूँ. शायद कक्षा तीसरी-चौथी की बात होगी जब मैं 25 पैसे किराये पर कॉमिक्स लाकर अपने दोस्तों को पढ़-पढ़कर सुनाता था जो कि छठी कक्षा तक पहुँचते-पहुँचते राजन-इकबाल की पाकेट बुक्स तक पहुँच चुका था.

अपने बड़े भाई-बहनों की हिंदी की किताबों से कहानियां पढ़ना, अखबार से ढूँढ़ कर कहानियां पढ़ना मेरे पसंदीदा शगल थे. लेकिन मेरे पढ़ने के शौक को एक मंज़िल दी खुद मेरे पिताजी ने जो कि हर रोज़ रात को दुकान से वापिस आने के बाद उपन्यास पढ़ते थे और उसे वहीँ तकिये के नीचे पेज मोड़ कर रख देते थे.

दिन में स्कूल से आते ही उन्ही नॉवेल को मैं पढ़ने लगा. उस दौरान मैंने रानू, वेद प्रकाश शर्मा, केशव पंडित और सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के कई उपन्यास पढ़े. मेरी माँ मेरे उपन्यास पढ़ने पर बहुत गुस्सा करती थी (जो कि आज भी ज़ारी है. हर बार जलाने की धमकी भी ज़ारी होती थी, लेकिन कभी उठा कर भी ना फेंका है) और पिताजी से इस बात के लिए पिटवाने की धमकी देती थी. मेरे पिताजी जो कि लगभग हर रोज ही प्रसाद वितरण करते थे और खेलने को ग्राउंड में भी कम ही जाने देते थे कभी मुझे पीटना तो दूर नॉवेल पढ़ने के लिए डांटते भी नहीं थे.

खैर यहाँ से पैदा हुआ मेरा शौक धीरे-धीरे मेरे लिए नशा बन गया. इस दौरान मैंने प्रेमचंद, प्रसाद व स्कूल की लाइब्रेरी में उपलब्ध अन्य हिंदी साहित्य भी पढ़ा. परंतु आखिर में मन आ कर रमा महान जासूसी उपन्यास लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के नॉवेल्स में ही.

इनको पढ़कर मैं स्वयं को बहुत आनंदित महसूस करता था. यहीं से मैंने ज़िन्दगी को पढ़ना शुरू किया. तब तक उम्र का वो पड़ाव भी आ चुका था कि मेरे लाये नॉवेल पिताजी भी पढ़ने लगे थे. पाठक साहब के लेखन में मात्र जासूसी कथानक ही नहीं था अपितु जीवन का हर रंग उसमे सम्माहित था. वे अपने पाठक को जिंदगी में एक ईमानदार, गरीब का हितैषी, देशभक्त, सच्चाई का साथी, जुल्म-ज़ालिम की खिलाफत, मुखर वक्त बनने का संदेश देते हैं.

उनके लिखे में कहीं भी सुपर नेचुरल, अंध-विश्वास, या कोरी-कल्पना का समावेश ना पाया है. जासूसी, क्राइम व मर्डर-मिस्ट्री का लेखक होने के बावजूद भी उन्होंने समाज की ऐसी कोई समस्या-बुराई या जहालत नहीं है जिसके खिलाफ ना लिखा हो. 300 के लगभग नॉवेल लिखे हैं उन्होंने जिनका वर्णन तो यहाँ संभव नहीं है. आज जिंदगी में खुद को लिखने-पढ़ने और बोलने में जितना पाता हूँ उसमें सबसे बड़ा योगदान उन्हीं की पुस्तकों का है.

लुगदी साहित्य के रूप में शुरुआत करके आज वो हार्पर जैसे विश्व-स्तरीय पब्लिकेशन द्वारा छापे जाते हैं. उनकी पुस्तकें डेली-हंट व अमेज़न किंडल जैसी वेबसाइट पर ई-बुक के रूप में उपलब्ध हैं. हर बुक-शॉप, रेलवे, मेट्रो व ऑनलाइन स्टोर पर आज वो उपलब्ध है.

व्यक्तिगत रूप से बहुत ही फ़ाज़िल, विनम्र, हंसमुख, मिलनसार व बहुमुखी प्रतिभा के धनी पाठक साहब एक स्मार्ट-टॉक से भरपूर ज़िंदादिल इंसान हैं, जिनकी सोहबत का आनंद आपका खादिम भी कई बार उठा चुका है और खुद को बहुत खुश-किस्मत मानता है कि उसे ज़िन्दगी में ऐसा अवसर मिला.

आज पाठक साहब की ही देन है कि फेसबुक पर ही मिले उनके कुछ शैदाई आज जिगरी दोस्त हैं. जिनके साथ मिलना-बैठना… घूमना-फिरना आम सी बात तो गयी है.

आप सोच रहें होंगे कि आज इतनी बात हमें क्यों बताई जा रही है. तो बंधुओं बात यह है कि आज हमारे अज़ीज़ पाठक साहब का जन्मदिन है और मित्रों से साझा करने का उद्देश्य बस यही है कि एक विद्वान ने कहा है कि
“यदि आप किताबें नहीं पढ़ते हैं तो आप अनपढ़ हैं.”
और Its never too late कि सोच के साथ आज से ही पढ़ना शुरू कीजिए साथ ही अपने बच्चों में भी पढ़ने की आदत को विकसित कीजिए.

और मेरी राय मानिए या विनती शुरुआत के तौर पर आदरणीय सुरेंदर मोहन पाठक जी को पढ़ियेगा. जो कि पाठक साहब को जन्मदिन का सबसे सुंदर तोहफा तो होगा ही आपके जीवन का भी एक नया अनुभव होगा जिसके लिए यक़ीनन आप मेरा बाद में धन्यवाद करना चाहेंगे पर इसी कथन के साथ .. No sorry, No thanks between friends के साथ आप उसे त्याग दीजियेगा.

अंत में इस शेर के शायर से माफ़ी के साथ अर्ज़ है…..

“जिसमें शामिल ना हो तेरी किताबें,
वो ज़िन्दगी भी किसी जहन्नुम से कम नहीं.”

जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएं पाठक साहब. बस यही दुआ है कि आप यूँ ही दशकों तक लिखते रहें, हम पढ़ते रहें….. आप बोलते रहें, हम सुनते रहें… आप को हमारी भी उम्र लग जाए. लब ज्यू पाठक साहब..

– आलोक बंसल

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