यही सनातन-धर्म था तो बदल क्यों रहा है? जो बदल जाय वह सनातन कैसा?

आधुनिक सुधारवादी आचार्य देशसेवा, सदाचार और परस्पर मानव-प्रेम को ही सनातन-धर्म मान बैठे हैं. यदि यही सनातन-धर्म है तब तो आपको ये गुण विदेशों से सीखने होंगे, क्योंकि देशभक्ति, ईमानदारी के क्षेत्र में आपसे कहीं अच्छे कीर्तिमान विदेश़ों में स्थापित हैं.

फिर भारत विश्वगुरु कैसा?

वस्तुतः यह धर्म नहीं भयंकर भ्रम है. इन्हीं सब़ों ने देश को गुलाम बनाया – राजनीतिक ढंग से और वैचारिक ढंग से भी. जैसा समय रहा, परिस्थिति रही, उसी के अनुसार ये सामाजिक हथकण्डे धर्म के नाम पर बनाये गये.

किसी समय की सती-प्रथा की तरह आज भी जाति-प्रथा, अस्पृश्यता, वेश्यावृत्ति, देवदासी-प्रथा, बाल-विवाह, दहेज-प्रथा, नशाखोरी, विवाह-तलाक, शाकाहार-मांसाहार, पेशों का निर्धारण, जनसंख्या-नियोजन आदि विशुद्ध सामाजिक समस्याएँ हैं, जिन्हें सुलझाने के लिये समाज और समाज के बहुमत पर आधारित शासन-तन्त्र है.

यह न तो धर्माचार्यों का क्षेत्र है और न उन्हें इसमें टाँग अड़ाना चाहिये. मानव-समाज गतिशील है, अत: सामाजिक व्यवस्था के सम्बन्ध में आज के उपयोगी नियम, प्रथाएँ, आचार-विचार, आहार-विहार इत्यादि कल की परिस्थितियों में अनुपयोगी हो सकते हैं.

इसलिये यह आवश्यक नहीं कि जिन रीति-रिवाजों और संस्थाओं को हमारे पूर्वजों ने स्थापित किया, उन्हें उनकी धरोहर समझकर ज्यो-का-त्यों अपनाये रहें.

धर्म के नाम पर प्रचारित इन रिवाजों में काव्य है, चरित्र संगठन है तथा सामाजिक व्यवस्था भी नि:सन्देह है, किन्तु यह धर्म कैसे हो गया?

एक समय वही आवश्यक था, आज बाधक है- यह पहचान कर हम आदर के साथ उसका विसर्जन कर सकते हैं और इनके विसर्जन के दिन आये भी हैं.

प्राचीन काल की यज्ञ-प्रथा, बलि-प्रथा, दास-प्रथा, स्वयंवर-प्रथा समाप्त हो गयी. इन्द्र और वरुण की पूजा तिरोहित हो गयी, उनके स्थान पर ब्रह्मा, विष्णु, महेश और नये-नये देवी-देवता स्थानासीन हुए.

सोमयज्ञ के स्थान पर अखण्ड कीर्तन और अखण्ड रामायण हो रहा है. स्त्रियों और शूद्रों-सम्बन्धी निर्देश, भोजन, बर्तन, पहनावा, पेशा सभी कुछ तो बदलते जा रहे हैं.

यदि यही सनातन-धर्म था तो बदल क्यों रहा है? जो बदल जाय वह सनातन कैसा?

सनातन तो सदैव रहनेवाली सत्ता का नाम है. वह सत्ता है ‘परमात्मा’. एक ही परमात्मा सर्वत्र व्याप्त पहले भी था, आज भी है. यदि परमात्मा भी दो हैं तो उनके व्याप्त होने के लिये अलग-अलग सृष्टि चाहिये. वह एक ही है और रहेगा.

उस एक को खोजना ही ‘धर्म’ है, जैसा कि ऋषियों ने जाना था. सृष्टि में धर्म एक ही है- ‘अमृत-तत्व की प्राप्ति, सदा रहने वाले शाश्वत धाम की प्राप्ति.’ चराचर जगत का ‘धर्म’ एक ही है. यदि धर्म भी दो हैं तो धोखा है, जरूर धोखा है.

‘धर्म’ शब्द आज केवल विशेषण बनकर रह गया है. स्थूल-धर्म, सूक्ष्म-धर्म, उप-धर्म, कुल-धर्म, गुण-धर्म, श्रौत-धर्म, वर्ण-धर्म, आश्रम-धर्म, और भी बहुत से हैं.

जो धर्म अभी कहे गये- इतने धर्मों के बीच वास्तविक धर्म अपनी पहचान खो चुका है. धर्म शब्द को उसके शुद्ध रूप में पुनर्प्रतिष्ठित करने से व्रत-उपवास, तीर्थ-त्योहार, शुद्धि-श्राद्ध, देवी-देवता, भूत-प्रेत, वृक्ष-पशु, नागपूजा तथा मूर्ति-मजारों की पूजा जैसी कुरीतियाँ तो जल ही जायेंगी.

सामाजिक नीति एवं अर्थ-व्यवस्था की उपयोगी बातों को भी धर्म कहना छोड़ना होगा. आज के परिवेश में यह स्पष्ट करना जरुरी हो गया है कि- ‘धर्म के अन्तर्गत केवल एक बात आती है- वह निर्धारित क्रिया, जिसे करने से आत्म-साक्षात्कार होता है.’

जिसका समग्र शास्त्र है कुरुक्षेत्र में पुन:प्रसारित ‘श्रीमद्भगवद्गीता’.

http://yatharthgeeta.com पर pdf वर्जन में नि:शुल्क उपलब्ध स्वामी अड़गड़ानन्द जी परमह़ंस कृत ‘शंका-समाधान’ से व्यापक लोक-हित में साभार उद्धृत.
आदिशास्त्र ‘गीता’ की यथा-अर्थ सरल, सुबोध व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ भी pdf वर्जन में नि:शुल्क उपलब्ध है.

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