आतंकवाद : बिना धर्मांधता के चश्मे के देखे-समझे जाने चाहिए ये तथ्य

किसी भी समस्या का अंत तब तक सम्भव नहीं है जब तक उस समस्या के मूल कारण को ना पहचाना जाये. समस्या के मूल कारण और उसके उद्देश्य को पहचान कर ही आप उस समस्या का अंत कर सकते हैं. अगर आप समस्याओं को लेकर दिग्भ्रमित रहेंगे या शुतुरमुर्ग की तरह संकट को देखकर अपनी गर्दन ज़मीन में छुपा लेंगे तो वो संकट ख़त्म नहीं होगा.

आपको समस्या के मूल को पहचानना ही होगा और उस समस्या से निराकरण के लिए सतत प्रयत्नशील होकर युद्ध करना ही होगा अन्यथा अपनी और अपने वंश की पहचान बचाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो जायेगा.

ऐसी ही एक समस्या है इस्लामिक आतंकवाद, जिसके प्रति विश्व के लोगों का उदासीन रवैया और समस्या के मूल को ना पहचान पाने के कारण इस संकट ने महज़ 1400 सालों में विकराल रूप धारण कर लिया है और करोड़ों मासूमों के क़त्ल का कारण बना है.

इस्लामिक राष्ट्र किसी लोकतान्त्रिक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की मान्यता नहीं रखते. वह पूरे विश्व को शरीयत के अनुसार चलाना चाहता है. जैसा आपने देखा होगा कि पिछले 3-4 दशकों से इस्लाम धर्म के मानने वालों की हिंसक गतिविधियां पूरी विश्व के लिए सिरदर्द बनी हुई हैं.

आज एशिया, अफ़्रीका, यूरोप से लेकर आस्ट्रेलिया तक समूचे पूरी दुनिया में इस्लामिक आतंकवादी जैसे ISIS, बोको हरम, अलकायदा, तालिबान, सिमी, लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठनो ने आतंक का तांडव मचा रखा है.

आज इस संकट को देखकर कई प्रश्न दिमाग में उठते हैं कि आख़िर अमेरिका जैसे लोकतान्त्रिक देश का एक प्रेज़िडेंट जॉर्ज डब्ल्यू बुश जो इस्लाम को ‘Peace loving religion’ कहता है, वहीं उसी देश का आज का प्रेज़िडेंट डोनाल्ड ट्रम्प क्योँ मुसलमानों के अमेरिका में प्रवेश पर रोक लगाता है?

आख़िर क्योँ कश्मीर के मुसलमान उनकी ही रक्षा करने वाली भारतीय सेना पर पत्थर फ़ेंकते हैं?

अभी दो दिन पहले ही जब भारत 104 सेटेलाइटों को अन्तरिक्ष में भेजने का उत्सव मना रहा था, उसी शाम पाकिस्तान में इन इस्लामिक आतंकवादियों ने 100 मासूम लोगों को मात्र काल्पनिक ज़न्नत की चाहत में मौत के घाट उतार दिया.

यह इस्लामिक आतंकवाद समूचे विश्व के साथ भारत में भी कश्मीर घाटी से लेकर बँगाल तक और उत्तरप्रदेश के कैराना से लेकर केरल तक तेज़ी से विकराल रूप धारण करता जा रहा है, तब इससे लड़ने के लिए इसके मूल कारण को जानना बहुत ही जरुरी है.

इस्लाम की आतंकी सोच को उजागर करते हुए 2005 में एक समाजशास्त्री डा. पीटर हैमंड ने एक गहरे शोध के बाद दुनिया भर में इस्लाम धर्म के मानने वालों की प्रवृत्ति पर एक पुस्तक लिखी, जिसका शीर्षक था – “स्लेवरी, टैररिज्म एंड इस्लाम – द हिस्टोरिकल रूट्स एंड कंटेम्पररी थ्रैट”

और इसके साथ ही एक लेखक लियोन यूरिस ने भी इस विषय पर अपनी एक पुस्तक “द हज” में विस्तार से प्रकाश डाला है.

अब इन दोनों पुस्तकों को पढ़कर जो तथ्य निकलकर सामने आता है वह महज़ चौंकाने वाला ही नहीं बल्कि बहुत ही चिंताजनक भी है.

उपरोक्त शोध ग्रंथों के अनुसार जब तक मुसलमानों की जनसंख्या किसी भी देश-प्रदेश या क्षेत्र में लगभग 2 प्रतिशत के आसपास होती है, तब वे एकदम शांतिप्रिय, कानूनपसंद अल्पसंख्यक बन कर रहते हैं और किसी को विशेष शिकायत का मौका नहीं देते.

जैसे अमरीका में वे (0.8 प्रतिशत) हैं, आस्ट्रेलिया में 1.7 , कनाडा में 2.0, चीन में 1.8, इटली में 1.9 और नॉर्वे में मुसलमानों की संख्या 2.0 प्रतिशत है. इसलिए यहां मुसलमानों से किसी को कोई खास परेशानी नहीं है लेकिन कभी-कभी मज़हबी सोच को लेकर छोटे-छोटे उपद्रव होते हैं.

