मिट्टी का भी हो गया बाज़ारीकरण : गाँव गाँव मिलनेवाली मुल्तानी मिट्टी में क्या है मुल्तान का?

चेहरे पर लगाओ तो मुल्तानी मॉडर्न!

लोटा और हाथ धोवो तो हिंदुस्तानी देहाती और गवांर,
मुल्तानी मिट्टी को चेहरे पर लगाना त्वचा को निखारता है.
टी वी चैनल तक यह बात बोलते हैं और ब्यूटिशियन भी.

क्यों?

क्योंकि ये बाजारवाद की दुनिया है.
इस मिट्टी का प्रयोग मेरी मित्रमण्डली में कई लोग करते होंगे या करते हुए देखते होंगे.
क्योंकि मैंने खुद भी देखा है.

लेकिन क्या ये आप इसको अपने खेत में मटर टमाटर और गेहूं की तरह पैदा कर सकते हैं? मने वैदिक मॉडल ऑफ़ इकॉनमी.  नहीं न?

आप बाजार में खरीदते हैं. कभी उस दुकानदार से पूछ लिया होता कि गुरु ये माटी पैदा कहाँ होती है जिसको पैक करके सुंदरता की मार्केटिंग को माध्यम बनाकर सारे बाजारू और बाजारवादी माल काट रहे हैं?

मैं बताता हूँ कि ये #मुल्तानी_मिटटी पैदा कहाँ होती है. मैं खुद भी खोदकर लाया था बचपन में.

एक महिला मित्र खुद बोल रही हैं कि ये खुद भी खोदकर लायी थी बचपन में मुल्तानी मिट्टी. और उसको साल भर बाल में शैम्पू और कंडीशनर की तरह खुद भी प्रयोग कर चुकी हैं. उसके नियमित प्रयोग से उनके बालों की लंबाई डेढ़ गज की हुआ करती थी.

मुझे खुद भी याद है कि ट्यूबवेल पर नहाते समय साबुन (Soap) के अभाव में अलसी/टीसी के पत्ते से शैम्पू करके मुल्तानी मिट्टी से कंडीशनिंग करते थे हम सारे भाई बहन अपने बालों की.

मुल्तानी मिट्ठी कैसे पैदा होती थी? और कैसे हम लाते थे उसको?

दरअसल पुराने तालाब के तलहटी में ये मिटटी पाई जाती है, जिसको खोदने के लिए गर्मी का इंतज़ार करना पड़ता है. गर्मी में तालाब प्रायः सूख जाते थे /हैं, तो उसकी तलहटी में खुरपे से खुदाई करके हम लोग एक विशिष्ट किस्म की मुलायम और पीली मिटटी खोदते थे. जिसको #पिडोर कहते हैं.

अब उस पिडोर की क्या बात की जाय जो भारत के गाँव गाँव का हर बच्चा एक झौवा खोद सकता था अर्थात साल भर का घर का पूरे परिवार और मोहल्ले का ब्यूटी का कोटा.

क्योंकि इसमें बाजार को क्या फायदा?

इसलिए अब उसका नाम दिया गया #मुल्तानी_मिट्टी. अब जो बाजार से इसको खरीदते हैं उनको पता भी नहीं है कि मुल्तानी का अर्थ क्या है.?

उसी पिडोर का प्रयोग रसोईं में प्रयुक्त होने वाले चूल्हे को खाना बनाने के पूर्व लीपकर स्वच्छ ( Hygienic ) बनाया जाता था. उसी पिडोर से लीपकर उसी रसोईं की एक बाउंड्री बनायीं जाती थी जिसके अंदर वही घुस सकते थे जो नहाए धोये हों.
( मॉड्यूलर किचन में नहाए धोये की क्या वैल्यू, लेकिन हाइजिन की वैल्यू है. )

अब मूल बात ये है कि दिशा फराकत के उपरांत जब हम या हमारे बाबा शास्त्रों में वर्णित नियमों के अनुसार मिटटी से लोटा और हाथ धोते थे या धोते हैं (क्योकि साबुन केमिकल है), तब तो हम हो गए देहाती बेवकूफ गंवार.

और तुम टिश्यू पेपर से मुंह या पिछवाड़ा पोंछो खाने या निपटाने के बाद, तो तुम हुए आधुनिक और मॉडर्न?

और कुछ तो ऐसे हैं जो आज तक न धोते हैं, न पछारते हैं.. वे आधुनिक भारत के आधुनिक हैं.

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