माथे पर ‘चोर’ लिखा कर किसकी करनी भोग रहे हैं बच्चे

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सिर्फ चुनावों का मौसम नहीं है, ये बोर्ड परीक्षाओं का भी दौर है. अब जब बोर्ड परीक्षाओं को आप देखेंगे तो आपको कम्युनिस्टों वाला वर्ग भेद तुरंत दिख जाएगा.

क्या है कि हर राज्य में एक तो अभिजात्य वर्ग होता है, यानि सेंट्रल बोर्ड, सी.बी.एस.ई. और आई.सी.एस.ई. का. वहीँ दूसरा होता है राज्य का स्थानीय बोर्ड, जैसे हमारे यहाँ बिहार बोर्ड है.

पिछले साल का टॉपर घोटाला याद ही होता तो परीक्षाएं शुरू होते ही अख़बारों में कदाचार मुक्त परीक्षा की ख़बरें भी आने लगी हैं. आज 200 छात्र कदाचार करते रंगे हाथ धरे गए, आज 400 को पुलिस ने दबोचा. तलाशी अभियान जोरों पर है, छात्रों का जूता उतार-उतार कर जांचा जा रहा है.

मगर इसी बिहार के समाज में समाजवादियों के राज में सेंट्रल बोर्ड की भी परीक्षाएं होती हैं. आश्चर्यजनक रूप से उनमें ऐसी तलाशी की जरूरत ही नहीं पड़ती!

वो बच्चे भी बिहार में ही रहे हैं. इसी समाज में पले-बढ़े, उनके माँ-बाप, नाते-रिश्तेदार दोस्त भी तो इसी बिहार के हैं ना?

फिर क्यों नहीं वो चिट-पुर्जे लेकर परीक्षा देने जाते हैं? उनके माँ-बाप, चाचा-मामा, दोस्त क्यों नहीं चार मंजिला इमारत की खिड़की से किताबें पास करते दिखते हैं, ये तो अजूबा ही है!

अब जब सवाल कर दिया है ना, तो आप समझ गए होंगे कि यही समाजवादियों का सामाजिक न्याय है. दसवीं तक पहुँचते-पहुँचते वो बच्चे के माथे पर लिख देता है “चोर”. जैसे ही वो परीक्षा केंद्र पहुँचता है उसके माथे पे “चोर” लिखा देख के पुलिस उसकी तलाशी लेने लगती है.

इस समाजवादी शासन में केन्द्रीय बोर्ड के बच्चों का क्यों मन नहीं करता चोरी करने का या पुलिस क्यों नहीं उनके कपड़े उतार कर तलाशी लेती है… ये वो सवाल है जो आपसे पूछा नहीं जाता. किसी और ने नहीं पूछा इसलिए हमें पूछना पड़ रहा है.

किराये की कलमों को 500 बच्चों का परीक्षा में नक़ल की कोशिश में गिरफ्तार किया जाना पुलिस की बहादुरी लगता है. बच्चों को चोरी क्यों करनी पड़ रही है, ये पूछने की हिम्मत नहीं होती इसलिए याद दिलाना पड़ रहा होता है. रोज़ आँख के सामने होता अन्याय आपको बुरा नहीं लगता इसलिए पूछना पड़ता है.

नेता जी का क्या है? पहले सामाजिक न्याय के नाम पर वोट मांगेंगे. फिर जब जीत गए तो पहले खुद चोरी करेंगे. पकड़े गए तो अपने बदले अपनी बीवी और सालों को बिठा देंगे.

अदालत ने सख्ती की, जनता का ध्यान गया भी तो क्या? उनके बच्चों को बिहार बोर्ड में पढ़ने की क्या जरूरत? आठवीं पास और बारहवीं फेल में तो आईएएस अफसर के ऊपर बैठ के वो मंत्री हो जायेंगे.

ओह बेटियां! जी-जी बिलकुल मगध के जरासंध का समधियाना पास के कंस के घर था. अभी भी समाजवादी समधियाना वैसा ही होता है.

बिहार और उतपत देस के समाजवाद में ज्यादा अंतर नहीं है. यहाँ जैसे टॉपर घोटाला होता है, वैसे ही वहां भी अकड़ कर बताते हैं कि कल्याण सिंह के टाइम के मेट्रिक पास हैं. उसके बाद कभी ईमानदारी से किसी ने मेट्रिक भी पास नहीं किया?

मेरे ख़याल से कटिया लगा के बिजली चुराने और परीक्षा में किताब खोल के नक़ल करने को अपना अधिकार मानने वालों को सरकारें भी उन जैसी ही मिलती है.

उसके बाद आता है कर्मफल, यानि आपका किया धरा पाप-पुण्य सब आपके बच्चों को भी भुगतना होगा. तो दसवीं में पहुँचते-पहुँचते उनके बच्चों पर चोर का लेबल चिपक जाता है.

ये जो मैट्रिक के बच्चों का कच्छा उतार उतार कर तलाशी, उनके नक़ल करने पर जेल जाने को देख कर आप पुलिस की वाह-वाही करते हैं ना, ये दरअसल आप अपने ही कर्मफल पर ताली पीट रहे होते हैं. लड़कों का जूता-बेल्ट तो ऐसे ही उतरवा लिया जाएगा, बाकी लड़कियों की स्पेशल तलाशी के लिए विशेष महिला पुलिसकर्मी भी हैं ही.

बाकी भावना बेन सच सुन के आहत हो गई हो, तो फुर्सत से सोचियेगा. क्यों राज्य के बोर्ड के बच्चों को चोर मानकर चल रहे थे? आपका किया तो आपके बच्चे नहीं भुगत रहे हैं ना? भुगत रहे हैं क्या?

आनंद कुमार की आवाज़ में ये लेख यहाँ सुनें

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