लेकिन जब मुसलमानों की जनसंख्या किसी भी देश प्रदेश में 2 से 5 प्रतिशत के बीच तक पहुंच जाती है, तब वे अन्य धर्मावलंबियों में अपना धर्मप्रचार शुरू कर देते हैं. जैसा कि डेनमार्क, जर्मनी, ब्रिटेन, स्पेन और थाईलैंड में जहां क्रमश: 2, 3.7, 2.7, 4 और 4.6 प्रतिशत मुसलमान हैं. लेकिन अभी सीरिया से भागे हुए शरणार्थियों को लेकर यह प्रतिशत बढ़ गया है और देश में उपद्रव आतंकवादी घटनाएँ भी बढ़ गयी हैं.

वहीँ जब मुसलमानों की जनसंख्या किसी देश या क्षेत्र में 5 प्रतिशत से ऊपर हो जाती है, तब वे अपने अनुपात के हिसाब से अन्य धर्मावलंबियों पर दबाव बढ़ाने लगते हैं और अपना प्रभाव जमाने की कोशिश करने लगते हैं.

उदाहरण के लिए अब वे सरकारों और शॉपिंग मॉल पर ‘हलाल’ का मांस रखने का दबाव बनाने लगते हैं.

वे कहते हैं कि ‘हलाल’ का मांस न खाने से उनकी धार्मिक मान्यताएं प्रभावित होती हैं. इस कदम से कई देशों में खाद्य वस्तुओं के बाजार में मुसलमानों की तगड़ी पैठ बन भी गई है, जिससे कई देशों के सुपर मार्केट के मालिकों पर दबाव डालकर उनके यहां ‘हलाल’ का मांस रखने को बाध्य किया. लेकिन दुकानदार भी अपने धंधे को देखते हुए उनका कहा मान लेते हैं.

इस तरह अधिक जनसंख्या होने का फैक्टर यहां से मजबूत होना शुरू हो जाता है, और वहीँ शरीयत को लागू करने का जिम्मा भी प्रबल हो जाता है. आप देखेंगे कि कई देशों में ऐसा हो चुका है. वे फ्रांस, फिलीपींस, स्वीडन, स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड, त्रिनिदाद और टोबैगो हैं. इन देशों में मुसलमानों की संख्या क्रमश: 5 से 8 फीसदी तक है.

इस स्थिति पर पहुंचकर मुसलमान उन देशों की सरकारों पर यह दबाव बनाने लगते हैं कि उन्हें उनके क्षेत्रों में शरीयत कानून (इस्लामिक कानून) के मुताबिक चलने दिया जाए, अलग मस्जिदें बनायीं जाएँ और उस क्षेत्र में अन्य धर्म मानने वालों का प्रवेश निषेध हो.

जब मुस्लिम जनसंख्या किसी देश में 10 प्रतिशत से अधिक हो जाती है, तब वे उस देश, प्रदेश, राज्य, क्षेत्र विशेष में कानून-व्यवस्था के लिए परेशानी पैदा करना शुरू कर देते हैं, शिकायतें करना शुरू कर देते हैं, उनकी ‘आर्थिक परिस्थिति’ का रोना लेकर बैठ जाते हैं.

छोटी-छोटी बातों को सहिष्णुता से लेने की बजाय दंगे, तोड़-फोड़, आग लगाना आदि पर उतर आते हैं. चाहे वह फ्रांस के चार्ली हेब्दो कार्टून को लेकर दंगे और मासूमों का क़त्ल हो, या डेनमार्क विवाद हो या फिर एम्सटर्डम में कारों का जलाना हो, हरेक विवाद को समझ-बूझ, बातचीत से खत्म करने की बजाय खामख्वाह और गहरा किया जाता है. ऐसा गुयाना (मुसलमान 10 प्रतिशत), इज़राइल (16 प्रतिशत), केन्या (11 प्रतिशत), रूस (15 प्रतिशत) में भी हो चुका है.

जब किसी क्षेत्र में मुसलमानों की संख्या 20 प्रतिशत से ऊपर हो जाती है तब विभिन्न ‘सैनिक शाखाएं’ जेहाद के नारे लगाने लगती हैं, कई आतंकवादी संगठन बन जाते हैं और फिर देश में असहिष्णुता और धार्मिक हत्याओं का दौर शुरू हो जाता है, जैसा कि भारत (मुसलमान 23.5 प्रतिशत) में अक्सर देखा जाता है.

ये बात-बात पर गैर मुस्लिमों के लिए फ़ाँसी की माँग करने लगते हैं, जैसा कि आज भारत में कमलेश तिवारी को फ़ाँसी की माँग को लेकर इंदौर, टोंक, मालदा और पूर्णिया को जलाया गया.

