वक़्त का तकाज़ा है कि बदलें जाएं गीत के बोल

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‘गुड्डी’ फिल्म का वो गाना याद है? ‘हम को मन की शक्ति देना / मन विजय करें / दूसरों की जय से पहले / खुद को जय करें ….’

यही जय करने में अटक गया हिन्दू और कब दूसरे उस पर जय पा गए उसे समझ में ही नहीं आया।

दुख यही है कि इसके बावजूद वो खुद को जय करने की ही असफल कोशिश में लगा है. हार दोनों तरफ से है, खुद से तो हारता ही है, विधर्मियों से भी हारता रहता है.

इस विषय पर जिहाद की बात होनी तो लाजमी है. वे बड़ी जिहाद और छोटी जिहाद की बात करते हैं.

बड़ी जिहाद की बड़ी-बड़ी बातें करेंगे, खुद से खुद का संघर्ष ही बड़ी जिहाद है, यूं ही उसे बड़ी जिहाद नहीं कहा जाता आदि सब बातें हांकी जाएगी।

अच्छा, ठीक, और छोटी जिहाद क्या है…. तो धीरे से जवाब मिलेगा कि जिसे हम जानते हैं, जिन्हें हम जिहादी कहते हैं वही सब छोटी जिहाद से संबन्धित हैं.

मतलब ये सब बड़ी-बड़ी वारदातें वगैरह ‘छोटी’ हैं?

ओहो! खैर। ऐसा है ना, जिहाद करना तो कंपलसरी है ना (9:38-41) तो फिर जो बन पड़े वो जिहाद कीजिये, नाम के सामने नेकी ही लिखी जानी है (9:120)।

बड़ी हो या छोटी, ईमानदारी से करो, वो जिहाद, जिहाद ही होता है और कुबूल भी. बाकी काफिरों को समझाने के लिए तो पूरी फौज है ही, उलझा देंगे हमेशा की तरह।

वैसे तो आजकल कुछ-कुछ लोग बातों की असलियत समझने लगे हैं, जिहादियों को जलाने वगैरह की बातें करते है लेकिन जब तक काफिरों के नेता उनके काम की बात समझते हैं, टेंशन की जरुरत नहीं.

तो मितरों, वो गुड्डी वाली प्रार्थना जरा Modi-fy करें?

‘हम को मन की शक्ति देना / मन भी जय करें / दूसरों पे जय तो कर के / खुद को जय करें ….’

क्या है ना,

हम कहते रहे – इंद्रिय पे विजय पाओ

वे कहते रहे – इंद्रिय से विजय पाओ

Practical होना चैये कि नै चैये?

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