यही काम किये हो जादो जी? पब्लिक आपका काम बजा देगी आज…

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बहुत साल पहले की बात है… आज से कोई 15 साल पहले की…

मैं अपने कुछ मित्रों के साथ सैदपुर-गाज़ीपुर में सड़क किनारे खड़ा बतिया रहा था. जो मित्र खड़े थे साथ, उनमें एक खटीक था, जिसकी वहीं सड़क पे ही fabrication की दुकान थी. एक और थे जायसवाल जी. एक थे जादो जी.

उस दिन भेन मायावती का जन्म दिन था. वो जन्म दिन भेन जी ने बनारस में एक रैली करके मनाया था. सड़क पे बसों और गाड़ियों का रेला लगा हुआ था. हज़ारों की संख्या में बसें और जीपें रैली में जा रही थीं.

हर बस, जीप, कार पे बैनर लगे थे और जिसने वो गाड़ी भेजी थी, उसका नाम लिखा था. फलाने सिंह, ढेकाने सिंह, हेन सिंह, तेन सिंह, या सिंह, वा सिंह….

सब सिंह ही सिंह थे. इक्का दुक्का कोई बाभन दिख जाता था. अहीर एक भी नहीं था. चमार-जाटव की को कौन पूछे?

मैंने उस खटीक मित्र को चिकोटी काटी…. वो नए-नए बसपा नेता हुए थे…. बहुत दलित दलित करते थे…. का हो सोनकर साहब?…. हाथी-हथिनी पे तो सब बाऊ साहब लोग सवार हो के कब्जिया लिए…. आप लोग कहाँ बैठेंगे?

आपके अनुसार जो बिरादरी, जो वर्ग आपका शोषक रहा, वही आपके हाथी पे आज सवार है…. पार्टी में दलितों की क्या औकात है?

इसके बाद हमने वो समय भी देखा जब कि बसपा पे बाहुबली गुंडों ने कब्जा कर लिया. ब्राह्मणों ने कब्जा कर लिया.

आबिदा परवीन की आवाज़ में एक गज़ल सुनी थी –

जो भी आये है वो नज़दीक ही बैठे है तिरे
हम कहाँ तक तेरे पहलू से सरकते जाएँ?
हम ना नखत हैं न गुल हैं जो महकते जाएँ….

पिछले 25 साल में यूपी के दलितों की दशा में कोई सुधार न हुआ. हाँ भेन जी और उनका परिवार ज़रूर एक कमरे के मकान से निकल आज महलों में रह रहा है.

बाहुबली और ठेकेदार, भेन जी को हीरे जड़े मुकुट पहनाते हैं उनके जन्मदिन पे…. भेन जी हज़ार रु के नोटों की माला पहनती हैं….

जब उनसे सवाल पूछा जाता है कि अवाम भूखी मर रही है और आप हीरे के मुकुट पहन रही हैं, तो भेन जी जवाब देती हैं कि दलित की बेटी ऐशो आराम से रहे, ये मनुवादी सामंतवादी ताकतों से बर्दाश्त नहीं हो रहा.

अपने भ्रष्टाचार को न्यायोचित ठहराने वाला ये बेहूदा जवाब दे के आप अपनी अवाम को, अपने वोटर को कुछ दिन तो बेवक़ूफ़ बना सकते हैं, हमेशा नहीं.

मनुवादी ताक़तों को गरिया के और साम्प्रदायिक ताक़तों का भय दिखा के आप कितने दिन जनता को बेवक़ूफ़ बनाएंगे?

ये पब्लिक है…. देर-सबेर सब जान ही जाती है….

मायावती का वोटर भी धीरे-धीरे ही सही, सब जान रहा है. इसीलिए मायावती का core वोट मने दलित वोट धीरे-धीरे दरक रहा है.

खटीक, पासी, धोबी, मल्लाह, मुसहर, आदिवासी… ऐसे जाने कितने जातीय समूह हैं जो बसपा से छिटक गए हैं. यहां तक कि चमार-जाटव में भी अच्छी-खासी टूटन है.

एक अकेली उज्ज्वला योजना ने ही दलित वोट बैंक में खलबली मचा दी है. जबकि सत्य यह है कि अखिलेश सरकार ने तो अभी कायदे से BPL परिवारों की सूची ही केंद्र सरकार को उपलब्ध नहीं कराई कि वो गरीबों को LPG, आवास या शौचालय बनवा सके.

मेरे गाँव में आज तक केंद्र की योजना से न तो एक भी शौचालय बना, न LPG कनेक्शन आया, न कोई आवास आया….

क्यों?

क्योंकि UP में पिछले 13 साल से BPL का सर्वे ही नहीं हुआ…. कौन-कौन गरीब है यही नहीं पता यूपी सरकार को…. जब लाभार्थी का नाम ही नहीं पता, तो लाभ किसको दोगे?

मैंने अपने ग्राम प्रधान से पूछा कि उज्ज्वला में LPG किसको दिया आपने?

प्रधान जी बोले, उज्जवला में हमारी कोई भूमिका नहीं.

फिर किसकी है?

आँगन बाड़ी वालों ने लिस्ट भेजी है….

किस-किस का नाम गया है?

हमारे गाँव में आँगन बाड़ी की कार्यकर्त्री एक ठकुराइन है. उसने कुछ अहीरों का और कुछ ठाकुरों का नाम भेज दिया है.

मैंने पूछा, मुसहर बस्ती में एक भी लाभार्थी नहीं उज्ज्वला का?

प्रधान जी ने कंधे उचका दिए….

मैंने पूछा आपके गाँव में एक भी आवास नहीं, एक भी शौचालय नहीं आया…. कौन करेगा ये काम….

प्रधान जी बोले हमने तो नाम भेजा था, block में सब अटका पड़ा है.

कहने को पिछले 20 साल से यूपी में गरीब गुरबा की, बहुजन की, समाजवादियों की सरकार है…. मुख मंत्री का काम बोलता है….

यही काम किये हो जादो जी? पब्लिक आपका काम बजा देगी आज…

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