बँगाल, केरल और कश्मीर घाटी तो निरतंर जल रही है और यहाँ रहने वाले अन्य धर्म वालों पर अत्याचार की पराकाष्ठा हो चुकी है. फिर चाहे 13 लाख कश्मीरी हिंदुओं का पलायन हो या कैराना, बंगाल, असम और केरल से होता हुआ निरंतर पलायन हो.

डॉ हैमंड कहते हैं कि मुसलमानों की जनसंख्या 40 प्रतिशत के स्तर से ऊपर पहुंच जाने पर बड़ी संख्या में सामूहिक हत्याएं, आतंकवादी कार्रवाइयां आदि चलने लगती हैं. जैसा बोस्निया (मुसलमान 40 प्रतिशत), चाड (मुसलमान 54.2 प्रतिशत) और लेबनान (मुसलमान 59 प्रतिशत) में देखा गया है.

शोधकर्ता और लेखक डा. पीटर हैमंड के अनुसार जब किसी देश, प्रदेश या क्षेत्र विशेष में मुसलमानों की जनसंख्या 60 प्रतिशत से ऊपर हो जाती है, तब अन्य धर्मावलंबियों का ‘धार्मिक सफाया’ शुरू कर देते हैं. उदाहरण के तौर पर भारत का कश्मीर में जबरिया मुस्लिम बनाना और कश्मीरी हिन्दुओं को मारकर भगाना.

जब मुसलमान 60 प्रतिशत से ज्यादा हो जाते हैं जैसे अल्बानिया (मुसलमान 72 प्रतिशत), कतर (मुसलमान 79 प्रतिशत) व सूडान (मुसलमान 76 प्रतिशत) में देखा गया है, ये अन्य धर्मों के धार्मिक स्थल तोड़ना शुरू कर देते हैं और जजिया जैसा कोई अन्य कर वसूलना भी शुरू कर देते हैं.

किसी देश में जब मुसलमान 80 प्रतिशत हो जाते हैं, तो उस देश में सत्ता या शासन प्रायोजित धार्मिक और जातीय सफाई (जैसे शिया सुन्नी) की जाती है. और वहीं अन्य धर्मों के अल्पसंख्यकों को उनके मूल नागरिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया जाता है ताकि वो मज़बूर होकर इस्लाम क़बूल कर लें. ये सभी प्रकार के हथकंडे अपना कर जनसंख्या को 100 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखते हैं.

जैसे बंगलादेश (मुसलमान 87 प्रतिशत), मिस्र (91 प्रतिशत), गाजापट्टी (98 प्रतिशत), ईरान (98 प्रतिशत), ईराक (97 प्रतिशत), जोर्डन (94 प्रतिशत), मोरक्को (98 प्रतिशत), पाकिस्तान (97 प्रतिशत), सीरिया (90 प्रतिशत) व संयुक्त अरब अमीरात (96 प्रतिशत) में देखा जा सकता है.

आज समूचे विश्व में आतंकवाद का पर्याय ही इस्लाम बना हुआ है. डॉ पीटर हैमण्ड के अनुसार ये ऐसे तथ्य हैं, जिन्हें बिना धर्मांधता के चश्मे के हर किसी को देखना और समझना चाहिए.

आज भारत में ही नहीं बल्कि विश्व में अब मुसलमान, धर्मनिरपेक्षता की आड़ में आतंकवाद के समर्थन को नहीं छुपा सकता. अब अन्य धर्मावलंबियों के साथ-साथ फर्ज उन मुसलमानों का ज्यादा बनता है, जो खुद को धर्मनिरपेक्ष बताते हैं. वे संगठित होकर आगे आएं और शरीयत का सपना छोड़ कर इस्लाम का पुनर्मूल्यांकन और विश्लेषण करें और इंसानियत का पाठ पढ़ें.

अब इस इस्लामिक आतंकवाद के मूल कारण को पहचाना जाये तो पता चलता है कि विश्व में हुए करोड़ों मासूमों के क़त्ल का कारण मात्र क़ुरआन पर आधारित एक संकुचित आयत और हदीसों पर आधारित मानसिकता ही है, जो विश्व में मात्र इस्लामिक राष्ट्र चाहती है और गैर मुसलमान को इस दुनिया में जीने का अधिकार भी नहीं देती.

जैसे “अत-तौबा (At-Tawbah) : 5 – फिर, जब हराम (प्रतिष्ठित) महीने बीत जाएँ तो मुशरिकों को जहाँ कहीं पाओ क़त्ल करो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो. फिर यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो, निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है.”

लेकिन अब समय आ चुका है कि अब इस्लामिक आतंकवाद को यह भलीभांति समझ लेना चाहिए कि वह विश्व में शरीयत लागू करने और भारत पर गज़वा-ए-हिन्द का सपना देखना बंद करे, अन्यथा इतिहास के पन्नों में ढूंढना पड़ेगा कि विश्व में इस्लाम नाम का कोई धर्म था और मुस्लिम नाम की प्रजाति पाई जाती थी.

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